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सोमवार, 21 जून 2021

3066 ------- कुछ ब्लॉगर्स की प्रथम और अद्यतन पोस्ट

  नमस्कार  ! 

पिछले सोमवार को  मैंने जरा सी मिर्ची और धनिया  पत्ती क्या बढ़ाई कि न जाने किस किस चीज़ की मांग होने लगी ..... ..... कोई बात नहीं हम भी पुराने खिलाड़ी हैं  निराश नहीं करेंगे .... आप एक मांगेंगे हम दो देंगे .... इसलिए आज पाँच  लिंक का कोई बंधन नहीं .... आज  की  चर्चा उन्मुक्त रूप से  आप सबके सम्मुख हाज़िर करने  की इजाज़त चाहती हूँ .  वैसे आप इजाज़त दें या न दें मैंने तो वही करना  है न जो मेरा मन कहे  , तो आज मेरे मन की  ही पढ़िए | 

आज विश्व योग दिवस भी है   तो  एक संदेश

व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं। 

आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥

अर्थात्

"व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल और सुख की प्राप्ति होती है। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं।"

कहते हैं" स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का वास होता है।"

"स्वास्थ्य सबसे बेशकीमती संपत्ति है।"

योग इन सभी शब्दांशों का निचोड़ है।

योग का अर्थ है जुड़ना। मन को वश में करना और वृत्तियों से मुक्त होना योग है।

योग शरीर में सूक्ष्म प्राण शक्ति को विस्तार देने की साधना है। स्वस्थ जीवन शैली का आधार योग को माना जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कोरोना काल में योग की महत्ता की परीक्षा हो चुकी है।तो   थोड़ा   अपनी सेहत का ख्याल रखें , योग करें , प्राणायाम करें ,  और  स्वस्थ रहें .....

         यूँ तो हिंदी ब्लॉग जगत इतना विशाल है कि कुछ  ब्लॉगर्स के नाम चयन करना बहुत मुश्किल काम है फिर भी मैं  ब्लॉग्स  के समंदर से कुछ ब्लॉगर्स का परिचय  कराने  जा रही हूँ ..... कुछ वो जो २००६ - २००७ से ब्लॉग लिख रहे हैं  और अपने  ब्लॉग  पर नियमित  पोस्ट  डाल  रहे हैं .....  और कुछ उन ब्लॉगर्स को लिया है जिन्होंने कुछ समय बाद अपना ब्लॉग शुरू किया लेकिन उनकी लिखने  की क्षमता से और लेखन शैली से मन प्रभावित हो रहा है ...  आइये मिलते हैं आज के कुछ मेरी पसंद के ब्लॉगर्स से ......  सच कहूँ तो  बहुत लम्बी लिस्ट है मेरी  |आज जिनसे परिचय करा रही हूँ उनके अतिरिक्त और भी बहुत नाम हैं जिनका परिचय ऐसे ही कराती  रहूँगी... समझिएगा ये प्रथम कड़ी है ..... ऐसी कड़ियाँ और भी मिल सकतीं हैं ...... यदि आपको ये कड़ी पसंद आई तो ..... मेरा भी तो ऐसी चर्चा करने का प्रथम ही प्रयास है ..... 

सबसे पहले परिचय करा रही हूँ दिगंबर नासवा  जी से , जिनसे आपमें से बहुत लोग अच्छी तरह परिचित हैं ......  यूँ तो गीत ,  अतुकांत रचनाएँ भी लिखी हैं लेकिन  ग़ज़लों  के  शहंशाह कहें तो अतिश्योक्ति न होगी .... इन्होने अपना ब्लॉग २००६ में प्रारंभ किया था ... 


आज  हम पेश कर रहे हैं इनकी प्रथम पोस्ट और उसके साथ ही अद्यतन पोस्ट  

२००६ में  अपने देश से दूर शायद अकेले रहते हुए जो महसूस हुआ उसको  इन्होने बहुत सहजता से वर्णित किया है ..... 

