सादर अभिवादन
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
---
फ़ॉलोअर
मंगलवार, 24 जनवरी 2023
3648 ...बागों में क्या-क्या गुज़रा क्यों नहीं बताती हो तितलियाँ
सोमवार, 23 जनवरी 2023
3647 / आँचल और धूप
नमस्कार ! आज २३ जनवरी है .... नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की जयन्ती .१८९७ में उनका जन्म कटक (उड़ीसा )में हुआ था ....... इन्होने आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया था .......इनका दिया - "जय हिन्द " का नारा हमारा राष्ट्रीय नारा है ...... आज इस मंच से हम इनको याद करते हुए नमन करते हैं .
जय हिन्द !
अब लिंक्स की ओर .......
अब सर्दी कुछ कम हो चली है ....... इस बदलते मौसम में आइये पढ़ें कुछ बेहतरीन रचनाएँ ..... अब सच में आपको पसंद आती हैं या नहीं ये मुझे नहीं मालूम ...... बस जो मुझे पसंद आती हैं उनको यहाँ ले आती हूँ आप सबको पढ़वाने के लिए ...... एक समसामयिक विषय पर जागरूक करता लेख आप सबको भी पढ़ना चाहिए और हो सके तो आवाज़ भी उठानी चाहिए .....
खेलने का फैसला करने से लेकर खेल के मैदान तक सफर
हम सच को स्वीकार नहीं करते
वरना साफ़-साफ़ कह देते
हम मंदिर आते हैं खुद के लिए
कितनी आसानी से सहजता के साथ ये बात कह दी अनीता जी ......मंदिर भी जाते हैं तो हम स्वयं के लिए ... बहुत कम ही होता है कि लोग अपने से इतर दूसरों के लिए सोचें ....... और जो सोचते हैं वो फ़रिश्ते से कम नहीं ...... ऐसी ही एक लघु कथा आप पढ़िए .
ये दोस्त और दोस्ती !
बस एक दोस्त था और उसकी माँ थी , जिसने अपनी माँ के बचपन में ही चले जाने पर उसे दीपक की तरह ही प्यार दिया था। स्टेशन पर लेने के लिए विजय को दीपक ही आया था क्योंकि उसे विजय से मिले हुए बहुत वर्ष बीत गए थे।
अब दोनों ही रिटायर्ड हो चुके हैं। विजय ने ट्रेन से उतरते ही दोनों हाथ फैला दिए गले लगाने के लिए |
इस कथा के साथ ही एक पौराणिक कथा भी मिल गयी पढने के लिए ..... वहाँ भी कुछ दोस्ती की बात है .....
अश्वत्थामा हतो.......! जैसा वाकया पहले भी एक बार घटित हो चुका था
अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा ! महाभारत युद्ध की इस बहुचर्चित घटना की तरह का एक वाकया इसके बहुत पहले भी एक बार घटित हो चुका था ! संयोग से उसके केंद्र में भी श्रीकृष्ण ही थे ! बात उस समय की है जब श्रीकृष्ण के हाथों कंस वध हुआ था ! इस बात से क्रोधित हो कंस के ससुर व मित्र जरासंध ने प्रतिशोध लेने के लिए मथुरा पर हमला कर दिया था ! जरासंध की सेना में दो अपार शक्तिशाली सेनानायक हंस और डिम्भक थे !
पवन प्रकंपित थम जाता माँं!
लट में तेरे अलकों के।
और दहकती अग्नि ठंडी,
तेरी शीतल पलकों में।
माँ को याद करते हुए ले चलती हूँ आपको सुबह की सैर पर ....... पढ़ कर एक बार तो सर्दी महसूस कर झुरझुरी आ ही जाएगी ....... मुझे तो आई .......
जनवरी की एक सर्द सुबह
माघ की मरमरी ठंड को ओढ़कर,
धूप निकली सुबह ही सुबह सैर पर,
छूट सूरज की बाँहों से भागी, मगर
टूटे दर्पण-सी बिखरी इधर, कुछ उधर !
