निवेदन।


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शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

अच्छा संकेत है देश अच्छी दिशा में जा रहा है.......अंक सत्ताईस

सादर अभिवादन बाद में
पहले एक सही 

और सटीक
समाचार है कि
अच्छा संकेत है देश अच्छी दिशा में जा रहा है
सत्ता ईशों का कथन ऐसा ही है....

सादर अभिवादन...

चलिए चलें..... आगे बढ़ें..


छोटे छोटे टांको से 
दर्द की तुरपाई की
खिलखिलाहट पैच
दरके की भरपाई की


बादल...
धूप...
पवन...

बारिश...
छाँव...
सिहरन..


अच्छा संकेत है 
देश अच्छी दिशा 
में जा रहा है 
‘उलूक’ की आदत है 
लिखे जा रहा है 
क्या फर्क पड़ता है 
कौन पढ़ने आ रहा है । 


सोच बात नई उड़ान की, 
नए ख्बाव बुन 
मेरे अल्फ़ाज़ों पर न जा, 
तू मुझको सुन । 


नही सुलझा पायी,
उन उलझनों को जिसमे..
तुम उलझा कर गये थे...
बंध सी गयी उन उलझनों में,


आज्ञा दीजिए....
देवी जी अपने 

स्वास्थ्य फॉलो-अप के लिए
चेन्नई गई हुई है
संभवतः सोमवार को फिर मिलेंगे

स्वतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामनाएँ..
-दिग्विजय













गुरुवार, 13 अगस्त 2015

दिमाग वालों की दुनिया में दिल ढूँढना भी एक कला है..... अंक छब्बीसवाँ

सादर अभिवादन...
फिर उपस्थित हूँ...
अपनी पसंदीदा रचनाएं ले कर....


माना कि इस दुनिया में हर शख्स ठोकरों से पला है,
दिमाग वालों की दुनिया में दिल ढूँढना भी एक कला है.!!

तो चलें ....

एक अहदे वफ़ा अब हुआ चाहिए
साथ हमको सनम आपका चाहिए

अब तलक ख़ूब लू के थपेड़े सहे
चाहिए बस हमें अब सबा चाहिए


जन्मदिन तुम्हारा 
सार्थक है मेंरे लिए 
नव जीवन दिया 
मेरी जिन्दगी में आकर,.. 
तुमने मुझे अपनाकर,.. 


धीरे धीरे सरकते हुए 
पता ही नहीं चला कब 
दूरियां इतनी बढ़ गयीं 
कि हम दो किनारे हो गये


तेरे जैसे फालतू 
निर्दलीय के लिये 
बता कौन करायेगा 
डेढ़ रुप्पली के घपले 
करने की आदत 
हो जिसको उसे
देख कर स्टिंग करने 
वाले के साथ का कैमरा 
और कैमरे वाला 
भी शर्मायेगा 


पूर्णिमा वर्मन के पांच नवगीत
कितने कमल खिले जीवन में
जिनको हमने नहीं चुना

आज की मेरी पसंद
प्रस्तुत है.....
विदा दोस्तों
-दिग्विजय














बुधवार, 12 अगस्त 2015

आनंद का 25वां संकलन...अंक 25



जय मां हाटेशवरी...

