निवेदन।


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बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

1685.. सुना है तुम भी लेफ्टिस्ट हो गए हो...

।। भोर वंदन।।
"भावों के आवेग प्रबल 
मचा रहे उर में हलचल
कहते,उर के बाँध तोड़
स्वर-स्त्रोत्तों में बह-बह अनजान
तृण,तरु,लता,अनिल,जल-थल को
छा लेंगे हम बनकर गान
पर, हूँ विवश,गान से कैसे 
जग को हाय!जगाऊँ मैं
इस तमिस्त्र युग-बीच ज्योति की
कौन रागिनी गाऊँ मैं? " 
                           रामधारी सिंह दिनकर 
वर्तमान दहशत के साये में भी सामाजिक रिश्तों की गहराइयों को थामे ..
शांत, सौहार्दपूर्ण वातावरण की अपेक्षाओं के संग नज़र डालें आज की प्रस्तुतियों पर..✍
🍀🍀



सभी शोर मचाने में लगे है। न भारत कि ऐतिहासिक गौरव का मन मे कोई भान है और न ही अपनी सदियों पुरानी "अथिति देवो  भव" की आदर्श को अपने स्मृति में सहेज कर रखा है।जब दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से मिलता है..
🍀🍀




मुँह अँधेरे वह चल पड़ती है
अपनी चाँगरी में डाले जूठे बर्तनों के जोड़े
और सर पर रखती है एक माटी की हाँडी
और उठा लेती है जोजो साबुन की
 एक छोटी-सी टिकिया
जो वहीं कहीं कोने में फेंक दी जाती है
और नंगे पाँव ही निकल पड़ती है पोखर की ओर
हुर्र... हुर्र....हुर्र....

मर सैने पे......हुर्र मर... मर..
का शोर करती हुई,
बकरियों और गायों को हाँक ले जाती है
वह परवाह नहीं करती बबूल के काँटों की
क्योंकि काँटे पहचानते हैं उसके पैरों को,
पगडंडियाँ झूम उठती हैं...

🍀🍀



रिया की तीन दिन की छुट्टी है। महाशिवरात्री, चौथा शनिवार, रविवार। रिया सोच रही है कि इस वीकएंड अच्छे से आराम करेगी और कहीं आसपास घूमने भी जाएगी। 
       हर रोज तो सुबह सात बजे स्कूल के लिए निकलना होता है। बेटे और पति का लंचबॉक्स, दूध गरम करना, चाय बनाना, पौधों को पानी देना, सुबह के अपने रोजमर्रा के काम करना इन सबके लिए सुबह पाँच बजे उठो तो भी उसे वक्त कम पड़ता है....
🍀🍀


कुरुक्षेत्रे
के महारथी
सब गुणा-भाग में ।
धरना भी
प्रीपेड
हुआ शाहीन बाग़ में ।

जनता में
ईमान नहीं
हो गयी बिकाऊ,
लोकतंत्र
जर्जर, दीवारें..
🍀🍀



चाँद
 सुना है तुम भी
लेफ्टिस्ट हो गए हो
चौदहवीं के चाँद थे तुम
बस अब
ईद के ही हो गए हो
तुम तो थे कवियों की
रचना का सुंदर मुखड़ा...

हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए

।। इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ‘तृप्ति’..✍


मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

1684....बेटी ने उंगली पकड़कर संभाला मुझे


जय मां हाटेशवरी....
मुझे लगता है.....
आज देश में दो तरह के ही लोग हैं.....
एक वो जो सरकार के पक्ष में बोलते हैं.....
दूसरे सरकार के विरोध में.....
सत्य बोलने वाले कहीं नजर नहीं आ रहे....
ये शायद महाभारत काल सी स्थिति है......
जहां एक न एक पक्ष के साथ जाना ही था.....
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मिडिया भी स्वतंत्र नहीं है.....
जनता भ्रमित है......
इस लिये शायद देश सही दिशा में नहीं जा रहा है.....


भाई रविंद्र जी की पसंद आप रविवार को पढ़ चुके हैं......
इस लिये आज आप मेरी पसंद पढ़िये......

