निवेदन।


फ़ॉलोअर

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

4711...झूमर से झूमते अमलतास फूले...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय नूपुरं जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 


भारतीय फ़िल्म संगीत का चमकदार सितारा रहीं आशा भोंसले जी अब दूसरी दुनिया के सफ़र पर चली गयी हैं. संगीत जगत में एक युग जैसे समाप्त हो गया!
विनम्र श्रद्धांजलि!
अपने स्वर से दुनिया को विविधतापूर्ण मनोरंजन देनेवाली आशा जी अपने पीछे संगीत का समृद्ध ख़ज़ाना छोड़ गयीं. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे.
उनके कुछ नग़्मे जो मेरे दिल को छू गये-
          1.नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है.
          2.उड़ें जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरीं  
          3.ओ मेरे सोना रे 
          4.जहाँ तक महक है मेरे गेसुओं की, चले आइए 
          5.कोई आया, धड़कन कहती है 
          6.मेरे भैया, मेरे अनमोल रतन, तेरे बदले में  ज़माने की कोई चीज़ न लूँ 
          7.यार बादशाह, यार दिलरुबा
          8. इक परदेसी मेरा दिल ले गया 
          9. झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में 
         10. अभी न जाओ छोड़कर  
              आदि -आदि...।


सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

झूमर तले

झूमर से झूमते अमलतास फूले
रास्तों के किनारे सोनमोहर बिछे

छज्जे-छज्जे पर बोगनवेलिया लगे

मजाल है कि कोई भी रंग छूट जाए 

***** 

“गम वॉल”

धीरे-धीरे कुछ आँखों को इसमें भी कला नज़र आई,
बेतरतीब सी ये आदत, एक अजीब सी पहचान बन पाई।
जो था कभी आलस का खेल, अब बन गया एक तमाशा,
लोग यहाँ तस्वीरें खींचें, जैसे कोई अनोखा नज़ारा।

*****

हल्का होकर उड़े गगन में

कितनी चट्टानें थीं भारी 

रस्तों में पावन सलिला के,

राह बनाती उन्हें तोड़ती 

ठुक-ठुक चलती थी अंतर में!

*****

जज़्बा

यूनियन अध्यक्ष ने माइक संभाला, सभा शुरू हुई. आज उनका लहजा बदला हुआ था, आवाज में गुस्सा था और ऊँची थी, "साथियों, प्रबंधन कहता है कि कारखाना घाटे में है! जिसके कारण वे इसे चलाने में असमर्थ हैं, वे सरकार से इसे बंद करने की परमिशन मांग रहे हैं. लेकिन आज हमारे पास वो सच है जो इनके मुहँ बन्द कर देगा."

*****

आज पढ़‍िए...'पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना'

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव


रविवार, 12 अप्रैल 2026

4710 ..ख़ुद अपनी हँसी से आँख मिलाना भूल गए हम।

 सादर अभिवादन


अब खुद ही गिर जाओ तुम, 
टूट कर जमीन पर 
पत्थर मारने वाला बचपन, 
मोबाइल मे व्यस्त है।।


रचनाएं ....


इ तना ही नहीं नेहरू ने अरुण की आर्थिक सहायता की और उसे फिर से पढ़ने के लिए भी प्रेरित किया ! काम के बोझ के बावजूद अरुण ने मेहनत की और 10वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा सफलतापूर्वक पास की ! 
आज वह कंटेंट क्रिएटर बन चुका है। 
उसकी एक पहचान बन चुकी है ! अगर नीयत साफ हो और साथ देने वाला, सच्चा मित्र हो, 
तो मंजिल मिल ही जाती है। गरीबी के कारण जिन हाथों ने कलम छोड़ सफाई का कपड़ा थामा था, 
आज उन्हीं हाथों में कामयाबी की चाबी है। 
आज वो लाखों दिलों पर राज कर रहा है ! यह उपलब्धि अरुण जैसे
 हजारों बालक-बालिकाओं के लिए प्रेरणा बन सकती है 