हैफ़ जिस पे कि हम तैयार थे मर जाने को,
यकायक हमसे छुड़ाया उसी काशाने को।
आसमां क्या यहां बाक़ी था ग़ज़ब ढाने को?
क्या कोई और बहाना न था तरसाने को?
फिर न गुलशन में हमें लाएगा सैयाद कभी,
क्यों सुनेगा तू हमारी कोई फरियाद कभी,
याद आएगा किसे ये दिले-नाशाद कभी,
हम कि इस बाग़ में थे, कै़द से आज़ाद कभी,
अब तो काहे को मिलेगी ये हवा खाने को!
दिल फ़िदा करते हैं, कुर्बान जिगर करते हैं,
पास जो कुछ है, वो माता की नज़र करते हैं,
ख़ाना वीरान कहां, देखिए घर करते हैं,
अब रहा अहले-वतन, हम तो सफ़र करते हैं,
जा के आबाद करेंगे किसी विराने को!
देखिए कब यह असीराने मुसीबत छूटें,
मादरे-हिंद के अब भाग खुलें या फूटें,
देश-सेवक सभी अब जेल में मूंजे कूटें,
आप यहां ऐश से दिन-रात बहारें लूटें,
क्यों न तरजीह दें, इस जीने से मर जाने को!
कोई माता की उमीदों पे न डाले पानी,
ज़िंदगी भर को हमें भेज दे काले पानी,
मुंह में जल्लाद, हुए जाते हैं छाले पानी,
आबे-खंजर को पिला करके दुआ ले पानी,
भर न क्यों पाए हम, इस उम्र के पैमाने को!
हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रहकर,
हमको भी पाला था मां-बाप ने दुख सह-सहकर,
वक़्ते-रुख़सत उन्हें इतना ही न आए कहकर,
गोद में आंसू कभी टपके जो रुख़ से बहकर,
तिफ़्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को!
देश-सेवा ही का बहता है लहू नस-नस में,
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की क़समें,
सरफ़रोशी की, अदा होती हैं यो ही रस्में,
भाई ख़ंजर से गले मिलते हैं सब आपस में,
बहने तैयार चिताओं में हैं जल जाने को!
नौजवानो, जो तबीयत में तुम्हारी खटके,
याद कर लेना कभी हमको भी भूले-भटके,
आपके अजबे-बदन होवें जुदा कट-कट के,
और सद चाक हो, माता का कलेजा फट के,
पर न माथे पे शिकन आए, क़सम खाने को!
अपनी क़िस्मत में अज़ल ही से सितम रक्खा था,
रंज रक्खा था, मिहन रक्खा था, ग़म रक्खा था,
किसको परवाह थी, और किसमें ये दम रक्खा था,
हमने जब वादी-ए-गुरबत में क़दम रखा था,
दूर तक यादे-वतन आई थी समझाने को!
अपना कुछ ग़म नहीं लेकिन ये ख़याल आता है,
मादरे हिंद पे कब से ये ज़वाल आता है,
देशी आज़ादी का कब हिंद में साल आता है,
क़ौम अपनी पे तो रह-रह के मलाल आता है,
मुंतज़िर रहते हैं हम ख़ाक में मिल जाने को!
मैक़दा किसका है, ये जामो-सबू किसका है?
वार किसका है मेरी जां, यह गुलू किसका है?
जो बहे क़ौम की ख़ातिर वो लहू किसका है?
आसमां साफ़ बता दे, तू अदू किसका है?
क्यों नये रंग बदलता है ये तड़पाने को!
दर्दमंदों से मुसीबत की हलावत पूछो,
मरने वालों से ज़रा लुत्फ़े-शहादत पूछो,
चश्मे-मुश्ताक़ से कुछ दीद की हसरत पूछो,
जां निसारों से ज़रा उनकी हक़ीक़त पूछो,
सोज़ कहते हैं किसे, पूछो तो परवाने को!
बात सच है कि इस बात की पीछे ठानें,
देश के वास्ते कुरबान करें सब जानें,
लाख समझाए कोई, एक न उसकी मानें,
कहते हैं, ख़ून से मत अपना गिरेबां सानें,
नासेह, आग लगे तेरे इस समझाने को!
न मयस्सर हुआ राहत में कभी मेल हमें,
जान पर खेल के भाया न कोई खेल हमें,
एक दिन को भी न मंजूर हुई बेल हमें,
याद आएगी अलीपुर की बहुत जेल हमें,
लोग तो भूल ही जाएंगे इस अफ़साने को!
अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली,
एक होती है फ़कीरों की हमेशा बोली,
ख़ून से फाग रचाएगी हमारी टोली,
जब से बंगाल में खेले हैं कन्हैया होली,
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को!
नौजवानो, यही मौक़ा है, उठो, खुल खेलो,
खि़दमते क़ौम में जो आए बला, तुम झेलो,
देश के सदके में माता को जवानी दे दो,
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएं, ले लो,
देखें कौन आता है, इर्शाद बजा लाने को!