बेटी ने उंगली पकड़कर संभाला मुझे
सफर बहुत आसान रहा
मुझको बहुत आराम रहा
बेटी ने उंगली पकड़कर संभाला मुझे
बहुत सुखद अंजाम रहा

कथन-अमानुषिकता से जूझती दुनिया

महज इत्तेफाक नहीं है यह
कि सदियों से वे
साढ़े तीन हाथ लम्बी नाक लिए
अवतरित होते हैं
हम पैदा होते हैं नकटे ही
नकटे ही मर जाते हैं.

कि हमारी धोती
घुटने नहीं ढंक पाती हमारे
उनकी धोती अंगूठा चूमती है पैर का
तर्जनी में घूमती है.

कुण्डलियाँ , "फूल "

फूल खिले हैं डाल पे, महक उठा है बाग।
 बैठ डाल पर आम की, कोयल गाती राग।
 कोयल गाती राग, भ्रमर तितली भी डोले।
 आओ रस लो बाँट, मधुमक्खी भी बोले।

देख आया हूँ ...
अप्सराओं का रोता हुआ संसार देख आया हूँ --
वेदना से मुक्ति का सन्मार्ग बताने वालों की
षड़यंत्री सहयोग रक्ताई तलवार देख आया हूँ
खुशियाँ छिन लेता है जमाना जहालत देकर
देकर शीतल छांव घातक प्रहार देख आया हूँ -


कांटे नागफणी के

बड़े पहरे लगे हैं आसपास
 नागफनी के काँटों  के  |
जैसे ही हाथ बढते हैं उसकी ओर
नागफनी के  कंटक चुभते हैं
चुभन से दर्द उठाता है
बिना छुए ही जान निकलने लगती है |
 वह है वही नागफणी की सहोदरा सी

 डर लगता है
मुझको तेरा भय दिखलाकर तुमको मेरा भय दिखलाया
थी जो मेड़, बन गयी खाई फिर पक्की दीवार बनाया
हमे तुम्हारे तुम्हें हमारे व्यवहारों से डर लगता है
कपटसंधियाँ करने वाले जनगणमन का गान कर रहे
षडयंत्रो की रचना वाले संविधान का नाम जप रहे
मुझको इन रचनाकारों से डर लगता है डर लगता है !!

लघुकथा : बुके
सखियों की मण्डली खिलखिलाती बातें करती लॉन में जमी थी । बातों का दौर न जाने
कहाँ - कहाँ की सैर करता घर की तरफ मुड़ गया और अनायास ही एक - दूसरे की प्रशंसा
और टिप्स लेने - देने का दौर चल निकला ।

अब इस सप्ताह का विषय
हम-क़दम-109
विषय है
'पतवार' 
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार


आज सिन्धु ने विष उगला है
लहरों का यौवन मचला है
आज हृदय में और सिन्धु में
साथ उठा है ज्वार
रचनाकार हैं
कविवर डॉ.शिवमंगल सिंह 'सुमन'
प्रेषण तिथिः 29 फरवरी 2020
प्रकाशन तिथिः 02 मार्च 2020
ब्लॉग सम्पर्क फार्म द्वारा


धन्यवाद।
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

1683..हम-क़दम का एक सौ आठवां अक,,वेदना

स्नेहिल अभिवादन
वेदना मूलतः संस्कृत शब्द है जिसका शाब्दिक 
अर्थ पीड़ा,दर्द,व्यथा इत्यादि है।
मनुष्य के मन की भावनाओं में दो भावों की प्रधानता है  
सुख और दुख। दुख को नैसर्गिक रुप से बिना किसी कृत्रिमता और छल,कपट के बड़बोले आडंबरों से मुक्त, 
मानसिक व्यथा की अनुभूति ही वेदना है।

अनुभूति जब तीव्र वेग से भावनाओं को उद्वेलित करती है तो संवेदनशील कवि हृदय की करुण शाब्दिक अभिव्यक्ति 
रचना के रुप में व्यक्त होती है।

