सादर अभिवादन
आखिरी चिट्ठी
रायपुर के पुराने मोहल्ले में रामलाल काका 38 साल से डाकिया थे। रिटायर हुए तो 2 साल हो गए, पर आदत नहीं गई। हर सुबह 6 बजे साइकिल लेकर निकलते, लोगों से मिलते, और शाम को चौक की चाय दुकान पर बैठते।
एक दिन उन्हें अपने ही घर के लेटर-बॉक्स में एक चिट्ठी मिली। पीला लिफाफा, उसी की लिखावट में — जो 20 साल पहले मर चुकी उनकी पत्नी सावित्री की थी।
देखिए रचनाएं....
वंदे भारत की तरह नहीं,
कभी पैसेंजर की तरह भी आओ,
मेरे छोटे से स्टेशन पर
फजिरे से बारिश हो रही है। नींद में थी तब से बूँदों की रुनझुन सुन रही हूँ। अब तो शाम ढलने वाली है और लगातार बारिश… थोड़ी ठंड भी महसूस हो रही है। बारिश में मन अच्छा हो जाता है।
फजिरे लिखकर सोच रही हूँ कि आख़िर इसी शब्द से शुरुआत क्यों हुई ?
ये सच है अब वो नहीं है मगर मेरे घर की,
हर एक रीत में माँ की परम्पराएँ रही.
शिखर के हो गए आसान रास्ते सारे,
क़दम-क़दम पे मेरी माँ की प्रार्थनाएँ रहीं.
विश्व यह माया है सबसे झूठी यह काया है
स्वार्थ जहां थम गया ठौर वही मन भाया है
कौन अनूठा, कौन अटूटा चलता यही विवाद है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है।
ऐसे रहे शांत अंतर्मन
हाथ कर्म में लगें निरन्तर
मीलों की दूरियाँ नाप लें
लेकिन हो अचलता भीतर !
सादर समर्पित
वंदन

