निवेदन।


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रविवार, 22 फ़रवरी 2026

4661...भारत माता सौ सौ अपराध क्षमा करती...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय जयकृष्ण राय तुषार जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-


एक देशगान -भारत की संसद में ऐसे गद्दार कहाँ से आते हैं

यह धन्यभूमि

भारत माता

सौ सौ अपराध क्षमा करती,

यह ज्ञान, दान

भोजन देकर

शरणागत की झोली भरती,

*****

खोता सुध

समझ सकूं ना, कैसी ये भाषा!

चंचल उन नैनों की, सांकेतिक परिभाषा,

इंगित, क्या अभिलाषा!

कैसी आशा!

जागृत, खुद में पाता हूँ!

सुध, खोता जाता हूँ....

*****

छटाँक भर का

तभी बेटा आकर दोनों के पैर छूकर गले मिला और फटाफट सामान को गाड़ी में रखवा कर तीनों जब बैठ गए तब पापा ने चुटकी लेते हुए कहा , " क्यों रे ! किसका इंतजार था तुझे ? कौन आयेगा तुझे लेने यहाँ..?.. हैं ?... अच्छा आज तो वेलेंटाइन डे हुआ न तुम लोगों का ! कहीं कोई दोस्त तो नहीं आयी है लेने ! हैं ?..  बता दे "?

बेटा चिढ़ते हुए - "मम्मी ! देख लो पापा को ! कुछ भी बोल देते हैं" ।

*****

नोकझोंक : थोड़ी-सी तुम, थोड़ा-सा मैं

बस तुम्हारी आँखों में

अपना अक्स पढ़ लेता हूँ।

वो अचानक गंभीर हुई

अगर एक दिन

मैंने सवाल पूछना बंद कर दिया तो?

*****

रोशनियों के बीच

आनन-फानन में चाचा ने मारुति बाहर निकाली. मम्मा ने सहारा दे कर चाची को पिछली सीट पर बिठाया और खुद साथ बैठ गयी. पापा ने स्टीयरिंग संभाली, चाचा पास बैठे. पटाखों के धमाकों के बीच कार अस्पताल की और बढ़ चली. घर पर आयुष और शगुन ही रह गए. कुछ देर बाद पापा ने लौटकर बताया कि डाक्टर ने कहा अभी कुछ घंटे लगेंगे. शगुन ने उनसे पूछा कि आप घर पर हैं तो मैं और आयुष अस्पताल चले जाएँ? गुप्ताजी ने, “वैसे भी वहाँ मेरी कोई जरूरत नहीं”, कहते हुए अनुमति दे दी.

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 


शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

4660...हमने खुद को विश्व-स्तर का बनाने का बीड़ा उठाया है

 सादर अभिवादन 



माह ए रमजान चालू आहे

19 तारीख से एक माह तक 
मौसम मे गर्मी का नामोनिशान नहीं रहेगा
भगवान भी उपवास रखने वालों के लिए
दिन की तपन को दूर करने का साधन बनाता है 
 
रचनाएं देखें




सूरत आँखों में है बसी
मन में समाई है हंसी
अब तो ऐसे ही
मन रहा है बहल .

याद बने अब हकीकत
रहो साथ अब हर वक्त
अब तो आकर सदा के लिये  
मेरी जिदंगी दो बदल 





अगर हम कभी दोबारा मिलेंगे 
क्या बातों के पैबंद 
जख्मों को सिलेंगे? 
रिश्तों की गाँठें कड़ी होंगी 
या फिर टूटे सिरे खुल के बिखरेंगे ? 




वो अपनी प्रेमिका से
अपना खाली बंटवा 
भरने की जिम्मेदारी देता है
प्रेमिका उसे प्रेम समझते हैं






अरे! हमने खुद को
विश्व-स्तर का बनाने का बीड़ा उठाया है,
हम तो हर गिरने वाले पर
अभियोग पत्र लाने की तैयारी में हैं।

गड्ढों की आँखें नहीं होतीं,
पर गिरने वालों के पास भी
आँखें कहाँ होती हैं!