देश से दूर दिवाली की एक रात

दिया जलेगा या बाती या तेल जलेगा
या मेरा दिल कोने मैं चुपचाप जलेगा 

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जून  २०२१  की नयी पोस्ट 

कश्तियाँ डूबीं अनेकों फिर भी घबराया नहीं ...


प्रेम होशृंगारमस्तीया विरह की बात हो,
कौन सा है रंग जिसको प्रेम ने गाया नहीं.


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दूसरे दिग्गज ब्लॉगर हैं  प्रवीण पण्डे जी  , ये जितना खूबसूरत गद्य लिखते हैं  उतनी ही खूबसूरत कवितायेँ लिखते हैं .....  विभिन्न विषयों पर अच्छी पकड़ है .... आप स्वयं ही ब्लॉग देख कर समझ लेंगे कि मैं कहीं से भी बढ़ा  चढ़ा  कर नहीं कह रही हूँ ....



आपकी पहली पोस्ट २३ जून २०१० में आई थी ......... जो सीधे स्वर्ग से ........ ओह  .... मतलब घर को स्वर्ग बनाने के नुस्खे से प्रारंभ की थी 

स्वर्ग  

विवाह के समय माँ अपनी बेटी को सीख देती है कि बेटी तू जिस घर में जा रही है, उसे स्वर्ग बना देना। विवाह की बेला तो वैसे ही सपनों में तैरने की बेला होती है, बेटी भी मना नहीं करती है। अब नये घर के काम काज भी ढेर सारे होते हैं, नये सम्बन्धी, नयी खरीददारी, ढेर सारी बातें मायके की, ससुराल की। कई तथ्य जो कुलबुला रहे होते हैं, उनको निष्पत्ति मिल जाने तक नवविवाहिता को कहाँ विश्राम। इस आपाधापी में बेटी को माँ की शिक्षा याद ही नहीं रहती है।

************************************
नयी पोस्ट १९ जून २०२१ 



कुशल भगवन, सर्वहित प्रेरक बने हो,

तम हृदय में, प्रेम के दीपक जला दो ।

तव प्रतिष्ठा अनवरत होवे प्रचारित,

भावरस में ज्ञानपूरित स्वर मिला दो

***********************************


एक और चर्चित ब्लॉगर  का परिचय  ------ अपने बारे में कुछ कहना कुछ लोगों के लिए बहुत आसान होता है, तो कुछ के लिए बहुत ही मुश्किल और मेरे जैसों के लिए तो नामुमकिन फिर भी अब यहाँ कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा न......... बाकी का परिचय ब्लॉग पर जा कर पढियेगा ... मिलिए शिखा वार्ष्णेय  से ..... 



इनकी  पहली पोस्ट आई ....  २६ अप्रेल   २००९ में 

कौन

क्यों घिर जाता है आदमी,
अनचाहे- अनजाने से घेरों में,
क्यों नही चाह कर भी निकल पाता ,
इन झमेलों से ?

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हांलांकि  इनको कवितायेँ लिखना बेहद पसंद है लेकिन गद्य भी खूब लिखती हैं ..... अब तक तीन पुस्तकें  आ चुकी हैं एक कविता की  मन के प्रतिबिम्ब और दो गद्य की  - स्मृतियों में रूस और देशी चश्में से लन्दन डायरी .... समसामयिक विषय पर लिखती रहती हैं .... और इनकी नयी पोस्ट   इस बात का  सबूत है .....
नयी पोस्ट  ३१ मई २०२१ को डाली गयी है ... 


