शीर्षक पंक्ति: आदरणीया फ़िज़ा जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
इंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता ...
सुबह से शाम तक
समय मनुष्य को खर्च करता रहता है,
और मनुष्य..,
जेब में पड़े सिक्कों की तरह
धीरे-धीरे खर्च होता जाता है
निरन्तर अपनी जिजीविषा को
क्षीण होते देखता रहता है
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बशीर बद्र साहब को श्रद्धांजलि 🤲💐🤲
"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।"
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जब देखती तो साफ दिखती हैं।
मुस्कुराती - बेबाक दिखती हैं।
आप आई नहीं महफिल में पर-
हर तस्वीर में आप दिखती हैं।
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उलझे सवाल
खाना स्वादिष्ट और सुपाच्य था. खाने के बाद बेयरे से बिल मांगा तो उसने बताया कि बिल काउंटर पर ही मिलेगा. दोनों ने काउंटर पर बिल का भुगतान किया. पूछने पर काउंटर वाले ने बताया कि, ‘वे नहीं चाहते कोई हमारे स्टाफ को कोई टिप दे. बिल बहुत वाजिब था, जितने की आकाश ने बिल्कुल अपेक्षा नहीं की थी.
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फिर मिलेंगे
रवीन्द्र सिंह यादव