वेद पुराण हमें सिखलाते, सरल मार्ग अपनाना।
रामायण से हमने अपने, आदर्शों को जाना।।
श्लोकों के हर बीज मंत्र में, ऊर्जा अमित समायी।
दया धर्म का पाठ पढ़ाकर, मानवता ले आयी।।
कहते कृष्ण सार जीवन का, मानो इसे न क्रंदन।
गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।





न तुझसे मिला, न देखा
तू कायनात में उसी दिन आई
जब एक सूखा जंगली गुलाब डायरी में मिला




आज भी
तनिक भारी हो गया है ये अंक
सादर वंदन

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

4659...एक पुराना,सच्चा दर्द खो गया है...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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गलत होकर ख़ुद को सही साबित करना उतना मुश्किल नहीं होता जितना सही होकर ख़ुद को सही साबित करना।

संकेत की भाषा पढ़ने के लिए दृष्टिभ्रम से बाहर निकलना होगा वरना हम जो देखना चाहते हैं वही देखने के प्रयास में उलझे रह जायेंगे....।


आज की रचनाऍं- 
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मैं अपने
नैसर्गिक दर्द के साथ
जीना चाहता था।

थाने गया
उन्होंने कहा,
पहले सबूत लाओ
कि दर्द तुम्हारा ही था।

अख़बार में इश्तेहार दिया
एक पुरानासच्चा दर्द खो गया है,
पाने वाला कृपया लौटा दे।

टीवी वालों से कहा
उन्होंने पूछा,
इसमें टीआरपी कितनी है?”




इस एक जुदाई ने कितना मजबूर कर दिया

लिपट गया वी मुझसे कफ़न की तरह,


मैं देखता रह गया पुराने आँगन की तरह

और तू जुदा हो गयी दुल्हन की तरह,






एक अनंत स्रोत है जिससे

नित नवीन भाव जगते हैं,

पल भर कोई थम जाता जब

अमृत घट बरबस बहते हैं !

 

शब्द उसी के भाव उसी के

जाने क्या रचना वह चाहे,

कलम हाथ में कोरा कागज

सहज गीत इक रचता जाये !




नील व्योम की विशाल वक्ष सा
है अगाध विश्वास भरा मन
सहज सुभग अनुराग भरा 
है साँसो का कोमल स्पंदन।
इकतीस वर्ष के पावन संग का
अनगिनत ही एहसास लिए 




"क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?" फातिमा ने पूछा और सीमा के पास ही शगुन के बिस्तर पर बैठ गई. "आज डॉ. शास्त्री ने जो कहा, उसने मुझे डरा दिया शगुन. अगर 'स्टीरियोटाइप्स' ही हमारी पहचान तय करते हैं, तो क्या फातिमा होना हमेशा एक संदेह के दायरे में रहना ही रहेगा? प्रियंका का आज मेस से भागना... क्या वह भी इसी स्टीरियोटाइप का हिस्सा था कि वह हमारे साथ बैठकर 'अशुद्ध' नहीं होना चाहती?"




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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

4658 घर की इज़्ज़त पे किसी गैर की हो आँख अगर

 सादर अभिवादन

आज पम्मी जी नहीं.हैं
चलिए चलें रचनाएं की ओर




घर की इज़्ज़त पे किसी गैर की हो आँख अगर,
ऐसा हो शख्स कोई घर से निकाला जाए ।

जब भी हो जाये किसी गैर पे विश्वास कभी,
उसकी पुश्तों को भी इक बार खंगाला जाए ।




दिल की लगी,
शून्य घरौंदें
तकते रहे
आसमां,
उड़
चुके प्रवासी पखेरु,धरातल
में बिखरे पड़े हैं कुछ
स्वप्न सप्तरंगी,




नीलकंठ महादेव बाघंबर धारी
हरो मन के विकार हे त्रिशूलधारी ।
तुमने विषपान कर हे त्रिपुरारी
जन की पीड़ा धारण की स्वयं ।
जीव मात्र को दिया पूर्ण संरक्षण





कितना था तंज उसके हर उठते सवाल में,
कुछ वो भी मुझसे तंग था कुछ मैं भी हाल में ।

चाहा जिसे वो शख्स था, मेरे ही ख्याल का,
वैसा नहीं था लुत्फ किसी के जमाल में ।

आज के अंक मे एक ब्लॉग की दो रचनाएं है
भाई हर्ष जी को शुभ कामनाएं

बस
सादर

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

4657..कौन है वह..