विज्ञान और विकल्प

विज्ञान कभी भी अपने दिमाग के दरवाजे बंद नहीं करता। बेशक वह दिल की न सुनता हो परंतु किसी भी अप्रत्याशित, असंभव या बेबकूफाना लगने वाली बात पर भी उसकी संभावनाओं की खिड़की बन्द नहीं होती।

**************************************************************

 वैसे अब जिस ब्लॉगर कि चर्चा करने जा रही हूँ उनसे आप लोग भली भांति परिचित हो चुके हैं ..... जितना सुन्दर लिखती हैं उतना ही सुन्दर गाती भी हैं ..... मिलवा रही हूँ  अनुपमा सुकृति  से . इनकी बस इतनी सी अभिलाषा है .... 
परिवार ...कुछ शब्द और एक आवाज़ .....बस यही परिचय है ....आप सभी मित्रों से स्नेह की अभिलाषा है .....

इनकी पहली पोस्ट ....५ अप्रेल २०१० को आई और खुशनसीबी मेरी कि सबसे पहली टिप्पणीकर्ता मैं ही बनी .... 

लहर -लहर घूम घूम--
नगर- नगर झूम झूम
छल-छल है बहती जाती ..
जीवन संगीत सुनाती -----
मन की सरिता है !!!

*******************************
जितनी  प्यारी रचना पहली थी उतनी ही अभी की  नयी पोस्ट जो  १९ जून २०२१ को आई है ... 


प्रीत के इक पल  को
आँखों में पिरो लो,
मुक्ता सी बनके हृदय  में ,
जा बसें ,
छलके न कोरों से कभी ,

**********************************************

चलिए अब मैं आपको ले चलती हूँ उन ब्लॉगर्स के पास जिन्होंने अपने ब्लॉग २०१४ के बाद शुरू किये और निरंतर लिख रहे हैं .... कुछ तो नित दिन लिख रहे हैं ..... और सबसे अच्छी बात है कि इनमें से कुछ  रचनाकार छंदबद्ध रचनाएँ लिख रहे हैं ..... 

२०१५ में   मीना भरद्वाज  जी ने अपना ब्लॉग आरम्भ किया  मंथन 


अपने बारे में कुछ भी न बताते हुए सबसे पहली पोस्ट २८ फरवरी  २०१५ को आई .... 


कभी कहीं पढा था दीवारें  मौन होती हैं.बचपन से आज तक  सुनती आयी हूँ दीवारों के कान होते हैं.मेरा मन दीवारों के बारे मे कुछ और ही सोचता है.

***********************************************

सबसे पहली पोस्ट में दीवारों  की बात तो अद्यतन पोस्ट में स्नेह ,  प्यार , दुलार  की   बात ... इनकी नयी पोस्ट १७ जून २०२१ को आई है .... 

"नेह"


तुम्हारा नेह भी

हवा-पानी सरीखा  है

चाहने पर  भी 

पल्लू के छोर से

बंधता नहीं

बस…,


*********************************************

२०१८ के कुछ नए   ब्लॉग्स  ने काफी आकर्षित किया है ...... 

मन की वीणा  ब्लॉग  का सञ्चालन करती हैं  कुसुम कोठारी जी  इनका कोई चित्र नहीं है ब्लॉग पर | गुज़ारिश है कि कोई फूल पत्ते ही लगा लें तो चर्चा में लगाने के लिए आसानी हो जाएगी ... 

पहली कविता आई इनकी ११ जनवरी २०१८ में .......

कहने को मैं विमला हूँ ,
मैं सरिता निर्मला .... 

पहली ही रचना से अनुमान हो गया कि प्रकृति प्रेमी हैं ...और प्रकृति पर नायब पढने को मिलेगा ....  मैंने इनके ब्लॉग पर प्रकृति सम्बन्धी बहुत रचनाएँ पढ़ीं हैं .... लेकिन मन के भावों को भी बहुत खूबसूरती से बांधती हैं ... 

१८ जून २०२१  की इनकी अद्यतन पोस्ट है .... 

खोल दिया जब मन बंधन से

उड़े भाव पाखी बनके 

बिन झाँझर ही झनकी पायल

ठहर-ठहर घुँघरू झनके।

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एक और ब्लॉग २०१८ में प्रारंभ हुआ  और पता नहीं उस ब्लॉग ने ताने बाने से किस किस को उलझाया ......... बहरहाल आप मिलिए  उषा किरण जी से जिनका ब्लॉग है ताना  बाना  ..... अपने बारे में लिखती हैं ..... 

