निवेदन।


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गुरुवार, 6 अगस्त 2026

4826...जो झूठ के पुल बाँध रहा था, वह झेंप खड़ा रह जाता है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

भार्गव राम खण्डकाव्य - 45

एक सखी  कह रही सखी से,

जनक  लली  कर्पूर  सी  गौर।

राम दिख रहे कुछ काले काले,

दूजी सखी राम  केश  घुँघराले।।

*****

रहना नहीं इधर न रहो पर उधर नहीं ...

आँखों में आंसुओं का जो सैलाब है जमा,
लोगों पे आज़माना इन्हें मेरे पर नहीं,

महसूस कर सकोगे जो बैठोगे आस-पास,
शबनम की बूँद हूँ मैं दहकता शरर नहीं,

'झ' से शुरू होने वाले हिंदी मुहावरों की कविता (भाग-1)

जब उम्मीदों पर झाड़ू फिरती, तब होश ठिकाने आता है,
जो झूठ के पुल बाँध रहा था, वह झेंप खड़ा रह जाता है।

तब अपनी ही नादानी पर, मन ही मन झख मारते हैं,

जो बैठे थे भाग्य भरोसे, वो झक मारकर हारते हैं।

*****

कांधला के विश्व विख्यात पंडित व्यक्तित्व

5-डा. शिखा कौशिक "नूतन" - प्रसिद्ध साहित्यकार, क्योंकि औरत कट्टर नहीं होती - लघु कथा संग्रह पर उत्तर प्रदेश सरकार के पंडित बद्री प्रसाद "शिंगलू" सम्मान से सम्मानित.

6-शालिनी कौशिक एडवोकेट - बार एसोसिएशन कैराना की दो बार प्रथम कनिष्ठ महिला उपाध्यक्ष और साइबर क्राइम पर "क्राइम का चक्रव्यूह-साइबर क्राइम-एक समग्र अध्ययन" हिन्दी में पुस्तक लिखने वाली कांधला सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रथम लेखिका.

*****

 जब जिद ठान ली (संस्मरण)

खेतों में ट्रैक्टर चलते देख हमने उसपर चढ़ाने की जिद की।चाचा ने कहा जाओ अंदर टेबल पर स्वीच बोर्ड है उसका हरा बटन दबा दो तब ट्रैक्टर पर चढ़ाएंगे।जब हमने हरा बटन दबाया तो मोटर चलने की बड़ी तेज आवाज हुई। घबराकर दोनों बहनें जोर से चीखती हुई एक-दूसरे से लिपट गई।दादाजी ने सोचा हमें करेंट लग गया। चाचा से गुस्से से कहा-मार दिया न दोनों को? चाचा ने जाकर जब हमें सही -सलामत देखा तो मन बहलाने के लिए  खेतों की ओर ले चले।एक खेत में घूसते ही हमें भूतों के दर्शन होने लगे। बिना सिर बारे भूत, खेतों में बोझ ढोते सिर्फ दो पैरों वाले भूत,खेतों में कीचड़ से नहाये, पौधे उखाड़ते भूत। पेड़ों पर झूलते और उछल-उछल कर चढते-उतरते हुए भूत।एक बूढ़ी खेत की क्यारी पर बैठी दो बच्चों को अपने पास पकड़कर बैठाई थी,उनके बाहर निकले बड़े-बड़े दातों को देख हमने उन्हें किचिन मान लिया।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव  


बुधवार, 5 अगस्त 2026

4825..अंतिम बूंद

 भोर वंदन 

"सूरज की- 

एक किरण पीपल के पत्ते पर ठहरी है !

एक किरण बेले के फूलों पर फिसली है !

एक किरण ताल की तरंगों पर थिरकी है !

एक किरण शिशु की दाँतुलियों पर बिहँसी है..!!"

 त्रिलोचन

चलिए नियत समयानुसार आज की प्रस्तुति में ...

