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गुरुवार, 20 अगस्त 2026

4840 ..आमतौर पर सत्ता कान रहित होती है

 सादर अभिवादन 

लघुकथा-कविता का तीसरा पाक्षिक अंक
पिछला अंक देखें अगला अंकः 30 अगस्त 26 को
रचना प्रेषण तिथिः 28 अगस्त 26
विषयः रक्षाबंधन, तीज व्रत, रतजगा
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आमतौर पर
सत्ता
कान रहित होती है,
और उसकी अ-आंख होती है

जो
देखती कम,
दिखाती अधिक हैं।

जनता की वे चीखें
जिनसे
दीवारें तक
भरभराकर गिर सकती हैं,





और देर तक प्रतिध्वनित होती रही मेरी ही आवाज़ 
मेरे कानों में 
और तैर गई एक आश्वस्ति उसके चेहरे पर।
यह सब सच था या मेरा भ्रम 
मुझे पता नहीं 
यह तो बताएगी अगली पीढ़ी 
जी हां!
यह तो बताएगी अगली पीढ़ी





एक दिन बारिश की बूंदों को टपकते हुए देखा 
टपकते ही आपस में मिलते हुए देखा 
न उन्हें टूट जाने का गम था 
न उन्हें बादल से बिछड़ जाने का गम था 
बच्चों की किलकारी और हंसी में 




उसने अपनी पसंद से शादी की
रंडी कहलायी 
बाल कटवाये तो परकटी
जो जींस पहन ली 
तो रांड शब्द उपहार मिला
उसने साड़ी पहनी जो दिखी नहीं 
सूट, बिंदी, चूड़ी 
नजरअंदाज किये गये




यह सिर्फ धागों की बुनावट नहीं
अनकहे जज़्बात हैं,
हर रंग में छुपी हुई, एक अलग ही बात है
कुछ सिलवटें हैं संघर्ष की, 
कुछ रंग हैं खुशियों के,
स्त्री और साड़ी की ये जोड़ी,
सदियों की खूबसूरत सौगात है




पलायन शुरु हो गया
इस चेतावनी के साथ
ध्यान रखना 
गलती से भी किसी 
मानव आबादी की ओर मत जाना
वे डरने का नाटक करेंगे
और
मारकर हमें ही आदमखोर करार दे देंगे।
अलविदा दोस्तों...




चीड़ की इन ऊँची शाखों पर
शाम ने टांग दी है, 
अपनी अंतिम साँस
जैसे कोई ख़त,
जिसे लिखकर डाक में डाल दिया हो,
पर मंज़िल तक पहुँचना अभी बाक़ी हो।





नदी के दोनों किनारों की है अपनी
ही एक अलग कहानी, एक
तरफ जनशून्यता, दूसरी
ओर अंतहीन कोलाहल,


सादर समर्पित
वंदन

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