निवेदन।


फ़ॉलोअर

1854 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
1854 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

1854...धार्मिक भावनाएँ अत्यंत नाज़ुक होतीं हैं...


सादर अभिवादन। 

गुरुवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत।

धार्मिक भावनाएँ 
अत्यंत नाज़ुक होतीं हैं 
ये अक्सर 
मक़्सद-बे-मक़्सद
आहत होतीं हैं। 
-रवींद्र 

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-



सीख 
क्यों नहीं लेता है 
थोड़ा सा कौआ हो जाना 
जमाने के साथ चलना 
एक नयी भाषा सीखना 
द्विभाषी हो विद्वानों में गिना जाना 


कुछ है पारदर्शी क्या तमस -
और क्या रुपहली चाहत, इस
परिपूरक समीकरण से
कोई नहीं मुक्त
इस क्षणिक
जहाँ में। 


कोई बोले ना ही  चाले 
दिल क्यों नहीं हैं मिले हुए 
घर गूँजे खुशियों से गर तो 
तब ही तो घर कहलाता है 
सूना घर यह बे आवाजें 
यह कहाँ घर कहलाता है 
साथी आओ दीप जला दें 
बोल प्रेम के हम बिखरा दें


*जानते हो कनु ! 
कल रात मैंने नहीं किया तुम्हारा इंतज़ार
और सो गयी सरहाने पर सिर रख कर
बिना तुम्हारा स्वागत किये ।



भगवतशरण उपाध्याय का व्यक्तित्व एक पुरातत्वज्ञ, इतिहासवेत्ता, संस्कृति मर्मज्ञ, विचारक, निबंधकार, आलोचक और कथाकार के रूप में जाना-माना जाता है। वे बहुज्ञ और विशेषज्ञ दोनों एक साथ थे। उनकी आलोचना सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों के समन्वय की विशिष्टता के कारण महत्वपूर्ण मानी जाती है। संस्कृति की सामासिकता को उन्होंने अपने ऐतिहासिक ज्ञान द्वारा विशिष्ट अर्थ दिए हैं।
          
 

हम-क़दम का एक सौ इकतीसवां विषय

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे आगामी मंगलवार। 

रवींद्र सिंह यादव
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...