किराए की हँसी चेहरे पे पहने रहे उम्र भर,
आँख क्या छलकी कि मुस्कुराना भूल गए हम।

बेच डाली मुस्कुराहट इक खिलौने के लिए,
ख़ुद अपनी हँसी से आँख मिलाना भूल गए हम।





AIIMS अधिनियम, 1956
नेहरू की तत्परता से नहीं,
अमृत कौर के लगातार दबाव से पास हुआ।
उन्होंने लड़ाई लड़ी:
अफसरशाही की सुस्ती से
मंत्रिमंडल की उदासीनता से
कांग्रेस की ढिलाई से
फाइलें चली क्योंकि उन्होंने जबरदस्ती चलवाईं।
(स्वतंत्र भारत की प्रथम स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर को
AIIMS के लिए पूरा श्रेय मिलना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं।
)


तुम्हारी हथेली


काश! कि ये दुनियारी हथेली
कोमल होती
तुम्हारी हथेली की तरह
मैं रख देती चुपके से
इच्छाओं के फूल
और गहरी साँसें
पतझड़ की टूटन
अब सँभलती नहीं
उदासियाँ दफ़न हो रही हैं
साँसों में
साँसें कितनी उथली चलती हैं
इन दिनों।




कच्चा चिट्ठा



अचानक प्रशांत बाबू बोल उठे. "कॉमरेडों, तुमने जबर्दस्त काम किया है. फैक्ट्री प्रबंधन के लिए डेथ वारंट तैयार कर दिया है.. हमने साबित कर दिया है कि फैक्ट्री मुनाफे में चल सकती है, बस मालिक की नीयत खोटी है."
उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी. "शानदार! यह काम एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की टीम हफ़्तों में करती. अब हमारे पास आम सभा में मज़दूरों को देने के लिए केवल ही भाषण नहीं, बल्कि ठोस सुबूत हैं."


सादर समर्पित
सादर वंदन



सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

4709 ..हठ कर बैठ गया आमरण अनशन पर और मैं बन जाऊँगा धरती का भगवान।

 सादर अभिवादन


हो गए चूर सपने बच्चों के
खा गई बाप को ये बोतल क्या

सच ओ ईमाँ की बात करता है
उसको कहता जहां ये पागल क्या
 
ढूंढ ही लेते हैं मुझे ये ज़ख़्म
ज़ख़्म  भी बन गए है गूगल क्या
 
गुमनाम पिथौरागढ़ी  


रचनाएं ....




वह उंगली
दरअसल किसी एक की नहीं—
पूरी व्यवस्था की है,
जो हर चौराहे पर
खुद को बेकसूर साबित कर देती है।





प्रशांत बाबू को मेवाड़ भोजनालय पहुँचने में नौ बज गए, वहाँ प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य उन्हें इन्तजार करते मिले. कारखाना बंदी का आवेदन और उसके साथ के दस्तावेजों को चारों ने देखा.

प्रिया ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, "सर¡ यह घाटा पूरी तरह 'मैन्युफैक्चर' किया लग रहा है. हमें इनकी बैलेंस शीटों का एनालिसिस करना पड़ेगा. क्या हम इस आवेदन और दस्तावेजों 
को अपने साथ ले जा सकते हैं?”




प्यार का ये सिलसिला शायद 
यूँ ही चलता रहेगा,
कोई चाँद से, कोई धरती से, 
यूँ ही दिल लगाता रहेगा।




हठ कर बैठ गया
आमरण अनशन पर
और मैं बन जाऊँगा
धरती का भगवान।
पर कोई नहीं आया
तब मैंने
इससे कहा
उससे कहा
कोई तो आओ
मुझे संतरे का रस पिलाओ
एक भिक्षु ने देखा
तो दौड़ा आया
मुझे रस पिलाया
पात्र अपनी झोली में रख लिया।
अनशन से मुक्ति मिली
नृत्य गया भाड़ में
मेंने तो पहले ही कह दिया था
ना मैं हारा
ना तू जीता
चलो अब फिर से
तेल निकालें
अपने-अपने कुयें से।




