पाँच लिंकों का आनन्द

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गुरुवार, 14 जुलाई 2016

363.....उसके हाथों में हो जब मेरा हाथ

सादर अभिवादन सुप्रभात मैं संजय भास्कर एक बार फिर से हाजिर हूँ
पढ़िए मेरी पसदीदा रचनाएँ :)


उसके हाथों में हो जब मेरा हाथ 
तो लम्हा लम्हा सरके, न गुजरे ये रात

न बोले वो, न मैं बोली 
जैसे इक लम्बी गुफ्तगु हो ली 
लगा कोई है सदियों से साथ 
उसके हाथों में था जब मेरा हाथ

ये बारिशों के दिन। ..
चुपचाप रहने के दिन ....

मुझे और तुम्हें चुप रहकर
साँसों की धुन पर
सुनना है प्रकृति को 
उसके संगीत को ...


आशा सक्सेना 
तन्हाई के आलम में
खुद के ही कमरे में
अकेलापन खलने लगा
कुछ करने का मन न हुआ
बेहद अकेला जो हो गया
खोने लगा विचारो में
 सजने लगे स्वप्न  दृष्टि पटल पर


मधुलिका पटेल 
सावन की बूँदें जब
टिप -टिप हथेली पर गिरती हैं
एक -एक यादों की पहेली
धीमें- धीमें खुलती है

दिल में बंद यादों की पहेली
वो है उसकी सबसे अच्छी सहेली


मालती मिश्रा
पथ के काँटे चुन ले जो
फूलों का हकदार वही है,
तोड़ पहाड़ बहा दे झरना
उसके लिए मृदु धार बही है
धारा के विपरीत बहा जो
नई कहानी का रचनाकार वही है


आज्ञा दें भास्कर को
अगले गुरुवार को फिर मिलेंगे तब तक के लिए अलविदा

संजय भास्कर

6 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात..
    बेहतरीन रचनाओं का चयन
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर प्रस्तुति, उत्तम रचनाओं का चयन।
    आभार मेरी रचना को इस योग्य समझने के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर प्रस्तुति, उत्तम रचनाओं का चयन।
    आभार मेरी रचना को इस योग्य समझने के लिए।

    उत्तर देंहटाएं

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