सादर अभिवादन।
आदमी पर आदमी के अत्याचार
असुरक्षा का मन पर भारी भार,
क़ानूनी मार सामाजिक तिरस्कार।
-रवीन्द्र
आज भाई कुलदीप जी के स्थान पर मैं हाज़िर हूँ
सद्य प्रकाशित पसंदीदा रचनाओं के साथ।
सद्य प्रकाशित पसंदीदा रचनाओं के साथ।
आइए पढ़ते हैं आज की चयनित रचनाएँ-
सदा ट्रम्प को होत है, पत्तन में सत्कार,
स्लम के आगे उठ गयी, अब ऊंची दीवार.
फ़ितरत..... डॉ. जेन्नी शबनम
साथ सफर पर चलने के लिए
एक दूसरे को राहत देनी होती है
ज़रा-सा प्रेम, जरा-सा विश्वास चाहिए होता है
और वह हमने खो दिया था
जिंदगी को न जीने के लिए
हमने खुद मजबूर किया था,
सच है बीती बातें न भुलाई जा सकती हैं
न सीने में दफ़न हो सकती हैं
एक दूसरे को राहत देनी होती है
ज़रा-सा प्रेम, जरा-सा विश्वास चाहिए होता है
और वह हमने खो दिया था
जिंदगी को न जीने के लिए
हमने खुद मजबूर किया था,
सच है बीती बातें न भुलाई जा सकती हैं
न सीने में दफ़न हो सकती हैं
लगता रावण की बस्ती में
मुझे अचानक राम मिला है
खुशबू बांटो डूब प्यार में
तुझे सुमन जो नाम मिला है
मुझे अचानक राम मिला है
खुशबू बांटो डूब प्यार में
तुझे सुमन जो नाम मिला है

वो के हवाले से उसकी सारी बात कह देते हैं महफिल में
ये तो शायरों की जुबान फिसलती है और क्या है
वो क्या है जिसका इस्तेमाल खाने में नहाने में लगाने में होता है
तन्हा इसका जवाब हल्दी है और क्या है

आज इन बच्चों को सड़क पर इस तरह देखा तो मन में एक साथ हज़ारों सवाल फूट पड़े । इतनी छोटी सी उम्र में ये बच्चें ये सब क्या कर रहे हैं ? ये सब काम अपनी मर्ज़ी से कर रहे हैं या फिर इनके घर वाले करवा रहें हैं ? क्यूँ इन मासूमों से इनका बचपन छीना जा रहा है ?
आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे आगामी गुरूवार।
रवीन्द्र सिंह यादव