कुछ कालजयी रचनाएँ

स्मृतिशेष सुभद्रा कुमारी चौहान
वेदना ....
दिन में प्रचंड रवि-किरणें
मुझको शीतल कर जातीं।
पर मधुर ज्योत्स्ना तेरी,
हे शशि! है मुझे जलाती॥

संध्या की सुमधुर बेला,
सब विहग नीड़ में आते।
मेरी आँखों के जीवन,

बरबस मुझसे छिन जाते॥

स्मृतिशेष महादेवी वर्मा
विरह का जलजात जीवन, विरह का जलजात!
वेदना में जन्म करुणा में मिला आवास;
अश्रु चुनता दिवस इसका, अश्रु गिनती रात!
जीवन विरह का जलजात!


ना आए विरह की रैन ...रानी विशाल

कोयल कूहके बाग में, पपीहे ने मचाया शोर
ऋतु पर भी यौवन चड़ा, पर ना नाचे मन का मोर

लगे है चन्दन आग सा, पुरवाई चुभोए शूल
मैं जोगन बन राह तकू, पियुजी गए तुम मुझको भूल

चंद्रप्रभा से रात सजी, तारो ने जमाया डेरा
सिसक विरह में रात कटी, असुवन में हुआ सवेरा

....
नियमित रचनाएँ
.....
आदरणीय शुभा मेहता
मन की वेदना के ,
आँगन में.......
कुछ फूल खिले
अश्रु बूँदों से सिंचित
श्वेत से थे कुछ -कुछ
रंगहीन .....


आदरणीय व्याकुल पथिक
हम हिन्दीभाषी सच पूछे तो परिस्थितिजन्य 
कारणों से दो नावों की सवारी के 
आदती हो गये हैं और हमारे पास अध्यात्म, 
साहित्य, संस्कृति एवं संस्कार का विपुल 
भण्डार होकर भी ऐसा क्यों लगता है 
कि अपना कुछ भी नहीं है !

आदरणीय भाई रवीन्द्र सिंह जी
असीम वेदना ...
असीम वेदना से 
सहती है नादान इंसान के 
स्वकेन्द्रित क्रिया-कलाप 
हवा-पानी धूप-चाँदनी से 
कहती है-
भेदभाव हमारी नीयत में नहीं


आदरणीय उर्मिला सिंह
वेदना के पल
आस का पक्षी फडफडाता,उम्मीदों की शाख पर 
मन की डारियां झुला झूलाती पीले पीले पात पर 
चट्टानों की दरारों से झांकता सहमा सा उजास है 
वेदना की  मुस्कान अँधेरों  से  मिली  सौगात है!! 

आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा
लहर! नही इक जीवन!

टिसते, बहते ये घन,
हलचल है, श्मशान नहीं,
रुकना होता है, थम जाना होता है,
भावों से, वेदना को, 
टकराना होता है,
तिल-तिल, जल-कर, जी जाना होता है!
जीवन, तब बन पाता है!

आदरणीय साधना वैद
वेदना की राह पर

वेदना की राह पर
बेचैन मैं हर पल घड़ी ,
तुम सदा थे साथ फिर
क्यों आज मैं एकल खड़ी !

थाम कर उँगली तुम्हारी
एक भोली आस पर ,
चल पड़ी सागर किनारे
एक अनबुझ प्यास धर !


आदरणीय कविता रावत
असहाय वेदना.....
किन्तु अब पुत्र-वियोग है भारी,
न सुहाग न पुत्र रहा अब
खुशियाँ मिट चुकी है मेरी सारी।'
'असहाय वेदना' थी यह उसकी
गोद हुई थी उसकी खाली,
वो दुखियारी पास खड़ी थी
दूर कहीं की रहने वाली।।



आदरणीय सुजाता प्रिय
विरह वेदना
वेदना से क्या कहूँ,
यह दिल बड़ा बेचैन है।
दिन नहीं कटता यहाँ,
कटता नहीं अब रैन है।
अहसास हो कुछ आस का,
तुम ऐसी कोई शाम दे दो



आदरणीय कुसुम कोठारी
राधा जी की विरह वेदना 

विरह वेदना सही न जावे
कैसे हरी राधा समझावे
स्वयं भी तो समझ न पावे
उर " वेदना "से है अघावे।

आदरणीय अनुराधा चौहान
मेरी वेदना ..

