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शुक्रवार, 22 मई 2026

4750...आदत कब सुधरेगी रे...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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मन अशांत है और इसे नियंत्रित करना कठिन है ,
लेकिन अभ्यास से इसे वश मे किया जा सकता है ।
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आज की रचनाऍं-


कण-कण में आस जगी, नयन में उजास भरा

हुलसा है पोर-पोर, उर मनहर गीत जगा,

बाहर इक लय बिखरी, जीवन संगीत बहा

कदमों में थिरकन भर, गह्वर में नृत्य जगा !

 

मुस्काई हर धड़कन, लहराया जब यौवन

अपने ही आंगन में, प्रियतम का द्वार खुला,

लहरों सी बन पुलकन, उसकी ही बात कहे

बिन बोले सब कह दे, अद्भुत यह राग उठा !




पिय की भुवनमोहिनी चितवन 
दिल में कब उतरेगी रे 

छह रूपों वाली इक सौतन 
घर से कब निकरेगी रे 

सबसे दिल की कह देने की 
आदत कब सुधरेगी रे 



आज के प्रश्न
अक्सर अपनी शक्ल बदलते मिलते हैं—
प्रश्नवाचक चिन्ह से हटकर
पूर्णविराम बनते हुए।

वे प्रश्न नहीं लगते अब,
निर्णय लगते हैं;
जिनमें जिज्ञासा नहीं,
पूर्वनिर्धारित आग्रह धड़कता है।




अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो या 
सूचना का अधिकार 
संविधान ने दिये हैं अधिकार 
जो व्यक्ति विशेष की कृपा पर निर्भर नहीं
समाज की कमाई है व्यक्ति की नहीं!  




न इसे भोग का विषय समझो,

न भय का अंधकार कहो।

यह तो चेतन दीप शाश्वत,

जिससे जीवन राह गहो।


संतुलित दृष्टि ही धर्म सच्चा,

बाकी सब अनुमान यहाँ।

स्वीकारों से जग चलता है,

घृणा बने श्मशान यहाँ।



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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. यही एक माध्यम है
    लिखते रहें
    पढ़वाते रहें
    बेहतरीन प्रस्तुति
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. मन पर नियंत्रण करने की ज़रूरत ही नहीं है, बस भीतर साक्षी भाव को जागृत करना है, सुंदर प्रस्तुति, बहुत बहुत आभार श्वेता जी!

    जवाब देंहटाएं
  3. माना उद्वेग बेशक गहरे हैं
    अच्छा है गर नहीं ठहरे हैं

    शानदार अंक

    जवाब देंहटाएं

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