काकी की चिंता

 फोन आया है काकी का गांव से 

इस बार अषाढ नहीं बरसा 

खेत सब उपटे पडे हैं 

इस बार आम भी नहीं फले थे 

बिना खाद पानी के ..

✨️

अंतिम बूंद - -


ईथर की तरह विलीन हो जाएंगे

एक दिन सभी अंतर के सुप्त

दहन, उम्र से लंबी है

चाहतों का

सूचीपत्र,

अंतिम

बिंदु में भी लगे ठहरा हुआ सा

ख़्वाहिशों का एक बूंद इत्र,..

✨️

हमारे हाथ जले उन ही दीयों से 'ग़ाफ़िल'

जिन्हें हवा के थपेड़ों से हम बचाए हैं

-'ग़ाफ़िल'

✨️

परिवेश

अफसोस, कि अब ये

कैसा ज़माना आ रहा है,

बोलने को तो गद्दार ..

✨️

माफ़ी

 जड़ से सबको साफ़ किया

फिर कहते हैं माफ़ किया !

लाठी-गोली बच्चों को दी

कहते हैं इंसाफ़ किया।

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️



मंगलवार, 4 अगस्त 2026

4824.....मन का ऑंगन भी बड़ा विचित्र है

 मंगलवारीय अंक में
आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
---------

एक हाथ में जीवन उसके,

दूजे हाथ विनाश का साया।

समझ न पाया कोई अब तक,

क्या है इस प्रकृति की माया!

​सृजन भी उसका और प्रलय भी,

कैसा यह अद्भूत चक्र रचाया!

--------

आज की रचनाऍं- 



काकी कहती है 
गांव में घर होना जरुरी है 
साल में दू बार गांव आना जरुरी है 
नहीं तो हो जाते हैं  देवता पितर नाराज 
और कहती हैं देना है पातैर (प्रसाद) 
नये अन्न के आने पर 
लेकिन अभी तक खेत रोपा नहीं गया 
बरखा नहीं हई आषाढ में ! 

रीलों में सिमटी पीढ़ी


लाइक्स की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते,
रिश्तों का आँगन भूल गए।
सच की धूप से मुँह मोड़ लिया,
फ़िल्टर वाले सच कबूल गए।

शब्द बड़े, पर कर्म अधूरे,
ज्ञान बिना ही ज्ञान बाँटते।
मेहनत से जो रिश्ता टूटा,
शॉर्टकट में भविष्य छाँटते।

संवाद

लेकिन…,
 भीतर ही भीतर अनगिन वृत्ताकार
तरंगों के जाल में गुम्फित 

मन का आँगन भी
बड़ा  विचित्र है 


मित्रता 

जब जी चाहा 
रो लिए जाकर उसके पहलू में 
और हल्का कर लिया अपना मन,
जब जी चाहा 
झगड़ लिए और शांत कर लिया अपना गुस्सा, 
जब जी चाहा 
डाँट दिया और खुद निर्द्वंद्व हो गए,  
जब जी चाहा 
छेड़-छेड़ कर उसे रुला दिया 
और खुद मज़े लेते रहे !

धीमी ऑंच



मिट्टी के चूल्हे-सी सुलगें साँसें,
लकड़ी-सी ख़ामोशी धीरे जले।
यादों का सिल-बट्टा बोल उठे,
बातों की चटनी तब अच्छी लगे।
नमक ज़रा बस चुटकी भर हो,
गुड़-सी हँसी को जरा घुलने दो।

धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो।


-----------

आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

4823 नया विषय, नया अंक गाड़ी ओव्हरनाईट लेट हो गई

 सादर अभिवादन 


प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः
नया विषय, नया अंक
गाड़ी ओव्हरनाईट लेट हो गई
सोचने में लगाम नहीं ..अलक ही क्यों
कविता क्यों नहीं सो अगली बार कविता भी साथ में 

