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शनिवार, 22 अगस्त 2026

4842 ...मर्यादा के ताले जड़े हैं प्रत्येक शब्द पर 'किस पथ जाऊँ?'

 सादर अभिवादन 


लघुकथा-कविता का तीसरा पाक्षिक अंक
पिछला अंक देखेंअगला अंकः 30 अगस्त 26 को
रचना प्रेषण तिथिः 28 अगस्त 26
विषयः  रक्षा बंधन, जगराता, व्रत
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गढ़ रहा है कथ्य भाषा तथ्य की अभिलाषा
पढ़ रहा जो वाक्य अर्थ कई मिजाज हैं
शब्द तह स्पंदन खींचे, भाव आंखे मीचे
शब्द की परिभाषाओं के संदर्भ अंदाज हैं




गीदड़ों के झुंड ने कब्जा किया है मकानों पर,
बन बैठे हैं राजा, मानो हैं आसमानों पर।
​बोलते हैं यूँ कि मानो वह हैं प्यारे मेमने से,
दुनिया है जालिम और वे हैं बिल्कुल छौने से।
​बातें करते हैं यूँ जो मानो वही हरदम सही,
धोखे में रखकर सबको वे जमाते अपनी दही।




गड़-गड़, गड़ -गड़ बोले बदरिया।
चम-चम,चम-चम चमके बिजुरिया।हो रामा,
हरि बोलो !अजब आवाज आबे, अम्बर से हरि बोलो।
हरि बोलो!सावन महीना...........





मरती है स्त्री
सुबह -शाम
घुट-घुटकर
अटकती हैं साँसें पसलियों में
दर्द बन जाता शिलालेख
सूखे अधरों का
किससे कहें, कैसे कहें
मर्यादा के ताले
जड़े हैं प्रत्येक शब्द पर
'किस पथ जाऊँ?'




कई सौ साल पहले
सदी का आख़िरी ग्रहण उतरा
सूरज के पाँव में
कालिख उतर आई
और एक पहर
समय से बाहर सूख गया।
*****
सादर समर्पित
वंदन
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