तूलिका और लेखनी के सहारे अहसासों को पिरोती रचनाओं की राह की एक राहगीर.


आप  गद्य और पद्य   दोनों ही विधाओं में लेखन करती हैं ..... ताना बाना नाम से  इनका काव्य संग्रह भी आ  चुका  है .... कहानी और उपन्यास लिखने में रूचि है ... कई  कहानियाँ  विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं ... 

इनके ब्लॉग पर इनकी पहली पोस्ट ११ मई २०१८ को एक कहानी की पहली कड़ी के रूप में प्रकाशित हुई .... बाकी कड़ियाँ भी आप चाहें तो ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं ..... 

बिट्टा बुआ ( कहानी -भाग 1)

बचपन की न जाने कितनी स्मृतियां और न जाने कितने उन स्मृतियों के पात्र होते हैं, जो हमारे अस्तित्व को साधारण समझते हैं उन्हीं का अस्तित्व कभी-कभी हमारे मानस-पटल पर बहुत स्थान पा लेते हैं .

****************************************************

नयी रचना आपकी  १९ जून २०२१ को प्रकाशित हुई  एक अतुकांत कविता जो भावों से भरी हुई है .......

जो गुजर जाते हैं

वे कहाँ गुजरते हैं 

गुजरते तो हम हैं 

खुशबुओं से लिपटी

उनकी यादों की गली से

जाने कितनी बार…बार-बार…!!

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एक अन्य  ब्लॉगर जिनकी छंदबद्ध रचनाओं ने मन मोह लिया है वो हैं  अनुराधा चौहान  | अपने बारे में उनका कहना है ...... शब्दों का ताना-बाना बुनती हूँ। भावों के रंग भरती हूँ।बस इतनी सी पहचान है मेरी वही पहचान लिखती हूँ।


इनकी सर्वप्रथम  २२ मई २०१८ को  आई पोस्ट है 

जीवन की भाग-दौड़ में
बचपन की मासूमियत
कहीं खोती जाती

*************************
इस छोटी सी रचना से प्रारंभ कर  ब्लॉग पर बहुत गहन और लम्बी कवितायेँ वो भी छंदों में प्रस्तुत करती हैं ...

इनकी नयी पोस्ट २० जून २०२१ में पोस्ट हुयी है ......

सभी सीखें सही बातें पढ़ें अच्छी पढ़ाई को,
चलो जीते सभी के मन लड़े सच की लड़ाई को, 

*******************************
इनकी ये क्यों कि नयी पोस्ट आ गयी है इसलिए मैंने इसे यहाँ दिया है . लेकिन मैं चाहूंगी कि आप इनके ब्लॉग पर ये रचना ज़रूर  पढ़ें ...... यदि धैर्य है तो .... 

अहिल्या बाई होलकर


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 अब ये चर्चा समापन की ओर अग्रसर हो रही है ........ आपको मिलवाते हैं ऐसे ब्लॉगर से जिसने     अक्टूबर  २०२० में अपना ब्लौग बनाया जिज्ञासा की जिज्ञासा  ....   किस सन्दर्भ में लेखन चल रहा इनका ये उनके ब्लॉग पर पढ़ें ..... .... उसी सन्दर्भ में कुछ रेखांकित करने का नव प्रयास है मेरा लेखन ...


इनकी  पहली रचना किस दिनांक को आई ये पता नहीं चल  पा  रहा लेकिन अक्टूबर  २०२० में इनका ब्लॉग पर पदार्पण हुआ है ..
पहली रचना ब्लॉग पर है .....

