सादर अभिवादन
आखिर सन 2023 की आँखें बाहर देखने लगी
फरवरी की ओर...
इस वसंत को मौसम में एक और चढ़ेगा बुखार
कल से..वो है वैलेंटाइन का
अब देखें रचनाएँ ....
जो कुछ उसके पास है, वह छिन जाने का भय, रिश्तों के टूट जाने का भय अथवा उनके सदा एक सा न बने रहने का भय। दूसरों के मन में अपने प्रति स्नेह व सम्मान को खो देने का भय। समाज में अकेले रह जाने का भय और दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं, इसका भय।
विहीन प्रणय कविता, तलाशते हैं हम
रेत के नीचे अविदित जलाधार,
जहाँ छुपी रहती है अनंत
प्रीत की उत्पत्ति, धूप -
छाँव की तरह
प्रतिध्वनित
होती है
मेरी लाठी मुझे
सहारा तो देती है,
पर मुझे अच्छा नहीं लगता,
वह जब चलती है,
तो शोर बहुत करती है.
हे
सखी
वसंत
ऋतु आया
सब का मन
नाचे हो मतंग
खुशी से अंग-अंग
भर गया उमंग
सखियों के संग
देखूँ हो दंग
प्यारा रंग
अलग
रूप
है
अभी साधने है कई लक्ष्य ,
ज़िम्मेदारी के निभाने है कई चक्र ,
लिखनी कई #इबारत पसीने और खून से ,
अभी रखें दिल को जरा सुकून से ।
"ठीक है दादी ! मैं जरूर बात करुँगी मम्मी-पापा से।पर दादी ! मैंने एक बुक में पढ़ा कि अगर हम अच्छे से नहीं रहते , अपना काम अपने आप नहीं करते , चीजों को अस्त-व्यस्त फैलाकर रखते हैं और घर में जूते-चप्पल सही जगह सलीके से नहीं रखते तो हमारे ग्रहों पर भी इसका गलत असर पड़ता है। मतलब वही... ग्रहदोष लगता है, और फिर ऐसी गलतियों पर जब हमें बार-बार बड़ों की डाँट पड़ती है तो हम चिड़चिड़े भी हो जाते हैं" ।
.........................
आज बस
सादर





