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रविवार, 27 सितंबर 2026

4877...आदमखोरों से लड़ना है तुझको चाकू बना लेखनी ...

शीर्षक पंक्ति: 
आदरणीय रमेशराज तेवरीकार जी की रचना से।  
सादर अभिवादन।  
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएं-



आदमखोरों से लड़ना है
तुझको चाकू बना लेखनी । 

हर अल्फ़ाज़ आग जैसा है
कविता में जो रखा लेखनी । 

छल सरपंच बना बैठा है
इस पै अँगुली उठा लेखनी ।



बहला रहे हैं सब यहाँ,
अब कौन है अपना
कहने को हैं सदाएं संग,
बस मौन है अपना
 



जाने किस नाम से पुकारती थी तुम्हें उन दिनों…
चेहरा एकदम साफ उतर आता है आँखों के आगे
जैसे सामने देख रही हूँ कोई चलचित्र




कलियों के घूँघट को छूकर
सूरज की किरणें मचली।
शून्य पड़ी मन की गागर से 
कुछ भाव भरी बूँदे फिसली।
भीग उठा सूखा आँचल यूँ
नयनों ने बारिश बरसाई।



 अब इस मंदिर के नाम की बात! मंदिर का ''शोर'' नाम पर्यटकों को कुछ असमंजस में डाल देता है, क्योंकि सुनने वाले को शोर का मतलब कोलाहल या शोरगुल समझ में आता है, पर यह शोर (SHORE) अंग्रेजी का शब्द है, जो इसके समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण पड़ा है, जिससे इसे तट मंदिर भी कहा जाता है ! पर सवाल यह उठता है कि आठवीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर का नाम शोर कैसे हो गया ? जबकि अंग्रेज तो 17 वीं शताब्दी में भारत आए थे ! तो इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि समय, परिस्थितियों और समुद्र के अविराम शोर के चलते ऐसा हुआ होगा! 


फिर मिलेंगे। 
रवीन्द्र सिंह यादव 

2 टिप्‍पणियां:

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