धागे का वजूद


धागा हूँ मैं या बिलकुल धागे जैसी,

ताउम्र मोतियों को पिरोया मैंने 

 *****************************

प्रकृति पर इनकी बहुत खूबसूरत रचनाएँ आयीं हैं ....... और आज जो रचना लिखी है वो  इनके मन के भावों को व्यक्त  कर रही है ... इस रचना में ..... पिता के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है ..... 

मैं बुढ़ापे के आनंद में हूँ (संवाद-पिताजी से )


वह दृश्य
अदृश्य 
हो ही नहीं रहा
जब उन्होंने मुझसे कहा

अब क्या है
जीवन बीत चुका है
और मैं बुढ़ापे के आनंद में हूँ 
आजकल परमानंद में हूँ 


 *************************************

आज की चर्चा  की  अंतिम कड़ी .........

आज की चर्चा का सबसे नया ब्लॉग ......  
ये ब्लॉग  इसी वर्ष फरवरी २०२१ में अवतरित हुआ है ....... और इतनी शीघ्रता से इसने ब्लॉगर्स के दिल में जगह बना ली है कि अचंभित हुए बिना नहीं रहा जाता .....  संदीप कुमार शर्मा जी .... पर्यावरण के संरक्षण के लिए कार्यरत हैं ..... प्रकृति बचेगी तो हम बचेंगे ....... आप इनका परिचय ब्लॉग पर जा कर पढ़ सकते हैं ... 





आपके ब्लॉग  पुरवाई पर पहली पोस्ट ४ फरवरी २०२१ को आई है ......


भीड़ बहुत है


कोई सुबह तुम्हारे पैरों के तलवे में दबकर मुस्कुराहट बिखेरती है।

***********************************

और आपकी नयी रचना १८ जून को ब्लॉग पर प्रकाशित हुई है ...... इस बीच इनके ब्लॉग पर रचनाओं ने १०० का आंकड़ा पार कर लिया है ...... बधाई संदीप जी ......
जीवन से सम्बंधित हर मुद्दे पर इनकी रचनाएँ आपको पढने को मिलेंगी ...


वो छांव कहां से लाऊं

जो मुस्कान बिखेरे

वो शब्द कहां से लाऊं।


 आज पाठकों को काफी कुछ पढ़ने को और ब्लॉग भ्रमण का अवसर मिला होगा .... अपनी प्रतिक्रिया से अवगत  कराइएगा  ....... यदि ऐसी अगली कड़ी आई तो मात्र पाँच ब्लॉगर्स से ही   परिचय  कराऊंगी  ...... बहुत  मेहनत लगती  है भाई   ... 


अब गेंद आपके पाले में ...... 

संगीता स्वरुप /


रविवार, 20 जून 2021

3065..मजबूत थे मेरे पिता, फिर उन्हें सख़्त किसने कहा

सादर नमन
**

पिता किसी बच्चे के जीवन में
सूरज की तरह होते हैं जो भोर की 
कोमल किरणों की तरह 
स्नेह से माथा चूमकर हाथ पकड़कर जीवन के कोलाहल से परिचित करवाते हैं। 
दोपहर की तीक्ष्ण धूप की तरह हर 
परिस्थिति में कर्मपथ पर 
तपकर कठोर बनकर जुझारू और संघर्षरत रहना सिखलाते हैं और शाम होते ही 
दिन-भर इकट्ठा किये गये सुख की शीतल छाँव में छोड़कर पथप्रदर्शक सितारा बन जाते हैं। 
समुंदर की तरह विशाल हृदय पिता जीवनभर सुख-दुःख की लहरों को बाँधते हैं लय में, 
रेत बनी अपनी आकांक्षाओं को छूकर बार-बार लौट जाते हैं अपनी सीमाओं में, 
अपने सीने की गहराइयों में ज़ज़्ब कर खारापन पोषते हैं अनमोल रत्न।

सागर-सा मुझको लगे, पिता आपका प्यार।
ऊपर बेशक खार सा, अंदर रतन हजार॥
**
विशाल वृक्ष
जैसे देता है छाया
पिता ही तो हैं ।
**
विशाल वृक्ष
जैसे देता है छाया
पिता ही तो हैं ।


