शुक्रवारीय अंक में
फोडूँ शीशा ए दिल, न नज़र आऊँ उनको।
दूर तलक हर सिम्त परछाईयाँ नुमाया है,
कैसे मैं बात करूँ कहाँ से लाऊँ उनको...।
कल का विशेष अंक लेकर
आ रही हैं प्रिय विभा दी।
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
कल का विशेष अंक लेकर
आ रही हैं प्रिय विभा दी।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
वातावरण में तापमान लगातार बढ़ रहा है अतः#धूप में निकलने या ज़्यादा देर रहने की स्थिति में अपना बचाव करें। अधिक तेज़ धूप हमारे शरीर से इलेक्ट्रोलाइट्स(सोडियम,पोटेशियम,क्लोराइड,मैगनीशियम आदि) को पसीने के साथ बाहर निकाल देती है। धूप में पसीना आना स्वाभाविक प्रक्रिया है। पसीना हमारे शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। जब पसीना लगातार निकल रहा हो और हम पानी न पिएँ तो शरीर में पानी की कमी के चलते पसीना आना बंद हो जाता है और शरीर का तापमान, रक्तचाप बढ़ने लगते हैं। शरीर रक्त गाढ़ा होने से उसका प्रवाह धीमा हो जाता है तब ह्रदय को ऑक्सीजन के साथ यह गाढ़ा रक्त संपूर्ण शरीर में पहुँचाने में भारी मशक़्क़त करनी होती है। यह स्थिति #डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी और नमक की कमी) होती है।
शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स और पानी की कमी को दूर करने के लिए प्रकृति ने इलाज के रूप में ककड़ी, तरबूज़ और ख़रबूज़ा इसी मौसम में उपलब्ध कराए हैं जिन्हें उपभोग से पहले नमक और स्वच्छ पानी से अवश्य धोना चाहिए।
आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
पर सोचती हूँ
कहीं समय
ना
निकल जाए हाथो से
केवल रेत ही
रह जाएगी
रिक्त हाथों
में।
श्वासों का आयाम बढ़े जब
सारा विश्व समाता इनमें,
एक ऊर्जा है अनंत जो
ज्योति वह प्रदाता जिसमें!
सुनो अभिनेता,
तुम भी चले जाओ,
किसी ने ताली नहीं बजाई,
इसका यह मतलब नहीं है
कि तुम्हारा अभिनय बुरा था.
कविता | आई शपथ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
यादों के साथ जीना
और सीने पर
दुनियादारी का
पत्थर रख कर
आंसुओं को पीना
आसान नहीं है,मित्र!
तुलसी तले, माटी का जब प्रदीप जले,
हथेली पर काजल से, मनमीत लिखना,
पीपल के पातों में रुक जाएँ हवाएं, न-
बुझे लौ दुआ के इसे बहुगुणित लिखना,
चलते-चलते पढ़िए एक नवीन शैली की चिंतनपरक कटाक्ष करती लघुकथा-
"आप भी न राजन! आप
चुप रह नहीं सकते और मैं ठहर नहीं सकता!"
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
।।उषा स्वस्ति।।
गले पड़े जो ढोल बजाना मत
खुले अगर कुछ पोल छुपाना मत
छुई-मुई मालूम नहीं कब तक
रचे-बसे दिल खोल चिढ़ाना मत..
💮
तुम तो कभी मेरी सुनते ही नहीं
जितनी बार की प्रतीक्षा तुम्हारी
कभी आशीष तक ना दिया तुमने |
मेर्रे मन को ठेस लगी है
💮
ट्रिन ट्रिन
"..."
"हेल्लो !"
"..."
"तुम्हारा उद्देश्य यही था न, अपने प्रति विशेष ध्यान दिलवाना और हर किसी को तुम्हारे प्रति आकर्षित कराना?"..
💮
रेत पे लिखे अल्फ़ाज़ हैं लहरें मिटा जाएंगे,
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️
सादर अभिवादन
सादर अभिवादन
जय मां हाटेशवरी.....
सादर नमन.....
जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते
वो जिंदगी में नया रंग ला नहीं सकते
जो रास्ते के अँधेरों से हार जाते हैं
वो मंजिलों के उजाले को पा नहीं सकते
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो
जान आयी मुर्दों में,शमशान शहर हुए, शानो सम्मान फतह का मुकाम आया। खत्म हुए गुब्बारो गंद युगों के छाए, गुरु सिक्खीका उजला आसमान आया।
बीती रात न बातें थीं न सितारे और न सुकून । वेदों ने हमको दिया, आदिकाल में ज्ञान। इनके जैसा है नहीं, जग में छ्न्दविधान।
कड़ी मेहनत ,पूर्ण लगन जब हो दिल में ,वक़्त भी शायद उसकी परीक्षा है लेता गर ठान लिया मन में तो चीर सकता है पर्वत का सीना भी हर इंसान सिर्फ हवाई घोड़े कल्पना में दौड़ाकर कामयाब ना हुआ कोई इंसान
बरसों बाद भी, उजड़े
हुए गुलशन को
लफ़्ज़ों से
संवारता
है,

हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
मनुस्मृति के इस श्लोक के अनुसार ब्राह्मणों के छह कर्म हैं साधारण सी भाषा में कहें तो अध्ययन-अध्यापन (पढ़ना-पढाना), यज्ञ करना-कराना, और दान देना-लेना , इन कार्यों को दो भागों में बांटा गया है। धार्मिक कार्य और जीविका के कार्य अध्ययन, यज्ञ करना और दान देना धार्मिक कार्य हैं तथा अध्यापन, यज्ञ कराना (पौरोहित्य) एवं दान लेना ये तीन जीविका के कार्य हैं ब्राह्मणों के कार्य के साथ ही इनके दो विभाग बन गए एक ने ब्राह्मणों के शुद्ध धार्मिक कर्म (अध्ययन, यज्ञ और दान देना) अपनाये और दूसरे ने जीविका सम्बन्धी (अध्यापन, पौरोहित्य तथा दान लेना) कार्य जिस तरह यज्ञ के साथ दान देना अंतर्निहित है
दूसरे यह कि मैथिल परमहंस महोपदेशक नामक एक महात्मा ने भी 'ब्राह्मण सम्बन्ध' नाम की एक छोटी-सी पुस्तक लिखी है। यद्यपि उसमें विशेष रूप से मैथिलों और भूमिहार ब्राह्मणों के ही सम्बन्ध दिखलाए गए हैं। तथापि उसके चौथे पृष्ठ में लिखा है कि 'पंजी के पूर्व मैथिल, कान्यकुब्ज, सरवरिया और पश्चिम ब्राह्मण में सम्बन्ध था,' इत्यादि।इसी जगह यह समझ लेना चाहिए कि मैथिल ब्राह्मणों में दो प्रकार के विवाह प्रचलित हैं, एक तो उनकी सौराष्ट्र की केवल विवाह संबंधिनी सभा में होता है, जहाँ पर कन्या विक्रय प्रधान धर्म माना गया है।
पंडित अयोध्या प्रसाद ने अपनी पुस्तक "वप्रोत्तम परिचय" में भूमिहार को- भूमि की माला या शोभा बढ़ाने वाला, अपने महत्वपूर्ण गुणों तथा लोकहितकारी कार्यों से भूमंडल को शुशोभित करने वाला, समाज के हृदयस्थल पर सदा विराजमान- सर्वप्रिय ब्राह्मण कहा है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "बाणभट की आत्मा कथा " में काशी के भूमिहार ब्राहमणों को भूमि अग्रहार ब्राह्मन की संज्ञा दी है एवं उन परिस्थितियों की चर्चा की है जिनमे भूमिहार ब्राहमणों ने वैदिक कर्मकांड को छोड़कर सामंती वृति अपनाना पड़ा।
आज की परिस्थिति ऐसी है कि महाराष्ट्र जो कि पेशवाओं की प्रमुख कर्मभूमि एवं जन्मभूमि रही है वहां कोरेगांव जयंती जैसी शर्मनाक कार्यक्रम का आयोजन करके पेशवाओं के साथ गद्दारी करके हरा के उनकी हार का जश्न मनाया जाता है तब किसी पार्टी का मुंह नहीं खुलता है लेकिन जब सर्वोच्च न्यायालय के एक सही निर्णय के खिलाफ यही तथाकथित शोषित वर्ग जब पब्लिक प्रॉपर्टी को नष्ट करते हुए हल्ला बोलते हैं तब तुरंत वर्तमान सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ दो दो बार पुनर्विचार याचिका दायर कर दिया जाता है, अंत में बस भारत सरकार से यही एक अनुरोध है कि 125 करोड़ भारतीय आपके सन्तानतुल्य है और पिता का कर्तव्य होता है कि सन्तान जब मार्ग से भटके तो उसे सही मार्ग बताये ना कि मार्ग भटकाये और भ्रम पैदा करे क्योंकि वर्तमान भारत सरकार ने न्यायालय के फैसले के खिलाफ जो पुनर्विचार याचिका दायर की है वो आग में घी डालने का कार्य कर रही है और इससे यह भी सिद्ध होता है कि भारत सरकार भी इतिहास शायद बॉलीवुड के उन फिल्मों से सीखते हैं जिसमें मनगढंत कहानी बनाकर ब्राह्मणों और क्षत्रियों को हमेशा विलेन बताया जाता है ।
हाँ, यह जरूर है कि बदले में कोई उपकार कराने के लिए दान न दिया जाय। अस्तु! यह तो संक्षिप्त हाल अन्त्येष्टि का है। इसी तरह श्रावणी आदि जितने कर्म प्रतिवर्ष होते हैं उन्हें ब्राह्मणसमाज एक प्रकार से भूल-सा गया है और उनकी जगह पर कुछ और किया करता है। या यों भी कह सकते हैं, कि लोग कुछ भी करते-कराते ही नहीं। इसलिए यदि ब्राह्मण समाज की इच्छा है कि हमारी सत्ता दुनिया में रहे। हम भी दुनिया में मान्य और पूज्य रहें, जैसा कि पूर्वकाल में वास्तविक रूप से थे और अब भी लोगों की मूर्खता से लाभ उठाकर अपना प्रभुत्व येन-केन-प्रकारेण् स्थिर कर रखा है, पर, कालचक्र वश वह प्रभुत्व अब रहनेवाला प्रतीत नहीं होता, तो ब्राह्मणमात्र को उचित है कि चाहे वह याचक दलवाला हो, या अयाचक दल वाला, अपने संस्कारों को, जो मृतप्राय अथवा मृत ही हो रहे हैं, सबसे प्रथम ठीक करे, उनको पुनर्जीवन दे और रूपान्तर में परिणत या नष्ट हो रहे हैं उन्हें यत्न करके अपने असली रूप में ला दे।