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 [राम प्रसाद बिस्मिल  जी द्वारा   सन 1929 में  रचित] 

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अब लेते हैं आनंद...आज के 5 लिंकों का...

प्रेरक कहानी- जो दिख रहा है, ज़रूरी नहीं कि वही सच हो
है।'
दोस्तों, ऐसा अक्सर हमारे साथ भी होता है। हम किसी भी घटना अथवा बात की गहराई को समझ नहीं पाते और लोगों के साथ अपने सम्बंध खराब कर लेते हैं, जबकि उसके पीछे
की वजह दूसरी होती है। इसीलिए जब भी कभी ऐसा अवसर आए, जिससे आपके रिश्ते प्रभावित हो रहे हों, वहां तत्काल कोई निर्णय न लें। क्योंकि हीरे की परख के लिए अनुभव
का ज्ञान जरूरी होता है। हो सकता है कि बिना ज्ञान/अनुभव के आप कोई गलत निर्णय ले बैठें और उसकी वजह से आपको सारी उम्र पछताना पड़



मेरी तन्हाई

गुजर गया
वो ख्वाबों का कारवां
आज फिर से
खड़ी हूँ
दोराहे पर
इंतज़ार में
किसी दस्तक के
मैं और मेरी तन्हाई .....






कवि का दीपक / हरिवंशराय बच्चन

शत-शत दीप इकट्ठे होंगे
अपनी-अपनी चमक लिए,
अपने-अपने त्याग, तपस्या,
श्रम, संयम की दमक लिए।
अपनी ज्वाला प्रभा परीक्षित
सब दीपक दिखलाएँगे,
सब अपनी प्रतिभा पर पुलकित
लौ को उच्च उठाएँगे।


मतदान के पहले

कोई भी सत्ता में आए
रही सदा और रहेगी आगे भी
जनता की झोली खाली
यूं ही छली जायेगी
आम जनता बेचारी


उद्यानिकी स्वर्ण क्रान्ति अभियान

बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए हर संभव प्रयास करते रहने की सख्त जरूरत है। इसके लिए सरकारी/गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा आयोजित आयोजनों का लाभ उठाते
हुए निरंतर जन-जन तक पर्यावरण की शुद्धि के लिए तथा प्रदूषण से मानवों की रक्षा के लिए प्रचार-प्रचार कर लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए संकल्पित होना होगा।


रुको प्रणाम इस ज़मीन को करो,
रुको सलाम इस ज़मीन को करो,
समस्त धर्म-तीर्थ इस ज़मीन पर
गिरा यहां लहू किसी शहीद का।

धन्यवाद

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

और भी है खूबसूरत है ..........चौबीसवां अंक

शुभ प्रभात...
ख़ूबसूरत है वो मुस्कराहट 
जो दूसरों के चेहरों पर भी मुस्कान सजा दे 
ख़ूबसूरत हैं वो जज्बात जो किसी का एहसास करें 
ख़ूबसूरत है वो एहसास जो किसी के दर्द मे दवा बने 
ख़ूबसूरत हैं वह बातें जो किसी का दिल न दुखाएं 
मैं न जानू की कौन हूँ मैं,
लोग कहते है सबसे जुदा हूँ मैं

ये रहे आज की पसंदीदा लिंक्स.....


मैनें रेखाचित्र बनाये,
जगह जगह से कर एकत्रित, 
आकृतियों के ढेर सजाये ।


आज, जो ये आज है 
कल नहीं रह जाएगा। 
बारिश के बादलों सा 
कुछ बरसेगा 
कुछ रह जाएगा॥ 


इश्क में तेरे
बदल लिया है वेश
फिरते हैं दर दर
तलाश में तेरी


बहुत सा बहुत कुछ 
और भी है खूबसूरत है 
खूबसूरती से उतारता है 
खूबसूरत लफ्जों को 
लिखा हुआ हर तरफ 
सभी कुछ खूबसूरत 
और बस खूबसूरत 
सा नजर आता है 


मुझे आज भी याद है,
वो खामोश सी शाम...
ना जाने कितने ही..
अफ़साने छिपाये गुजरती,
जा रही थी..
वो खामोश सी शाम....