**
वो पिता हैं, जिन्हें बच्चे तब समझते हैं
जब वे स्वयं अभिभावक बन जाते हैं
**

बहुत याद आता है
अल्हड़पन में लिपटा बचपन
बे-फ़िक्री का आलम
और मासूम लड़कपन
निकलता था
जब गाँव की गलियों से
बैठकर पिता जी के कन्धों पर


***
पिता से ही सारा जहाँ है,
पिता से ही सारे सपने हैं।
पिता से ही यह जीवन है,
पिता से ही सारे रिश्ते अपने हैं।
पिता नहीं है तो कुछ नहीं लगता अपना,
***


हमारे समाज और संस्कृति को आज बेहद जरूरत है. स्वच्छ वातावरण व 
मानसिक विकास दोनों एक दूसरे के साथ गहनता से जुड़े हुए विषय हैं. .

**
पिता क्या है...?
ये एक ऐसा प्रश्न है
जिसका जवाब शायद है मेरे पास
पर मैं समझा नही पाऊँगा क्यों कि
मेरे तरकश में शब्दों के इतने तीर नही है।
**

अब तुम्हारा ये कहना कि
"कभी मेरे बारे में भी सोचिए जरा !!!"
या फिर ये उलाहना कि
"आप मेरे लिए अब तक किए ही क्या !?"
बिल्कुल सच कह रहे हो तुम
इसमें भला झूठ है क्या !!!!
बेटा ! प्यार कर ही पाया कहाँ
मैं तुम्हारा एक पापा जो ठहरा ...

**
जेब खाली हो फिर भी मना
करते नहीं देखा
मैंनें पापा से अमीर इंसान
कभी नहीं देखा
**

वो थे हम पर इतराने वाले ,
प्यार से सर सहलाने वाले ;
उठाप्यार से सर सहलाने वाले ; 
है जब से उनका साया
किसी को हम पर  नाज़ नहीं है
कल थे पिता पर आज नहीं है -
माँ का अब वो राज नहीं है!!! 

**
ये जो मुस्कान लिए बैठे हैं
पिताजी की पहचान लिए बैठे हैं...
**

अपने
पिताजी भी
जब याद आते हैं
तो कुछ ऐसे जैसे
ही याद आते हैं

बहुत छोटे छोटे
कदमों के साथ
मजबूत जमीन
ढूँढ कर उसमें
ही रखना पाँव

दौड़ते हुऐ
कभी
नहीं दिखे
हमेशा चलते
हुऐ ही मिले

**
पापा भी ना
दिल अपने पास और धड़कने..
मेरे होठों की मुस्कान रखते हैं
**
....
और अंत में सभी को शुभकामनाएं
सादर...

शनिवार, 19 जून 2021

3064... अस्तित्व

 हाज़िर हूँ...! उपस्थिति दर्ज हो...

पता नहीं पारस लोहा को सोना बनाता कि नहीं बनाता, लेकिन किसी को कोई ऐसा मिल जाता है जिसके सम्पर्क में आने से बदल जाता है..

वजूद

मेरी सुबह में न तेरी बातें रहीं

न वो रातों में तेरा सुरूर

मगर बिखरा है तेरा रंग बाकी इन हवाओं में

वजूद

राजा-महाराजाओं के दरबार में भी स्वांग किया जाता था. ये सिलसिला सैंकड़ो साल पुराना है, उस दौर में पुरानी गाथाओं को नाट्य विधा के जरिये मंचित किया जाता था. ये काम अब भी जारी है. हाँ, अब हम अपनी लोक कला की इस संस्कृति को भूलते जा रहे है. हम इसे बनाये रखे हुए है. हम इसमें किसी ऐतिहासिक पात्र का रूप धारण करते है.

