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मंगलवार, 26 नवंबर 2019

1592..आज का अंक फिर एक बन्द ब्लॉग से

सादर अभिवादन..
आज का अंक फिर एक बन्द ब्लॉग से
हकीकत मे इस ब्लॉग में 
2017 के बाद से कोई नई प्रस्तुति नहीं
बन्द नहीं कहना चाहिए
क्यूँकि इस ब्लॉग की लेखिका
फेसबुक में सक्रिय है
ब्लॉग लेखिका हैं नईदिल्ली निवासी 
सखी नीलिमा शर्मा जी

तो चलिए..
इस बागीचे के चुनिन्दा पुष्पों पर एक नज़र
हम 2013 से 2017 की ओर आएँगे
अप्रैल 2013..
तन्हाई
सिर्फ मेरे हिस्से में ही नही आई हैं
तेरी हयात में इसने जगह बनायीं हैं
सुनो!!!
यूँ तनहा रहने का
शउर
सबको नही आता !
तनहा होने में
घंटो खुद को खोना होता हैं

मई 2013
कितनी ओल्ड फैशंड हो तुम 
इत्ती बड़ी सी बिंदी लगाती हो !!!
कल सरे राह चलते चलते 
कह गयी एक महिला 
जिसकी आँखों पर पर तो 
ढेर सारा काजल था पर 
माथा सूना सा 
नही जानती वोह 
बिंदी का फैशन से क्या लेना 


3सितम्बर 2015
कुछ आईने टूट कर ही
चुभते हैं ,साबुत भी
कभी मुकम्मल तस्वीर न थे जो
कभी बेचारगी कभी मासूमियत
कभी मक्कारी का मुखोटा ओढ़े
यह आईने कई चेहरे लिय
उम्र भर तलाशते अपना वजूद
और इक छायाप्रति तक न पाकर
बिलबिला उठते अंधेरो में



12 अक्टूबर 2015
गिरह,गाँठें

फर्क लफ्जों का नही
महसूस करने का होता हैं
गांठो को
उनकी गिरहो को
उनके होने को
उनकी वजूद को



3 दिसम्बर 2015
मेरा शहर आवाज़ेंं लगा रहा

सपनेंं देखतीहूँ
मैंअक्सर आजकल
हरी वादियों के
घंटाघर कीबंद घडियोंं में
अचानक होते स्पंदन के
बाल मिठाई के
बंद टिक्की और
खिलती हुयी धूप के




और इस बार के हमक़दम
का विषय भी इसी ब्लॉग

शहर

हर शहर का  अपना  सँगीत होता  हैं 
 कोई सरगम  सा बजता हैं  कानो में 
 कोई गाडियों के हॉर्न सा चीखता हैं 

रचना भेजने की
अंतिम तिथिः 30 नवम्बर 2019
प्रकाशन तिथिः 2 दिसम्बर 2019
प्रविष्ठिया मेल द्वारा सांय 3 बजे तक

सादर।

सोमवार, 25 नवंबर 2019

1592 हम-क़दम का छियानबेवाँ अंक.... बेटियाँ

स्नेहिल अभिवादन
-----------
सोमवारीय विशेषांक में आपसभी का हार्दिक अभिनंदन करती हूँ।

 "बिटिया"
 शब्द आते ही आँखों के सुसुप्त-जागृत परदों के पार मन को भावों की लहर धीरे से छू जाती है। एकदम निर्मल कल-कल,छल-छल,धाराओं सी पावन,चाँदनी-सी स्निग्ध,पुष्पों-सी कोमल अगाध स्नेह के
 ज्वार का प्रतिबिंब होती हैं बेटियाँ।
 बेशक बेटियों के लिए हमारे परिवार और समाज में हो रहे मंथर गति के परिवर्तन को महसूस किया जा सकता है।
  चंद पढ़े-लिखे,समझदार तबके में बेटियों की स्थिति में सुधार सामाजिक दृष्टिकोण से बेहद सुखद है। 