इस गुनगुनी धूप में अक्सर देखा है कि बच्चे पार्क में खेलते हुए पकड़ते हैं तितलियाँ ....... और जब कोई तितली आ जाती है हाथ तो कितना प्रसन्न होते हैं ये वो ही अनुमान कर सकते हैं जिन्होंने बचपन में तितलियाँ पकड़ी होंगी ........ मैंने तो बहुत पकड़ी हैं ..... लेकिन कुछ लोगों की अजब गजब ख्वाहिश होती है ..... कभी सुना नहीं कि तितलियों का अलग से कोई टापू भी होता है ........ खैर आप तो पढ़िए ये कविता .....
तितलियों के टापू पर...
चिकोटी काटकर,
खिले-अधखुले फूलों के
चटकीले रंग चाटकर
बताओ न गीत कौन-सा
गुनगुनाती हो तितलियाँ?
रविवार, 22 जनवरी 2023
3646....गंगा सा पावन मन लेकर भारत का परचम लहराते।
जय मां हाटेशवरी.....
एक बहुत लंबे अंत्राल के बाद.....
पुनः उपस्थित हूं.....
प्रयास रहेगा नियमित रहूं......
बिना देर किये पढ़ते हैं आप सब की बहुत खूबसूरत रचनाएं.....
मशाल जलते रहे - -
औराक़ ए ज़िन्दगी की थी अपनी ही अलग मज़बूरी,
कागज़ी फूल की तरह, इश्क़ का सिलसिला निकला,
बहुत दूर बियाबां पहाड़ियों पे हैं, कुछ बादलों के साए,
हद ए नज़र के उस पार, सदियों का फ़ासला निकला,
जलते आग पे हाथ रख कर ली थी अहद ए इन्क़लाब,
मशाल जलते रहे, लेकिन मीर ए कारवां बुझा निकला,
क्यों हो उसका उपहास -
तभी मैंने तुमसे अनुरोध किया
वह कोई खिलोना नहीं जिससे
खेला और फैक दिया ज़रा समझो |
मन को बड़ी ठेस लगती है
इस प्रकार के व्यबहार से
तुम्ही उसे समझा सकते हो
मुझे यही कहना है तुमसे |
मौनी अमावस्या
स्नान दान कर हुए प्रफुल्लित
खुशियां जग फैलाएं
खुशी हुए परिवेश में
जाके, धारा विकास की लाएं।
रोग दोष ईर्ष्या विद्वेष से
मुक्त , भजन सब गाते
गंगा सा पावन मन लेकर
भारत का परचम लहराते।
माया के जो पार हुआ है
अहंकार का कोई स्थान ही नहीं है। अहंकार सदा अभाव का अनुभव करता है, जो है, उसे न देखकर जो नहीं है। उसकी कल्पना में मन को लगाता है। किंतु यदि उसे सारे संसार का वैभव भी प्राप्त हो जाए तो भी वह अभाव का अनुभव ही करेगा, क्यंकि वह कुछ है ही नहीं। आत्मा के साथ जुड़ने से मैं पूर्णता का अनुभव करता है। हर अभाव एक माया है और हर पूर्णता एक सत्य !
छब्बीस दोहे "मुखरित है शृंगार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मिल जाती हैं आँख जब, तब आ जाता चैन।
गैरों को अपना करें, चंचल चितवन नैन।
--
मोती जैसी सुमन से, टपक रही है ओस।
सौरभ और पराग-कण, कलियाँ रहीं परोस.।
यादें उन दिनों की
अब
इन दिनों
न तो वह शर्मीलापन है
धूप में ,
और न ही तुम्हारे आने की
आहट।
है तो बस
शेष एकांकी
जीवन और प्रतीक्षा
भर।
फिर मिलेंगे।
धन्यवाद।
शनिवार, 21 जनवरी 2023
3645.. मौन

हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
ज्योतिषाचार्य का कहना है कि सिर्फ मुँह से न बोलना मौन नहीं होता। मौन वास्तव में आपके मन के शुद्धिकरण की प्रक्रिया का हिस्सा है। मौन का मतलब आपके अंतर्मन की शांत, स्थिर और निर्मल बनाने से होता है। इस दिन मौन रहकर व्यक्ति को अपने मन में भी किसी तरह के गलत विचारों को नहीं लाना चाहिए। शांत रहकर खुद के अंतर्मन में झांकना चाहिए और मन की अशुद्धियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए और एकाग्र होकर प्रभु के नाम का स्मरण करना चाहिए। यह एक तरह का तप जैसा है। अगर कोई व्यक्ति पूरे दिन मौन नहीं रह सकता तो कम से कम स्नान और दान पुण्य से पहले मौन व्रत जरूर रखे। इससे आपके अंदर की नकारात्मकता दूर होती है और आध्यात्मिकता का विकास होता है।
मौन भी आनंद है
मौन भी प्रकृति है
मौन भी अनंत है
मौन भी आयाम है
मौन भी आगाज़ है
मौन भी आवाज़ है
‘फैलेगा-फैलेगा हमारा मौन… समुद्र के पानी में नमक की तरह… नसों में दौड़ते रक्त में घुलता हुआ पहुंचेगा दिल की धड़कनों के बहुत समीप….और बोरी से रिसते आटे सा, देगा हमारा पता… हमारे मौन के धमाके से बड़ा उस वक्त कोई धमाका नहीं होगा. (मशहूर कश्मीरी कवि डॉ शशि शेखर तोशखानी की कविता की चंद लाइनें)!
