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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

1666..बापू तुम कैसे समझ गये थे?

शुक्रवारीय अंक 
आप सभी का स्वागत है।
----
धर्म हो या अधर्म,
कोई भी विचार जब तक स्वविवेक से
न उत्पन्न हुआ हो, तबतक धूलकणों की आँधी मात्र होती है 
जिसमें कुछ भी सुस्पष्ट नहीं होता है।
उधार का ज्ञान किसी भी विषय के अज्ञान को ढक 
सकता है समाप्त नहीं कर सकता।
अंधश्रद्धा, कल्पना,आडंबर और ढोंंग का
आवरण जब कठोर हो जाता है तो आत्मा की कोमलता और
लचीलेपन को सोखकर पूरी तरह अमानुषिक और कट्टर 
बना देता  है।और अगर धर्म की "कट्टरता" 
मानवता से बड़ी हो जाती है तो
उस व्यक्ति के लिए परिवार, समाज या देश से 
बढ़कर स्व का अहं हो जाता है और वह
 लोककल्याण,परोपकार जैसे मानवीय गुण को अनदेखा कर,
अपने लोग,अपनी जाति का चश्मा पहनकर सबकुछ  देखने 
लगता है।धर्म का अधकचरा ज्ञान 
ऐसे विचार जिसमें उदारता न हो, उसमें हम अपनी आत्मा की नहीं,
 छद्म ज्ञानियों के उपदेश से प्रभावित होकर
उनके स्वार्थपूर्ति का साधन मात्र रह जाते हैं।
काश कि हम समझ पाते कि हम अन्य मनुष्यों की भाँति ही एक 
मनुष्य सबसे पहले हैं,
किसी भी जाति या धर्म के अंश उसके बाद।

★★★★★★★★
आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-

जश्न नहीं मनाना

भूलो
हे दुर्घर्ष, संघर्षशील!
मोड़ दे जो काल को,
वह गति हो तुम!
सनातन संस्कृति की
शाश्वत संतति हो तुम!


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मेरी नागरिकता की पहचान
उसी दिन घोषित हो गयी थी
जिस दिन
दादी ने
आस-पड़ोस में
चना चिंरोंजी
बांटते हुए कहा था

-------///////-----

बापू की पेंसिल


बापू तुम कैसे समझ गए थे ?
एक दिन अपनी फेंकी हुई
बेकार मान ली गई चीजें ही
विकराल रूप धर लेंगी
और हमें निगल जाएंगी !

------/////----

पंखुड़ी-सा स्मृति वृंद


नीरव-सा नीरस एकांत,  
दर्शाती आयरिस आँखों की,  
सूनेपन की उमड़ी दारुण कथा, 
खारे पानी का बहता बहाव है, 
व्यंग्य भाव से झूलती झूला, 
 कहती यही जीवन की बहार है।

------////////-----


और चलते-चलते

हम अवधेश को हिन्दू धर्म-संस्कृति का संरक्षक 
बनाकर प्रोजेक्ट करेंगे और तुम अख्तर को अपनी 
कौम का सबसे बड़ा हिमायती बताओगे. 
फिर हम पंडित बृजभूषण के गैंग से अवधेश के 
घर पर, मुसलमानों के नाम से हमला करवाएँगे 
और तुम मौलाना सदरुद्दीन के गिरोह से 
अख्तर के घर हम हिन्दुओं के नाम से आग लगवाओगे.
और हाँ, इस खेल को और दिलचस्प बनाने के लिए 
अख्तर का मारा जाना भी ज़रूरी है.
अब इस हमले में, इस आगजनी में जितने ज़्यादा लोग मरेंगे, 
जितने बलात्कार होंगे और जितनी लूटपाट होगी, 
उतना ही ज़्यादा हमको फ़ायदा होगा.

★★★★★

आज का यह अंक आपको कैसा लगा?
हमक़दम के विषय के लिए

कल का अंक पढ़ना न भूलें कल आ रही हैं विभा दी
एक विशेष प्रस्तुति के साथ।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन प्रस्तुति..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. जोरदार
    आज के लिंक्स में सबसे प्रभावशाली रचना है गोपेश जी की "एक और तमस"
    समाज हर एक पक्ष का काला सच शब्दों में पिरोकर पेश किया गया है।
    सारी रचनाएँ उम्दा है।
    "मेरी नागरिकता की पहचान माँ के पेट पर पड़ी अमिट लकीरों से है" खरे साहब के ये भाव करारा तमाचा है नकली कानून और सोच पर।
    उम्दा चयन... जो हलचल का मान बनाये रखेंगे।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत शानदार प्रस्तुति भूमिका में चिंतन देता सुंदर लेख ,मानव बस मानव ही रहता तो श्रृष्टि के लिए कल्याणकारी होता , अभिमान या नाम या फिर आत्मवंचना के तहत सदा द्वंद में घिरा रहता है, बहुत शानदार भूमिका।
    सभी रचनाएं बहुत आकर्षक।
    सभी रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  4. आदरणीया दीदी जी सादर प्रणाम 🙏
    भूमिका में आपने जो संदेश दिया वह आज के समय की माँग है। उचित कहा आपने। सुंदर प्रस्तुति संग लाजवाब अंक।

    जवाब देंहटाएं
  5. पाँच लिंकों का पंचशील.

    अनंत आभार सखी.
    बापू की पेंसिल के ज़रिये बापू की बातें याद करने की कोशिश है.
    कभी-कभी लगता है, हम बापू के सिखाए छोटे-छोटे पर बड़े जीवन सूत्रों को भूल गए.
    उन्हें बस नोटों में देखना और इस्तेमाल करना याद रहा.

    जवाब देंहटाएं
  6. एक और बात है.
    नागरिकता की पहचान बहुत ही संवेदनशील कविता है. पर इस कविता में जो बात की गई है, वह नागरिकता नहीं अस्तित्व का विषय है. निश्चित रूप से वह पहचान विधाता ने दी है इसलिए अमिट है. उसकी बात हो ही नहीं रही.
    नागरिकता अवश्य कागज़ी उपक्रम है. सुचारू व्यवस्था के लिए अनिवार्य है.
    हर देश के नागरिक के पास ये कागज़ होते हैं.
    ये किसी भी तरह हमारे अस्तित्व और नागरिकता पर हमला नहीं हैं.
    कमियां हो सकती हैं. उन्हें सुधारने के लिए आन्दोलन नहीं, सद्भावना सहित सुझाव देने की आवश्यकता है.

    जवाब देंहटाएं
  7. शानदार भूमिका के साथ बेहतरीन प्रस्तुति श्वेता जी ,सभी रचनाकारों को ढेरों शुभकामनाएं एवं सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  8. बेहतरीन लिंक्स चयन एवम प्रस्तुति ...

    जवाब देंहटाएं
  9. सुन्दर प्रस्तुति में मेरी रचना को स्थान देने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया प्रिय श्वेता दी.
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  10. शानदार भूमिका के साथ लाजवाब प्रस्तुति एवं उत्कृष्ट लिंकों का संकलन....।

    जवाब देंहटाएं

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