।। भोर वंदन।।
"भावों के आवेग प्रबल
मचा रहे उर में हलचल
कहते,उर के बाँध तोड़
स्वर-स्त्रोत्तों में बह-बह अनजान
तृण,तरु,लता,अनिल,जल-थल को
छा लेंगे हम बनकर गान
पर, हूँ विवश,गान से कैसे
जग को हाय!जगाऊँ मैं
इस तमिस्त्र युग-बीच ज्योति की
कौन रागिनी गाऊँ मैं? "
रामधारी सिंह दिनकर
वर्तमान दहशत के साये में भी सामाजिक रिश्तों की गहराइयों को थामे ..
शांत, सौहार्दपूर्ण वातावरण की अपेक्षाओं के संग नज़र डालें आज की प्रस्तुतियों पर..✍
वर्तमान दहशत के साये में भी सामाजिक रिश्तों की गहराइयों को थामे ..
शांत, सौहार्दपूर्ण वातावरण की अपेक्षाओं के संग नज़र डालें आज की प्रस्तुतियों पर..✍
सभी शोर मचाने में लगे है। न भारत कि ऐतिहासिक गौरव का मन मे कोई भान है और न ही अपनी सदियों पुरानी "अथिति देवो भव" की आदर्श को अपने स्मृति में सहेज कर रखा है।जब दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से मिलता है..
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मुँह अँधेरे वह चल पड़ती है
अपनी चाँगरी में डाले जूठे बर्तनों के जोड़े
और सर पर रखती है एक माटी की हाँडी
और उठा लेती है जोजो साबुन की
एक छोटी-सी टिकिया
जो वहीं कहीं कोने में फेंक दी जाती है
और नंगे पाँव ही निकल पड़ती है पोखर की ओर
हुर्र... हुर्र....हुर्र....
मर सैने पे......हुर्र मर... मर..
का शोर करती हुई,
बकरियों और गायों को हाँक ले जाती है
वह परवाह नहीं करती बबूल के काँटों की
क्योंकि काँटे पहचानते हैं उसके पैरों को,
पगडंडियाँ झूम उठती हैं...
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रिया की तीन दिन की छुट्टी है। महाशिवरात्री, चौथा शनिवार, रविवार। रिया सोच रही है कि इस वीकएंड अच्छे से आराम करेगी और कहीं आसपास घूमने भी जाएगी।
हर रोज तो सुबह सात बजे स्कूल के लिए निकलना होता है। बेटे और पति का लंचबॉक्स, दूध गरम करना, चाय बनाना, पौधों को पानी देना, सुबह के अपने रोजमर्रा के काम करना इन सबके लिए सुबह पाँच बजे उठो तो भी उसे वक्त कम पड़ता है....
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कुरुक्षेत्रे
के महारथी
सब गुणा-भाग में ।
धरना भी
प्रीपेड
हुआ शाहीन बाग़ में ।
जनता में
ईमान नहीं
हो गयी बिकाऊ,
लोकतंत्र
चाँद
सुना है तुम भी
लेफ्टिस्ट हो गए हो
चौदहवीं के चाँद थे तुम
बस अब
ईद के ही हो गए हो
तुम तो थे कवियों की
।। इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ‘तृप्ति’..✍


