धर्म रक्षा के लिए हथियार ना उठाओगे !!
आने वाली पीढियों को क्या मुंह दिखाओगे !!
विधर्मी के रक्त से ये धरा अब शुद्ध हो
कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो !!
आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए ?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन :
बिना निशान की क़ब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएँ
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
उनके पास कविता का कारखाना नहीं है। खेत है और बीज हैं। सिंचाई के लिए नदी का पानी है। लोहे के बन्द और लकड़ी से बना हाथा है, जिसके लिए उन्हें पहले बढ़ई के पास जाना पड़ा और फिर लोहार के पास भी। कुल मिलाकर वह 'हाथा मारने वाले' लेखक हैं।
"काग़ज़ पर मैं उतना अच्छा नहीं लिख पाता
इसलिए खेत में लिख रहा था
अर्थात हाथा मार रहा था।"
शुक्रवार, 20 जनवरी 2023
3644...उम्मीद की एक किरण
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
भोर की भाग-दौड़
और व्यस्त सी दिनचर्या से
चुरा के फ़ुर्सत के दो पल
मैं जब तक..,
पहुँचती हूँ खिड़की के पास
तब तक ..,
"कैसे इतना विश्वास करते हो?"
"मुझे जिसने पाला उसने अपनी अंतिम सांस लेते हुए कहा!"
"क्या उसने यह नहीं बताया कि तुम्हारी माँ कहाँ रहती है?"
_____////_____
गुरुवार, 19 जनवरी 2023
3643...लावारिस बच्चे जब देखे ख़ैर मनाना सीख लिया...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ (सुश्री) शरद सिंह जी की रचना
से।
सादर अभिवादन।
नए गुरुवारीय अंक में पाँच चयनित रचनाओं के लिंक्स के साथ
हाज़िर हूँ।
आइए अब पसंदीदा रचनाओं का रसास्वादन कीजिए-
कुछ ही ऐसे मोती होते
जिन में आव स्थाई रहती
यही स्थाईत्व बहुत कम
जिन मोतियों में रहता वे ही सच्चे होते .
अब यह सड़क जगह-जगह से
टूट-फूट गई है,
किसी काम की नहीं रही,
पर अच्छा नहीं लगता
कि कोई सड़क इस हाल में रहे.
शायरी |
ग़ज़ल | सीख लिया |
डॉ (सुश्री) शरद सिंह
अपने ही
ख़्वाबों से
मैंने
अब कतराना सीख लिया।
लावारिस बच्चे
जब देखे
ख़ैर मनाना
सीख लिया।
रिश्तों की तर्जुमानी है बस
लफ़्ज़ों का
हेर फेर, गुलाब के दामन में रहता
है काँटों का घेरा, हृदय पिंजर
में कहाँ रुकता है सुख -
पाखी, आँखें खुली
शून्य हुआ
रैन-
बसेरा।
जीवन-घट जल अधिकांश बीत, रीत गया
पहुँचे सभी को प्रणाम और जुहार विनत,
बोले-अनवोले
मीत,पांथ-पथिक संग-नित,
*****
फिर मिलेंगे।
बुधवार, 18 जनवरी 2023
3642.. कटघरे में शमा है..
।।उषा स्वस्ति।।
"रवि-मोर सुनहरा निकला,
पर खोल सबेरा नाचा,











