आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
तृण पात सारे डोल रहें हैं
मन की परतें खोल रहें हैं
धीरे धीरे मद्धम मद्धम
कानों में कुछ बोल रहें हैं
बूंदों से आह्लादित मन
जंजीरें कितनी तोड़ रहे हैं
खुल रहे मन के बंधन आज, झींगुर प्रिय के गीत सुनाते
तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते
प्रेम प्यार और हँसी-खुशी से
जीवन लहर लहराने को।
अपनेपन का बीज हर एक
मन में बोते जाने को।
स्वार्थ का कूड़ा छींट-फटककर
जीवन से हटवाने को।
होने वाला है क्या?
जो हैं बिछड़ गए हमसे ।
करते होगें
याद हमें क्या ?
या ,फिर भूल गए होंगे
या ,फिर बस गई होगी उनकी
कोई नई दुनियाँ ......
वर्षा की बूँदों से सजी हुई है धरती,
काजल से काले बादल घिरें कभी,
घुल-घुल बरखा की लग जाए झङी।
स्मृतियों के मयूर तब पंख फैलाएंगे,
छम-छम करते मेघ मल्हार गाएंगे।
पानी के बुलबुले, बचपन की यादें,
काग़ज़ की नाव जल में तैराएंगे !
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