अस्तित्व

जिस घर में पिता होता है उस घर पर कोई बुरी नजर नहीं डालता, वह भले ही कुछ ना करता हो या ना करने के काबिल हो, लेकिन “कर्तापुरुष” के पद पर आसीन तो होता ही है और घर की मर्यादा का खयाल रखता है.. किसी भी परीक्षा के परिणाम आने पर माँ हमें प्रिय लगती है, क्योंकि वह तारीफ़ करती है, पुचकारती है, हमारा गुणगान करती है, लेकिन चुपचाप जाकर मिठाई का पैकेट लाने वाला पिता अक्सर बैकग्राऊँड में चला जाता है… 

अस्तित्व

टूटी हुई उम्मीदों की एक मात्र आस हो,

हर जान का तुम ही तो आधार हो,

नफरत की दुनिया में तुम ही तोह प्यार हो,

उठो अपने अस्तित्व को सम्भालो ,

केवल एक ही नहीं

हर दिन की लिए तुम ख़ास हो।

बहुत कुछ दफ़न है

हमारे शहर मै फूलो कि कोई दूकान नही

बस एक शख्स के मुस्कुराने से काम चलता है

किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़ कर देखो,

तो ये रिश्ते निभाना किस क़दर आसान हो जाए

ज़ुल्फ़ों के बादलों के तले चल रहें हैं हम..,

बरसात हो रही है मगर ,जल रहें हैं हम.

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पुन: भेंट होगी...
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शुक्रवार, 18 जून 2021

3063.... मैं प्रयास करती रहूँगी

शुक्रवारीय अंक में आप सभी का

स्नेहिल अभिवादन।

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हाथों से वक़्त के रही फिसलती ज़िंदगी।

मुट्ठियों से रेत बन निकलती ज़िंदगी।


लम्हों में टूट जाता है जीने का ये भरम,

हर मोड़ पे सबक लिए है मिलती ज़िंदगी।



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आइये आज की रचनाओं के संसार में चलते हैं-


कुछ ऐसी यादें होती हैं जिन्हें भुला पाना

आसान नहीं होता, चलते हैं क़दम आगत की राह और मन बिसूरता रह जाता है एहसास में विगत  के

सोच में तो 

समा जाता है सब कुछ 

रील सी ही 

चलती रहती है 

मन मस्तिष्क में ,

सब कुछ एक दूसरे से 

-------
जीवन हो या प्रकृति
विचार एवं व्यवहार का स्थायित्व
मन की संवेदनशीलता नहीं
परिस्थितिजन्य
 भूख की तृप्ति
 पर निर्भर है जिसके मूल में
निहित है अतृप्ति

तब से ही, अवधूत सुखी हैं, बुद्धिमान पीड़ित। मूर्ख परमानंद में हैं, ज्ञानी कुंठित। इच्छा, अभीप्सा और प्रत्याशा के आराधक अवसाद में हैं, जड़भरत के अनुयायी मगन।

-------

विपरीत परिस्थितियों से हार नहीं मानना,

सफ़र की दुरूहताओं का डटकर सामना करना, बहुत कुछ बदलने की क्षमता रखता है सकारात्मक परिवर्तन के लिए स्वयं से बार-बार कहना कि

मैं करती रहूँगी प्रयास

एक परोक्ष-सी लड़की की अट्टहास  
मेरे कानों में गूँजती है
और तभी अँधेरा छा जाता है,
उस घोर अंधकार से ' निराशा ' आती है,
मुझे देख मुस्कुराती है,
मेरा आलिंगन करती है
और सांत्वना देने का ढोंग करते हुए 

--------
जब भी करना हो  सीमित शब्दों में
गूढ़ और सारगर्भित धारदार , हर बंध बाँधकर करीने से क़लम शब्दहार कह जाती है गज़ल क़माल