तेरी यादों की हवा मुझे छूकर गुजरती है
मेरे जख्मों को कुरेद आँखें नम कर देती है
डूबती हूँ मैं अपने अतीत की गहराई में 
तुझसे मिलने की चाहत बेचैन करती है

मेरे दर्द की इंतहा उफ़ ये तेरा इंतज़ार
बेकरार कर देती है आहट हर प्रहर
हवाओं के झोंके यादों को झिंझोड़ते
आँखों में उतरने लगती दर्द की लहर

आदरणीय मीना शर्मा
सृजन गीत
वेदना,पीड़ा,व्यथा, को
ईश का उपहार समझो,
तुम बनो शिव,आज परहित
इस हलाहल को पचा लो !
सृजन में संलग्न होकर.....

नीर को, अब क्षीर से,
करना विलग तुम सीख भी लो,
उर-उदधि को कर विलोड़ित,
नेह के मोती निकालो !
सृजन में संलग्न होकर.....

श्वेता 
विरहिणी/वसंत

विरह की उष्मा  
पिघलाती है बर्फ़
पलकों से बूँद-बूँद
टपकती है वेदना 
भिंगाती है धरती की कोख 
सोये बीज सींचे जाते हैं,
फूटती है प्रकृति के
अंग-प्रत्यंग से सुषमा,
अनहद राग-रागिनियाँ...,
....
वेदना एक गम्भीर विषय
इस विषय पर रचना लिखना
एवरेस्ट फतह के समान है
सभी को शुभकामनाएँ
कल आएँगे भाई कुलदीप जी
नए विषय के साथ
विदा दें ..
सादर..














रविवार, 23 फ़रवरी 2020

1682...स्लम के आगे उठ गयी, अब ऊंची दीवार...


 सादर अभिवादन। 

आदमी पर आदमी के अत्याचार 
असुरक्षा का मन पर भारी भार,
आख़िर हासिल होता क्या उन्हें
क़ानूनी मार सामाजिक तिरस्कार।
-रवीन्द्र 
आज भाई कुलदीप जी के स्थान पर मैं हाज़िर हूँ 
सद्य प्रकाशित पसंदीदा रचनाओं के साथ। 
आइए पढ़ते हैं आज की चयनित रचनाएँ-


सदा ट्रम्प को होत है, पत्तन में सत्कार,
स्लम के आगे उठ गयी, अब ऊंची दीवार.

फ़ितरत..... डॉ. जेन्नी शबनम 

मेरी फ़ोटो

साथ सफर पर चलने के लिए   
एक दूसरे को राहत देनी होती है   
ज़रा-सा प्रेम, जरा-सा विश्वास चाहिए होता है   
और वह हमने खो दिया था   
जिंदगी को न जीने के लिए   
हमने खुद मजबूर किया था,   
सच है बीती बातें न भुलाई जा सकती हैं   
न सीने में दफ़न हो सकती हैं   


लगता रावण की बस्ती में
मुझे अचानक राम मिला है

खुशबू बांटो डूब प्यार में
तुझे सुमन जो नाम मिला है
 
 
मेरी फ़ोटो

वो के हवाले से उसकी सारी बात कह देते हैं महफिल में
ये तो शायरों की जुबान फिसलती है और क्या है
 
वो क्या है जिसका इस्तेमाल खाने में नहाने में लगाने में होता है
तन्हा इसका जवाब हल्दी है और क्या है


बचपन-के-कड़वे-घूँट-Poor-Children-in-India
आज इन बच्चों को सड़क पर इस तरह देखा तो मन में एक साथ हज़ारों सवाल फूट पड़े इतनी छोटी सी उम्र में ये बच्चें ये सब क्या कर रहे हैं ? ये सब काम अपनी मर्ज़ी से कर रहे हैं या फिर इनके घर वाले करवा रहें हैं ? क्यूँ इन मासूमों से इनका बचपन छीना जा रहा है ?  






आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे आगामी गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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