 ।।प्रातःवंदन।।

ऊषे!

यह रवि का प्रकाश जो

तेरे श्रम का ही है प्रतिफल!

ये अलग-अलग बिखरे

एकाकी प्रकाश-बिन्दू

तम के असीम सिन्धु में

करते झिलमिल

जिन्हें जगती के मानवगण!

कहते हैं तारकगण!

विजयदान देथा 'बिज्जी'

चलिए आज की प्रस्तुति की ओर ..

ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे

दिल का दरवाजा रोज़ खटखटाया ना करो

अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो ।

तुम्हारी यादों में भूली ज़माना और ख़ुद को

तेरे सिवा ना अपनाया अभी तक किसी को 

ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे 

कितना चाहा तुझे था बता न पाई तुझी को..

✨️

कौन है वह ! 

कुछ भी तो नहीं पता हमें 

न कभी हो सकता है 

क्यों और किसने बनायी यह दुनिया ?

बस मन उस जादूगर के 

प्रेम में खो सकता है !

✨️

नई विधा - जो दोनों ओर से पढ़ी जा सके

झीना था प्रतिरूप तुम्हारा, छीना था हर चैन हमारा

अच्छा था मोहक था खेल, सच्चा था रोचक था मेल

करते रहे तुम्हें हम दूर, कहते रहे तुम्हें हम हूर..

✨️

यादें पुरानी दे दो

रिश्ता बहुत पुराना, यादें पुरानी दे दो

धरती तरस रही है, कुछ तो निशानी दे दो

पिघलो जरा ऐ बादल, रोना शुरू करो तुम 

प्यासी धरा पे सबकी, आँखों में पानी दे दो..

✨️

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️


मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

4656... जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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मौसम बदल रहा है। माघ की शीतल छुअन
 और फागुन की हल्की मीठी-सी आँच के मध्य खिलते पलाश कितने मनमोहक लगते हैं न...।

पिघल रही सर्दियाँ
झर रहे वृक्षों के पात
निर्जन वन के दामन में
खिलने लगे पलाश

सुंदरता बिखरी फाग की
चटख रंग उतरे घर आँगन
लहराई चली नशीली बयार
लदे वृक्ष भरे फूल पलाश।
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आज की रचनाऍं- 


दिल अगर टूटे तो धड़कन कम नहीं होती
हर किसी दर्द का मतलब बुरा नहीं होता
 

खामोशी भी कभी छेड़े मधुर सरगम को
हर किसी साज़ में होना तम्बूरा नहीं होता
 

जिसे पा लो तो कई बार क़दर खो जाए
हर कोई ख़्वाब हक़ीक़त में पूरा नहीं होता




कितना बदल  जाता  है
और  मैं  हारती  हूँ 
पर  मुझे  स्वीकार  तो  करना  है
ऋतु परिवर्तन  सदा  ही  रहा
इस जन्मदिन  बस  चाहूँ  यहीं
कोई  लाकर  दे  दे  मुझे  बचपन  का  वो भोलापन  फिर  वहीं ।