दृष्टि लोगों की अजब धुंधली हुई इस दौर की
इसलिए सिक्के जो खोटे थे वही छाने लगे

राग दरबारी सुना करके सियासी मंच से
कुछ बड़े चालाक भत्ते और पद पाने लगे

------
सुनने वाले अगर समझ भी जाते तो
आज समाज की तस्वीर कुछ और होती
बंधकर रहते सीमाओं में सुखी न होता फिर कोई अतिक्रमण
भौतिक लोलुप्सा में फँसकर, खत्म संस्कृति होती है
नित नव संयंत्रों से धरती, छलनी होकर रोती है
ऐसी कैसी नई सभ्यता,कैसा ये अधिकार सुनो ।
अन्यायों की लगी हुई है,लंबी बहुत कतार सुनो ।।


---------
और चलते-चलते पढ़िए 
एक संस्मरणात्मक कहानी जिसमें निहित
पवित्र संदेश और आह्वान का कुछ अंश भी अगर डगमाते आडंबर के तीन पायों पर टिके विकलांग समाज को छू भर जाए तो  अपने अलग दृष्टिकोण से दे पायेगा सुदृढ़ और संतुलित चौथा कंधा


वैसे तो अवनीश बचपन से अपने घर-परिवार में ये चलन देखते हुए आए हैं, कि अगर किसी बुआ जी, मौसी जी या किसी भी 'कजिन' दीदी लोगों के ससुराल में किसी ख़ास आयोजन के मौके पर आमन्त्रित करने के लिए या किसी अवसर पर शुभकामनाएं देने के लिए या फिर दुःख की घड़ी में शोक प्रकट करने के लिए उन लोगों के अलावा तदनुसार फूफा जी, मौसा जी या जीजा जी या फिर उनके मम्मी-पापा से बातें की जाती रहीं हैं। हो सकता है यह पुरुष-प्रधान समाज होने के कारण ऐसा होता हो। पर अवनीश करें भी तो क्या भला .. अवनि का मायका इस मामले में है ही कुछ अलग-सा। वैसे तो अवनीश को इन में भी सकारात्मकता नज़र आती है, कि यह पुरुष-प्रधान समाज को चुनौती देती हुई, किसी महिला-प्रधान समाज को गढ़ने की प्रक्रिया वाली शायद कोई चलन या जुगत हो।

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आज के लिए इतना ही
कल का विशेष अंक लेकर आ रही ह़ै
प्रिय विभा दी।









गुरुवार, 17 जून 2021

3062 ..अपना तो अपना रहेगा ग़ैर फिर भी ग़ैर है

सादर नमस्कार
आज सुबह रवीन्द्र जी नहीं दिखे
सोचे चलिए
हम अपनी उपस्थिति दर्ज कर देते हैं
समय व्यर्थ न करते हुए
चलें रचनाएँ देखें....

सूखते दिन में
उम्मीद कई दफा
पसीने सी टपकती है।
फटी जेब में
रुमाल से बंधे
रुपयों में
सपने बुनता मजदूर
अस्त हो जाता है
सूरज के साथ।


हां मैं भी हूं एक हुनरवाली।
बुनती डलिया-सूप निराली।

इस विद्या में मुझे महारथ ।
मिला है जन्मजात विरासत।

बे-वजह कुछ अपने बंट गए मज़हबी इस दाव में,
ये हक़ीक़त जानकर भी ये सियासी बैर है ।

राज़-ए-उल्फ़त को बताना ये भी मेरा फ़र्ज़ था,
अपना तो अपना रहेगा ग़ैर फिर भी ग़ैर है ।


एकटुक,
अपलक निहारो कभी,
तुम्हारी आँखोंं में
स्वयं को पिघलाने का स्वप्न
मर्यादाओं की
लक्ष्मणरेखा का यथार्थ
लाँघकर भी
तुम्हारी दृष्टि में
व्यर्थ ही रहा।


"रक्तदान- महादान" कह-कह कर,
करना है अब से तो कोई दान नहीं।
कह कर - "रक्त साझा- सच्ची पूजा",
अब तो हमको, सच्ची पूजा करनी।
...
बस
सादर

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