सफ़र में मुश्किलें आयें, 
तो जुर्रत और बढती है ,
कोई जब रास्ता रोके , 
तो हिम्मत और बढती है....

इज़ाज़त दीजिए यशोदा को....

अंत में एक गीत..



















सोमवार, 10 अगस्त 2015

था वही राज़ का आलम...तेईसवां अंक

सादर अभिवादन
एक नया अल्फ़ाज़..
एक नयी शैली...
कुछ तो तो मिली..

जानकारी नयी....
तसाहुल..
तग़ाफ़ुल.. 
तजाहुल..
और..अब
तग़ज़्ज़ुल भी..

आज का आग़ाज़ इस श़ेर के साथ...

शोख़ी में शरारत में मतानत में हया में
जो राज़ का आलम था वही राज़ का आलम

-ग़ुलाम रब्बानी 'ताबाँ'

चलिए चलते हैं आगे....

आईने में उम्र हो गई 
लेकिन आईने से बाहर 
वो घेरेवाला फ्रॉक याद आता है 
वो ऊँची नीची पगडंडियाँ  … 
कहो पगडण्डी 
वो नन्हीं सी लड़की तुम्हें याद है ?


चौंक कर उठी झील,
डर के मारे चीखी,
गुस्से की तरंग उठी उसमें,
थोड़ा झपटी वह पेड़ की ओर,
पर छू नहीं पाई उसे,
कसमसा के रह गई.


तग़ज़्ज़ुल
1-क़दीमी तग़ज़्ज़ुल:-रिवायती लबो-लहज़े में चमत्कृत करने वाली बात,मसलन-हुस्नो-इश्क़ और जामो-मीना पर 
2-जदीदी तग़ज़्ज़ुल:-हुस्नो-इश्क़ और जामो-मीना से इतर चमत्कृत करने वाली बात
3-फ़िक्री तग़ज़्ज़ुल:-कोई गहरी चिंतनपरक चमत्कृत करने वाली बात


भूख आदमी को
बना देती है लाचार
करवाती है अपराध 
मंगवाती है भीख 
बिकवाती है ज़िस्म
नहीं कर सकता कोई
भूख की अवहेलना


सब कुछ
लगता है अच्छा  
अखरता है
तो ठहराव,
जल भराव,
कीचड़, सडांध   
नमी, दरारें
उनमें उगते
जंगली घास फूस
काई, बिछलन, फिसलन.

आज का अंक
सच में अच्छा ही बना
पर लगता है...
बहुत कुछ छूट भी गया..

चलती हूँ आज्ञा दें यशोदा को

चलते-चलते एक कव्वाली सुनाती हूँ....




















रविवार, 9 अगस्त 2015

गायत्री महामंत्र विश्व शांती के लिये-अंक 22.

जय मां हाटेशवरी...
अगस्त 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने की घटना इतिहास में काले अक्षरों से लिखी गई है। 6 और 9 अगस्त, 1945 को
अमेरिका के बी-29 बमवर्षक विमान ने हिरोशिमा और नागासाकी पर 'लिटल ब्वॉय' और 'फैट मैन' नाम के दो परमाणु बम गिरा दिए। हिरोशिमा में एक लाख 35 हजार और नागासाकी
में 50 हजार लोग मारे गए थे। आज 9 अगस्त है...उन मारे गये लाखों लोगों की आत्मा की शांति तथा विश्व में अमन हो,  इस लिये

सर्व प्रथम आज के आनन्द का आरंभ गायत्री महामंत्र और उसका अर्थ से...

।। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।।

भावार्थ :
उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को 
हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

अब देखिये मेरी पसंद के 5 लिंक...