यह प्लेटफ़ॉर्म कम, चलती-फिरती प्रदर्शनी अधिक है। यहां लोग बोलते कम हैं, दिखाते अधिक हैं। शब्द छोटे हुए, स्टोरी चौबीस घंटे में समाप्त होने लगी, और धैर्य पंद्रह सेकंड का रह गया।
मैंने भी सोचा कला से जुड़े लोगों को फ़ॉलो करना चाहिए, उन्होंने भी किया... एक परस्पर सम्मान जैसा भाव बना।
पर कुछेक को जैसे ही फ़ॉलो बैक किया, इनबॉक्स ने फिर दस्तक दी,
“हाय…”
संस्कारों ने कहा - नमस्ते लिख दो।
मैंने लिखा।
उत्तर आया — “हाँ, तो कुछ बोलो!!!”
अब यह आधुनिक संवाद शास्त्र का नया सूत्र है,
प्रारंभ वह करेगा, विस्तार आप करेंगे।
उत्सुकता उसकी होगी, उत्तरदायित्व आपका।




दशकों के अंतराल के बाद सब कुछ बदल गया है, शिक्षा का स्वरूप, शिक्षा का तरीका और उसकी विभिन्न शाखायें। अपने सपनों के लिए जहां मेडिकल के क्षेत्र में सिर्फ एमबीबीएस करना ही एकमात्र विकल्प था, सलेक्शन नहीं हुआ तो लोग उसको फेलियर समझते थे लेकिन आज इतने सारे विकल्प सामने आ चुके हैं कि प्रगति के तमाम रास्ते उन्हें उच्च पदों तक पहुंचा देते है। आप अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाइए और उन्हें अपनी इच्छानुसार करियर बनाने दीजिए।



चाचा ने एक लंबी आह भरी, जैसे शगुन की बात ने उन्हें बहुत गहरी चोट पहुँचाई हो. "बेटा, तुम अभी छोटी हो. तुम जिसे 'खुलापन' कहती हो, वह हमारे खानदान में 'मर्यादा' का उल्लंघन माना जाता है. खैर, तुम कह रही हो तो मैं ध्यान रखूँगा. अब मैं इतना भी पत्थर-दिल नहीं हूँ जितना तुम मुझे समझती हो. नीतू का ध्यान तो तुमसे ज्यादा मुझे है, आखिर हमारे वंश की बेल उसी के सहारे आगे बढ़ेगी. मेरा वंश तो उसी से आरंभ होने वाला है."

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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

4655..भटके हुए राही भी अक्सर थककर लौट आते हैं,

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय अंक में पढ़िए पसंदीदा रचनाएँ-

सूरज ढला है तो फिर सुबह भी आएगी ही

भटके हुए राही भी अक्सर थककर लौट आते हैं,
जब ठोकरों का दर्द उन्हें अपनी जड़ों की याद दिलाता है।
​दुआओं में असर रखना, यही अब तुम्हारा काम है,
भले  रास्ता आज कठिन और बदनाम है।
*****

सतह के ऊपर - -

उस अदृश्य

देवालय के द्वार कभी बंद
नहीं होते, ज़रूरी है
सही समय उस
गंतव्य पर
पहुंच पाना,

*****

कहीं और चला जा



जो ज़ख़्म पे मरहम होशफ़ा हो शुकून हो ये वो नहीं है घरतू कहीं और चला जा। खुदगर्ज़ बस्तियों में फ़रेबों के मकाँ हैं 'उनका' है ये शहर तू कहीं और चला जा। 

*****

मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 31

" रिंग किसने चुरायी होगी ?....अभय रिचा को नुकसान पहुंचाना चाहता था....क्यों ? ....कहीं ऐसा तो नहीं कि वह भी रिचा से प्यार करता हो ?....और सौरभ ?....एक ऐसा शख्स , जिसे किताबों के अलावा किसी से कोई मतलब नहीं रहता , उसको रिचा की इतनी फिक्र क्यों थी ? "

*****

उनके हिस्से चुपड़ी रोटी ------


र लुटाया है मौसम ने जी भरकर इस पर अपना,

ऐसे   ही   थोड़ी  धरती  की  चूनर  धानी-धानी  है।

        फ़स्ल हुई चौपट बारिश से और धेला भी पास नहीं,

कैसे क़र्ज़  चुके बनिये  का  मुश्किल में रमज़ानी है।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


 

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