  पर दुःख होता है जब अपने शहर की बस्तियों में देखती हूँ एक बेटा की आस लिए तीन-चार-पाँच बेटियों की कतार लगाते हुये विपन्न और सुविधाओं से वंचित समाज के परिवारों को। बेटियों को दहेज के नाम पर प्रताड़ित होते हुये,कम पढ़ी लिखी लड़कियों को निरीह जानवरों से भी बदतर अपना जीवन व्यतीत करने पर मजबूर होते हुये। माँ-पिता की विविशता में अपनी बलि चढ़ाते हुये। 
  आज भी ऐसे परिवारों की संख्या ही ज्यादा है जो बेटों और बेटियों में स्पष्ट अंतर उंगलियों पर गिना देंगे।

मुझे लगता आज हम अभिवावकों को जागरूक होने की आवश्यकता है,बेटों और बेटियों में फर्क़ करने की बजाय एकसमान रुप से पालन करना और उन्हें आत्मसम्मान भरा जीवन देना हमारी ज़िम्मेदारी है।

★

बेटियों की प्रेरक उपलब्धियों से ज्यादा
उपेक्षित बेटियों का दर्द ,अनकही दास्तान नित आत्मा झकझोरती है।
नभ,अंतरिक्ष,धरा,नीर के कण-कण में पाँव छपछपाती कहानियोंं से ज्यादा अस्तित्वहीनता बेटी की कुहक हृदय मरोड़ती है।

★★★

बेटियों के संदर्भ में कविताएँ अनगिनत लिखी गयी हैं।

आज पढ़िये हमारे चिट्ठाजगत से चिरपरिचित रचनाकारों की अनमोल कृतियाँ-

★★★★★

आदरणीय साधना वैद
दिन भर तेरी धमाचौकड़ी, दीदी से झगड़ा करना,
बात-बात पर रोना धोना, बिना बात रूठे रहना,
मेरा माथा बहुत घुमाते, गुस्सा मुझको आता है,
लेकिन तेरा रोना सुन कर मन मेरा अकुलाता है !


आदरणीय आशा सक्सेना
जब पहला कदम रखा दुनिया में
ख़ुशी चारो ओर फैली
पहला शब्द माँ कहा मौसी हुई निहाल
क्यूँ न चूम लूं तुम्हें
तुमसी बिटिया  पा कर
दी बधाई तुम्हारी जननी को


आदरणीय उर्मिला सिंह
आज वही नन्ही गुड़िया
रिस्तों के प्यारे बंधन में 
पत्नि  माँ बहू बन, 
रिश्तों पर अपना प्यार लुटाती
जिसे हम सभी प्यार से कहते 
मेरी  बिटिया रानी!! 


आदरणीय सुजाता प्रिय
पेट में पलती बिटिया बोली-
मुझे न मारो माँ- पिताजी।

जनम लेते ही बिटिया बोली-
मुझे न फेको माँ-पिताजी।

दूध पीती बिटिया बोली-
गले लगा लो माँ-पिताजी।


आदरणीय कुसुम कोठारी
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजे ।
प्रभु मुझ में ज्वाला भर दीजे,
बस  ऐसी  शक्ति  प्रभु  दीजे,
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजे।
आंख उठे जो लिए बेशर्मी
उन आंखों से ज्योति छीन लूं ,



आदरणीय अनीता सैनी
खिलखिलाती हँसी से तुम्हारी, 
सुख हृदय में उभर आया,  
न्यौछावरकर जीवन अपना,  
यही पाठ है पढ़ाया,   
बिठूर की बिटिया-सा साहस सीने में,  
स्वाभिमान की चिंगारी है जलायी |


आदरणीय सुबोध सिन्हा
क ख ग घ ... ए बी सी डी ..
सब तो आपने मुझ बिटिया को
बहुत पढ़वाया ना पापा ?
अब "एक्स-वाई" भी तो
समझा दो ना पापा !
अगर भईया बना "वाई" से
वंश-बेल माना आपका
पर मुझ बिटिया में भी तो
है ही ना "एक्स" आपका
फिर मुझ से तथाकथित
मोक्ष क्यों नहीं पापा !???
पूछ रही है बिटिया ...

★★★★★


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हमक़दम का अगला विषय
जानने के लिए कल का अंक अवश्य पढ़िये।

आज्ञा दीजिये।

#श्वेता


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