इस तरह एक नारी रचती है
अपना घर-संसार
अपने भाव अपनी रचना..
और रहती है सदा प्रसन्न
क्यूंकि वो सागर है
और सागर की भांति
उसका ह्रदय है विशाल
जिसमे सबकुछ समाहित है..
और अपने प्रेम की लहरों से
बस सबको भिगोती है


तमन्ना आज बगीचे में अकेली घूम रही थी
सामने उसका पसंदीदा पौधा था; बेहद सुन्दर रंग वाले फूल खिलते थे उसपर. केवल एक ही समस्या थी; उसमें कांटे थे...बहुत पैने कांटे जो कभी भी चुभ सकते थे. पर तमन्ना को वह पौधा जान से प्यारा था. आज उसने फूलों से छेड़खानी की ठान ली थी. जैसे ही उसने छूने की ठानी और हाथ लगाया काँटों
से उसका हाथ छिल गया. तमन्ना बेहद परेशान हुई और चली गयी. बाहर पार्क में घूमते हुए तमन्ना को एक छोटा सा पौधा बहुत अच्छा लगा.

क्‍या होता है ईमेल क्लाइंट
असल में ईमेल क्लाइंट एक ऐसा सॉफ्टवेयर होता है, जो आपके कंम्‍प्‍यूटर में आपके ईमेल एकाउन्‍ट के सभी ईमेल भेजने और प्राप्‍त करने की सुविधा प्रदान करता है।
जीमेल, आउटलुक अौर याहू मेल POP यानि पोस्ट ऑफिस प्रोटोकॉल और IMAP यानि‍ इंटरनेट मैसेज एक्सेस प्रोटोकॉल काे सपोर्ट करती हैं, जब आप अपने ईमेल सर्वर से POP
और IMAP को अनेबल कर देते हैं तो POP और IMAP आपके कंप्यूटर पर मेल क्लाइंट के जरिये ईमेल के सर्वर से ईमेल डाउनलोड करने की अनुमति देता है। आजकल सबसे लोकप्रिय
ईमेल क्लाइंट हैं माइक्रोसॉफ्ट आउटलुक अौर मोज़िला का थंडरबर्ड।

हम दोनों ने सफलतापूर्वक एक संसार का सृजन किया है
जिसमें
आशाएँ हैं
कल्पनायें हैं
स्नेह है
परस्पर सम्मान ,सूझबूझ  है


उसे यह अहसास और आभास कभी ना हुआ था कि
ऐसा कुछ उसकी बहन के साथ भी हो सकता है। अब उसे समझ में आया कि जिनके साथ वो बदसलूकी करता था वो भी किसी की बहन, बेटी, पत्नी या किसी के घर की इज्ज़त थीं। आज अपने आप से नज़रे मिलाने लायक नहीं रहा था वो, आत्मग्लानि होने पर उसका वजूद उसे धिक्कारने लगा और उसका दिल स्वयं अपने
मुंह पर थूकने को करने लगा। शर्म से मुंह लटकाए, सर झुकाए, धक से वहीँ बहन के पास बैठ गया और पश्चाताप के आंसू उसकी आँखों में भर आए।

धन्यवाद

शनिवार, 8 अगस्त 2015

अगस्त आजादी....इक्कीसवां अंक


अगस्त हम ना जाने कैसे भूल गए 
आजाद हिन्द का चर्चा करना भूले या जान बूझ के छोड़ गए
एक अकेला पोस्ट हो जिसमें केवल अगस्त आजादी के लिए हो





India Indian जो कहना है कहो फिरंगियों के कहने का हमें क्या परवाह
 हमें तो हिंद हिंदी का मान अभिमान हमेशा से रहा और हमेशा रहेगा


दुष्टान्न त्यागें
हिन्द मिट्टी का नशा
दुश्मनी भूलें



हिम मुकुट
सिंधु त्रि पाँव धोये
हिन्द नेमत




शून्य का मान
रश्मियाँ भू चूमती
हिन्द की शान




हर हिन्दू विवेकानन्द और हर मुस्लिम हो कलाम
हो जाए न कमाल का हिन्द
खूबसूरत सपना है
स्वप्न ही तो हम हिन्दुस्तानियों की ताकत है



पांच का मन्त्र
मुट्ठी बना जीत लेते जहां हैं हम

फिर मिलेंगे तब तक के लिए आखरी सलाम



विभा रानी श्रीवास्तव




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