अगस्त का महीना, राष्ट्रीय उत्सव भी है
भारतीय स्वतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामनाएँ

सो अगला अंक 16 अगस्त 26 को
इसके लिए रचना प्रेषण तिथि 14 अगस्त 26 तक
नया विषय है आजादी, स्वतंत्रता


चलिए चलते है संग्रह की ओर




आज सभागार के बीच में चित्रकार ने एक बड़ा-सा दर्पण रख दिया था- भीड़ उसके सामने जमा हो गई थी- कुछ लोग बाल सँवार रहे थे, कुछ अपने चेहरे पर मुस्कान चढ़ाने में लगे थे, कुछ अपने गर्दन का कोण बदलने में-
जबकि दीवारों पर सजे हर चित्र में चेहरा अलग था—किसी की आँखें बड़ी, किसी की नाक टेढ़ी, किसी की त्वचा सांवली, किसी के बाल बिखरे।   




एक आदमी ने एक बहुत ही खूबसूरत लड़की से शादी की। शादी के बाद दोनो की ज़िन्दगी बहुत प्यार से गुजर रही थी। वह उसे बहुत चाहता था और उसकी खूबसूरती की हमेशा तारीफ़ किया करता था। लेकिन कुछ महीनों के बाद लड़की चर्मरोग (skinDisease) से ग्रसित हो गई और धीरे-धीरे उसकी खूबसूरती जाने लगी। खुद को इस तरह देख उसके मन में डर समाने लगा कि यदि वह बदसूरत हो गई, तो उसका पति उससे नफ़रत करने लगेगा और वह उसकी नफ़रत बर्दाशत नहीं कर पाएगी।



माता के जागरण के लिये कुल चंदे से आयी रकम : 23900 रुपये
माता के जागरण पर कुल खर्च : 8600 रुपये
बचत (लाभ) : 15300 रुपये
आयोजक नशे में धुत्त, संख्या में कुल तीन. तीनों ने अपने हिस्से का 5100 रुपये लिया और अपना-अपना जाम उठा लिया.
नेपत्थ्य से बाहर :
जागरण चरमोत्कर्ष पर. माँ का गुणगान जारी :
माता तेरी लीला अपरम्पार
मेरा भी कर दे बेड़ा पार ...


कल्पना - अनीता जी


वह बस स्टैंड पर खड़ी थी, बस आयी नहीं थी, 
बस आने वाले थी।अचानक उसने ज़ोर से कहा, थैंक्स, थैंक यू वेरी मच, 
लोग चौंक कर उसकी ओर देखने लगे। उसने ख़ुद भी स्वयं को देखा, 
अरे, यहाँ तो वह मंच नहीं था, जहाँ उसे पुरस्कार दिया जा रहा था। 
कल्पना में वह सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार ले रही थी।




अमित अरे माँ, बस इतनी सी बात,
तुम कहो और मैं ना आऊं,
ऐसा हो सकता है भला..???
मन में फूट रहे लड्डूओं की आवाज
छिपाते हुए बेटे जी ने जवाब दिया
सोच रही थी कि एक बार तुम दोनों मिल लेते तो...


इनके अलावा तीन नियमित रचनाएं भी परोस रहा हूँ





अपने दम पर छाया को ख़ुद 
घर बुला कर देखिए 

आएगी ख़ुशबू ही ख़ुशबू 
बस जरा हस्ती मिटा कर देखिए 







क्या आपने जूट की लकड़ी देखी है?
मेरे यहाँ पाटखोड़ी कहते हैं इसे, 
पतली-सी होती है,कमज़ोर सी,
पाँव पड़ते ही टूट जाती है,
पर जब यह जलती है,




मन एकांगी नहीं है 
यहाँ द्वैत है 
या कहें द्वैत ही मन है
बह ही नहीं सकती 
दो तटों के बिना नदी मन की ! 


सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 2 अगस्त 2026

4822...सच ही सोचेंगे सच ही खोदेंगे ...

 शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.सुशील कुमार जोशी जी की रचना से.

सादर अभिवादन.

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ (अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

भार्गव राम खण्डकाव्य - 43

मंच  पर शोभित था  पिनाक,

जयमाल शोभित सिया हाथ।

जो  वीर पिनाक तीर संधान,

गले जयमाल  सिया के हाथ।।

*****
सारी बोझिलता ,थकान, 
एकाकीपन समर्पित कर
अंधेरे को
सॉंझ की बाती
मौन प्रार्थना में
 प्रज्जवलित करती है
भोर के प्रति विश्वास...।

*****
अंतिम बूंद - -
हाथों में,
*****
*****
सूचना:
इस अंक में चयनित रचनाओं के संबंधित ब्लॉग पर हमारी ओर से भेजा जा रहा आमंत्रण: "<i><B> आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 02 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....<a

href=http://halchalwith5links.blogspot.in>

http://halchalwith5links.blogspot.in </a>पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

  </B></i>!"

प्रकाशित नहीं हो पा रहा है, शायद तकनीकी कारण हों. असुविधा के लिये खेद है.

कल लघुकथा का प्रथम अंक प्रकाशित होगा.

फिर मिलेंगे।
 
रवीन्द्र सिंह यादव 


शनिवार, 1 अगस्त 2026

4821 ..गगन झुका धरती को छूने, छाई मधुर उमंगिया।

सादर अभिवादन 
स्वागत है अगस्त 


बड़ी बात कह डालने का अवसर आ गया
एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट-- 

विषय था "कल्पना" 
तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए 
रचना भेजने की अंतिम तिथि 30 जुलाई 2026 थी
इस प्रथम अंक को लेकर आएंगी श्वेता जी
अगले अंक का विषय भी दो तारीख को ही बताएंगे
प्रथम अंक पाक्षिक का अवलोकन करें दो अगस्त को


मेरी पसंदीदा रचनाएं




हम सभी ने महसूस किया है कि जब भी ये दोनों कहीं भी, कभी भी प्रसारित होते हैं तो तन-बदन में एक ऊर्जा सी भर जाती है ! दिल-ओ-दिमाग गौरवान्वित हो उठते हैं ! तन-बदन में एक लोमहर्षक रोमांच का अनुभव होने लगता है ! ना जाने क्या जादू छिपा है इनके शब्दों में कि पूरे शरीर में  देशभक्ति की लहर सी दौड़ जाती है ! हर देशवासी का फर्ज है, कर्तव्य है कि उसे तो ये दोनों रचनाएं कंठस्त हों ही, यह भी सुनिश्चित हो कि आने वाली पीढ़ियां भी इनसे पूर्णतया परिचित हों ! 
जय हिन्द ! वंदे मातरम !!





प्रतिकार के इस स्वर को
एक दिन
गालियों से परे
अपना मुहावरा गढ़ना होगा।

तंग गलियों से निकलकर
पहचान बनानी होगी।





हर डाली पर मुस्कुराती बहार,
मन को देती प्रेम का उपहार।
मंद पवन जब इन्हें सहलाती,
हर कली मधुर गीत सुनाती।




अब सीमा सीने का दर्द भूलकर काल्पनिक अपमान के दर्द को महसूस करने लगी। “नहीं भगवान! प्लीज आज मत मारना। आज ना तो मैं प्रिपेयर हूँ और ना ही मेरा घर।” यही प्रार्थना करते-करते सीमा गहरी नींद में सो गई







बड़ी उदास थी जो रे धरती, ओढ़ी हरी चुनरिया,
गगन झुका धरती को छूने, छाई मधुर उमंगिया।
बादल ने जब ढोल बजाया, बिजली चम-चम चमकी,
पूरब की इस ठंडी हवा में, हर एक कलियाँ महकी!


सादर समर्पित
सादर वंदन

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