शीर्षक पंक्ति: आदरणीय दिगंबर नासवा जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा चयनित रचनाएँ-
घर जिनके माहताब ने झट से जला दिए ...
एक नीड़ है जग यह सारा
कोई समेटे है अपने पंखों की आंच में
और पोषता है जीवन को अहर्निश
चेतना की अखंड धार से
कोई रखे है आँख अपनी सन्तान पर
उड़ने का देता है हर अवसर
देखता रहता है हर छलांग आह्लाद से
प्रसन्न होता, जब भर जाता है आसमान गुंजार से !
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मिट्टी कटी किनारों की - राहुल शिवाय
उसी भाव से टाँके तुमने टूटे बटन कमीज के
जैसे मेरी उम्र माँगने करती हो व्रत तीज के।
या
बीतता है दिन कि जैसे
चारपाई पर पड़ा बीमार कोई।
या फिर
जीवन सारा कटु अनुभव है
मधु-मिसरी है माँ।
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मासिक बाल पत्रिका किलोल में प्रकाशित बाल कविताएं -आकिब जावेद
*****उपन्यास ‘उपेक्षिता’: सामाजिक चेतना का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेजडी.सी. का व्यक्तित्व एक ऐसे आदर्श नायक का है जो अन्याय के समक्ष झुकने के स्थान पर, आँखों में आँखें डालकर सत्य बोलने का साहस रखता है। काजल के हृदय में पश्चाताप की अग्नि प्रज्वलित होना और उसका आत्मघाती कदम उठाना, कथा को एक नया मोड़ देता है। डी.सी. द्वारा अपना रक्त देकर काजल के प्राणों की रक्षा करना इस बात का प्रतीक है कि मानवीय रक्त का संबंध जातीय और वर्गीय दीवारों से कहीं अधिक ऊँचा और पवित्र होता है।*****फिर मिलेंगे। रवीन्द्र सिंह यादव