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शनिवार, 20 जनवरी 2018

918... क्षणभंगुर


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आपसभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
कुशलता से सब कुशल है
VRS
मेरा है , मेरा है , सब है मेरा
इसको निकालो उसको बसाओ
धरा रहा सब धरा पै बंद हुई पलकें
अनेकानेक कहानियाँ इति हुई
लील जाती रश्मियाँ पत्तों पै बूँदें 
तब भी न  क्षणभंगुर संसार झलके
VRS
माया लोभ मोह छोह लीला
उजड़ा बियावान में जा मिला
दम्भ आवरण सीरत के मूरत
अब खंडहर देख रोना आया
लीपते पोतते घर तो सँवरता
चमकाते रहे क्षणभंगुर सुरत
VRS

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यह नाव जीवन की क्षणभंगुर,
यात्री जाना पर तुझको बहुत दूर,
ठहरेगा तू तट जीवन के थोड़ी देर,
दामन मत छोड़ना कभी धीरज का,
मंजिल अपने नगर की तू पाएगा जरूर।
02.
सोच कर देखिये कि हम कितने क्षणभंगुर
 हैं और हमारे हिस्से में इस ब्रह्मांण्ड का 
कुछ भी नहीं आता। जो कुछ मिला है 
क्या उसे जी लेना उचित नहीं? 
कृतज्ञता हमें भूलनी नहीं चाहिये।









नहीं बाँधूँगी बन्धन क्षणभंगुर
मगर उम्र भर की ख़ातिर,
करते हो अंगीकार अगर मुझको
          तो फिर कहना होगा।
02.
हरी  नाम की जप ले माला -
कटुक वचन मत बोल -
बीत रहा है पल-पल तेरा -
क्षणभंगुर जीवन अनमोल ...!!

फिर मिलेंगे...VRS

10 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात दीदी
    साद की तरह
    एक विषयक प्रस्तुति
    बेहतरीन
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. शुभ प्रभात दीदी
    सदा की तरह
    एक विषयक प्रस्तुति
    बेहतरीन
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात विभा दी,
    "क्षणभंगुर" विचारणीय रचनाएँ है,हमेशा की तरह निराली प्रस्तुति दी।सभी रचनाएँ बहुत अच्छी लगी।
    आभार आपका दी।

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह आध्यात्मिक चितन देती प्रस्तुति दीदी जी नमस्कार।
    सुप्रभात शुभ दिवस।
    क्य करता बंदे मेरा मेरा
    ना तेरा ना मेरा
    जीवन है माटी का ढेरा
    क्षण भर मे ये बिखर मिलेगा
    ना घर तेरा ना घर मेरा।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  6. क्षणभंगुर से सम्बंधित सुंंदर प्रस्तुति..

    जवाब देंहटाएं
  7. तेरा बाबा

    बूढे बाबा का जब चश्मा टूटा
    बोला बेटा कुछ धुंधला धुंधला है
    तूं मेरा चश्मां बनवा दे,
    मोबाइल में मशगूल
    गर्दन मोड़े बिना में बोला
    ठीक है बाबा कल बनवा दुंगा,
    बेटा आज ही बनवा दे
    देख सकूं हसीं दुनियां
    ना रहूं कल तक शायद जिंदा,
    जिद ना करो बाबा
    आज थोड़ा काम है
    वेसे भी बूढी आंखों से एक दिन में
    अब क्या देख लोगे दुनिया,
    आंखों में दो मोती चमके
    लहजे में शहद मिला के
    बाबा बोले बेठो बेटा
    छोड़ो यह चश्मा वस्मा
    बचपन का इक किस्सा सुनलो
    उस दिन तेरी साईकल टूटी थी
    शायद तेरी स्कूल की छुट्टी थी
    तूं चीखा था चिल्लाया था
    घर में तूफान मचाया था
    में थका हारा काम से आया था
    तूं तुतला कर बोला था
    बाबा मेरी गाड़ी टूट गई
    अभी दूसरी ला दो
    या फिर इसको ही चला दो
    मेने कहा था बेटा कल ला दुंगा
    तेरी आंखों में आंसू थे
    तूने जिद पकड़ ली थी
    तेरी जिद के आगे में हार गया था
    उसी वक्त में बाजार गया था
    उस दिन जो कुछ कमाया था
    उसी से तेरी साईकल ले आया था
    तेरा बाबा था ना
    तेरी आंखों में आंसू केसे सहता
    उछल कूद को देखकर
    में अपनी थकान भूल गया था
    तूं जितना खुश था उस दिन
    में भी उतना खुश था
    आखिर "तेरा बाबा था ना"

    जवाब देंहटाएं

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