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सोमवार, 19 जनवरी 2026

4627...और हमें एहसास हुआ कि...

सोमवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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“तुम जो भी हो, तुम जो भी करते हो, तुम अद्भुत और अद्वितीय हो. इस बात पर कभी शक मत करो।”


“यदि तुम्हें लगता है कि तुम यह कर सकते हो, तो तुम कर सकते हो. और यदि तुम्हें लगता है कि तुम यह नहीं कर सकते हो, तो तुम सही हो।”


“खुशी वह यात्रा है, मंजिल नहीं।”


“सफलता वह नहीं है जो आप हासिल करते हैं, बल्कि वह है जो आप बन जाते हैं जब आप उसे हासिल करते हैं।”


“सफलता अंतिम गंतव्य नहीं है, बल्कि यात्रा का आनंद लेने की प्रक्रिया है।"



 
 आज की रचनाऍं-

किसी ने खूब कहा
ये नजरअंदाजी,बेनियाजी 
उल्फ़त के ही अलग अंदाज है,
और हमे एहसास हुआ कि
फासले...बहुत नजदीक से ही
होकर तो गुजरती ..


लबों से कुछ कहो न कहोआँखें कह गईं
बिन छुए दिल को मिल जाए जो, वो दुआ हो क्या

नींदों के दरमियाँ तुम सपनों में आ गईं
बिखरी हुई सी ज़ुल्फ़ों की तुम अदा हो क्या

जिस दर्द से गुज़र गईंवो दर्द ही न रहा
पत्थर को भी पिघला दे, ऐसी रवा हो क्या



मौन बदलता है दृष्टिकोण।

देखने देता है दूसरा पक्ष ।

यज्ञ की समिधा है मौन ।

मौन गहरे पैठ पा जाता है मर्म।

मौन है गहरे कूप का जल ।

मन प्रांत कर देता शीतल ।

मौन का आकाश है स्वतंत्र।

मौन की व्याख्या है मौन ।





एक फूल से ही लगता जब
कितना सुन्दर आँगन ।
अनगिन फूल खिलें जिस आँगन
है कितना मन-भावन ।
किसने दीं हैं कुदरत को ये ,
खुशियाँ बिना हिसाब ।...




एक दिन पहुंच ही जाएंगे आकाशगंगा
के किनारे, यूँ तो आज नहीं ज़ेब
में एक भी ढेला, शून्य में थमा
हुआ सा लगे है सांसों का
हिंडोला । छोटी छोटी
खुशियों में रहते हैं
शामिल लंबे
उम्र के
राज़,



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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