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बुधवार, 7 दिसंबर 2016

509.....जमीन की सोच है फिर क्यों बार बार हवाबाजों में फंस जाता है

सादर अभिवादन...
दिसम्बर का सातवाँ दिन
तेईस दिन बाद
धमा-चौकड़ी भरते
सन दो हजार सत्रह का प्रवेश


सब की मेहनत के भरोसे आ गया इस मोड़ पर
नाम है साझा सभी के तुम शिखर पाने तो दो

पक चुकी है उम्र अब क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो


एक रिश्ता दोस्ती का
फलसफा यह जिंदगी का,
खूबसूरत सा जहाँ  यह
एक नाता हो ख़ुशी का !

घर आंगन छोड के जाना, कब अच्छा लगता है
आँखों से आँसू छलकाना, कब अच्छा लगता है

रोटी की मजबूरी, अक्सर छुडवा देती अपना देश
पराये देश में व्यापार फैलाना कब अच्छा लगता है

नापाक पाक से बात नहीं
बर्दाश्त कोई और घात नहीं
नक्शे में अब ये पाक नहीं
चाहे मरमिटे अपने लाख सही



दूर के ढोल सुहाने.....मालती मिश्रा
वैसे तो मानव के पास
गुणों का खजाना है 
पर समय निकल जाने के
उपरांत ही सदा 
इसने उनको पहचाना है




आज का शीर्षक..
की बात 
करने वाला 
सोचते सोचते 
एक दिन 
खुद ही 
जमींदोज 
हो जाता है ।

आज्ञा दें यशोदा को
सादर





12 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर बुधवारीय हलचल । आभार 'उलूक' का यशोदा जी सूत्र 'जमीन की सोच है फिर क्यों बार बार हवाबाजों में फंस जाता है' को चर्चा में जगह देने के लिये।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुप्रभात सस्नेहाशीष संग छोटी बहना
    उम्दा चयन

    उत्तर देंहटाएं
  3. जब तक खुद ज़मींदोज़ नहीं हो जाता, वह सैकड़ों को ज़मींदोज़ कर चुका होता है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति। आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर प्रस्तुति। आभार

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर हलचल ... आभार मुझे शामिल करने का ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़ि‍या हलचल...धन्‍यवाद आपका

    उत्तर देंहटाएं
  8. अति सुन्दर।
    रूप अरूप जैसी हृदय स्पर्शी रचनाएं प्रस्तुत करने के लिए आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत अच्छी रचनाओं का चयन एवं प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं

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