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गुरुवार, 5 नवंबर 2020

1936...माना कि हमारा वर्षों का साथ है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ. टी. एस. दराल जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

करवाचौथ.... अनुराधा चौहान 'सुधी'


करवाचौथ दिवस यह पावन

गीत गूँजते घर-घर में।

खुशियाँ सबकी झोली भर दो

दीप लिए गाती कर में।

अर्घ्य चढ़ाएं मंगल गाएं

छलनी से दीप दिखाती

चाँद खिला अम्बर……

करवा चौथ स्पेशल...डॉ.टी.एस.दराल

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माना कि हमारा वर्षों का साथ है,

किन्तु आपकी उम्र और आपकी सेहत, आपके ही हाथ है।

जब रोजाना जिम जाते थे,

६० में भी गबरू नज़र आते थे।

करवाचौथ..... उषा किरण


चाँद को निकलने में

है अभी घन्टा भर

पर छत पर कई चक्कर लगा आए !

अर्घ्य देते, कहानी सुनते, खाते- पीते देख

तुम्हारा चेहरा कुछ भीग सा गया है

आत्मीयता की छाँव...शांतनु सान्याल

 

यहाँ फूलों के दरीचे, धुंधली आँखों
मैं तैरते हैं उजानमुखी नाव,
बरगद, घाट, मंदिर -
शीर्ष, गोधूलि में
नदी गुलाल,
आँगन
के मध्य तुलसी वृन्दावन, साँझ ढले - -
बढ़ती जाए आत्मीयता की छाँव।

मुक्ति की जो करे साधना.... अनीता

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शिव का प्रतीक हमारी आत्मा का प्रतीक है। वह कितना सुकोमल और सुडौल है, उसमें कहीं कोई कोना उभरा  हुआ नहीं है, नुकीला नहीं है। वह किसी को हानि नहीं पहुँचाता। उस पर जल चढ़ाने का अर्थ है मन को निर्मल करना, फूल अर्पित करने का अर्थ है सारी कटुता को भीतर ही समा लेना उसे बाहर न आने देना।

 

 

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे आगामी मंगलवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव

बुधवार, 8 जनवरी 2020

1936..जो ढूँढ़ते हो अदब,तहज़ीब अगर तो अवध की गलियों में आ जाना..


।।भोर वंदन।।
"जिस समय में

सब कुछ
इतनी तेजी से बदल रहा है
वही समय
मेरी प्रतीक्षा में
न जाने कब से
ठहरा हुआ है !
उसकी इस विनम्रता से
काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव
कुछ अधिक
गहरा हुआ है ।"
कुंवर नारायण

जी, काल के प्रति सम्मान-भाव और प्रतिक्षा सभी को है..कि हमारे आसपास की घटनाएं कुछ दिनों की उथलपुथल है..फिर अमनप्रीत होगी..
अब नजर डाले शामिल लिंकों पर..✍

💠💠



जो ढूँढ़ते हो अदब,तहज़ीब अगर
तो अवध की गलियों में आ जाना
और चाहते हो गर मुस्कुराना तो
दिल -ए-लखनऊ से दिल लगाना।
💠💠


आ० संजय कौशिक 'विज्ञात जी की नवगीत..
प्रीत अवगुंठन हटा कर 
खिलखिलाई रात भर

बैठ तरुवर ज्यों चकोरी
चाँदनी बिखरी छटा में 
शाख-पल्लव-ओट में थी
उमड़ती काली घटा में 
एकटक नैना निहारें 
रश्मियों की घन लटा में


💠💠



कांटों पे खिलने की चाहत थी तुझमें,
राह जैसी भी रही हो चला करते थे ।



न मिली मंज़िल ,हर मोड़ पर फिरभी

अपनी पहचान तुम बनाया करते थे।..
💠💠


जैसे अम्बर में चमकता आफताब  है!
गुलशन में फूलो  का  राजा  गुलाब  है!!



सुन्दरता की मिसाल बता तुझे क्या  दूँ  !

तिरी खुशबू का नशा छलकता जाम है..


  पीड़ा तन की फिर भी
सहन की जा सकती है
चोट में दर्द से निजात पाना
 कठिन तो होता है पर असंभव नहीं 
 मन में बिंधे शब्द बाण
करते  गहरे  घाव
जरा सी रगड़ से बनते नासूर
जब तब रिसाव उनसे होता
खून के आंसू  नयनों से टपकते
इतना रुलाते हैं कि ..

💠💠

आ० संध्या आर्य जी की रचनाओं के साथ आज की प्रस्तुति समाप्त करती हूँ..पुकार अमिट अनंत

गुनाह
धर्म का ग़लत मतलब निकालना है
इश्क़ आत्मा है
भौतिकता द्वैत के साथ आई है
जन्म और मृत्यु के बीच ख़त्म होगी
क्षणभंगुर जिस्म पर
सामाजिक नाच की समय सीमा ज़िंदगी है..

💠💠
हम-क़दम का नया विषय

यहाँ देखिए
💠💠
।। इति शम।।

धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍
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