दादी ने पादरी साहब के कान खींचते हुए कहा, वाह रे अधर्मी ! 
मुझे एक दिन केक खिलाया तो मैं ईसाई हो गई। और मैं प्रतिदिन तुमको अपने घर का खिलाती हूँ, 
तो तू हिन्दू कैसे नहीं हुआ रे नमक हराम ? 
तू तो प्रतिदिन सनातन धर्म की इस आदि भूमि का वायु, जल लेता है 
फिर तो तेरा रोम-रोम हिन्दू बन जाना चाहिए।
अपने स्वधर्म और राष्ट्र को पथभ्रष्ट होने और गलत दिशा में जाने से बचाने वाली 





खोखली सी नींव पर ही घर बनाते आजकल।
मौन हों संवाद पूछें क्यों डराते आजकल।।

जो हृदय की वेदना जग से छुपाने में लगे,
वह स्वयं की मुश्किलों को ही बढ़ाते आजकल।।

सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

4708... अपने कर्म ही

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
--------------

हर माह का अपना सौंदर्य, गंध, स्पर्श, शब्द संगीत और रस होता है। फागुन रंग का, चैत गंध का, बैसाख रस का महीना है। फागुन बीतते ही चैत के शब्द अलग हो जाते, हवाओं में अलग महक और गीत भर जाते हैं। बैसाख आते आते मौसम की छाप बदल जाती है। गुलमोहर और अमलताश के साथ नीम के फूलों से, जामुन के नए पत्तों से, अमिया की खुशबू  से बैसाख का सौंदर्य निखर आता है। 

 बैसाखी हवाओं के स्पर्श को महसूस करिए,  रसभीनी, थोड़ी अलसाई और तरुण भाव के साथ बह रही बैसाखी हवाओं को त्वचा पर से गुजरते महसूस कीजिए। बैशाखी हवाओं में घुली कोयल की कटीली तान भोर की  छुअन को नशीली  बना देती है। सांझ को चाँदनी की छाँह में बेली की कली से फूटती गंध मन को आनंद से ओतप्रोत कर देती है।

घड़े का  ठंडा पानी ,  गुड़ का शरबत,अमझोरा,  शिकंजी  और सत्तू का स्वाद बैसाख का स्वाद है। चूल्हे पर सिंकती नए गेंहू की रोटी की गंध बैसाख की गंध है। फूलों के दिन बीत गए, बैसाख फलों के रसगंध से भरता है। महुए का रस, आम का रस, बेल का रस ही तो बैसाख का रस है।



आज की रचनाऍं- 



अपने कर्म ही

पहचान बनाते हैं ।

अपने कर्म ही

धूल चटाते हैं ।


बाकी सारी बातें

सब बेकार हैं ।

अपने कर्म ही

बनाते-बिगाङते हैं ।




बोध आत्मा का करें किस विधि

कहाँ उस आनंद को पाएँ, 

  उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि

कैसे लौट वहाँ घर जायें !



युगों
का थमा हुआ
अट्टहास,
पुनः
हो चला है जागृत, पुनर्जन्म के संधान में
चल पड़े हैं अभिशापित सभी जीवित
या मृत, अनंत पथ के वो यात्री
पाना चाहे इसी धरा पर
सूत्र अमर्त्य, अलौकिक
रंगमंच पर है मंचित
छायानृत्य ।




आँखों में यौवन की चपलता पर

किनारों पर  मंडरा रही थी 

भूख की चिलचिलाती धूप

हँसती थी बेफिक्र सी हँसी

नहीं, उमड़ते गड्डे उसकी गालों में

पेट छिप जाता पीठ के अंदर





इस मनोरम विधि से अगले दिन दोपहर तक साल भर पहले हुये कत्ल के बारे में आधा गाँव जान गया,

गाँव का सरकारी चौकीदार जान गया और जान गया निकटस्थ थाना।

शाम होते न होते कातिल किसान के हाथों में लोहे के कंगन पड़ गये।

----------
आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
------------

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

4707 ..अहं ब्रह्मास्मी, अहं कृष्णास्मी,अहं त्वमस्मी

 सादर अभिवादन


एक व्यक्ति होटल की टेबल पर बैठा था.
वेटर बोला - सर क्या लेंगे?
व्यक्ति - गुजरा हुआ वक़्त.
वेटर बोला - सर वो तो खत्म हो गया पछतावा ताजा है वो ले आऊँ.



सब्र का रास्ता मुश्किल ज़रूर होता है
लेकिन सब्र करने वाले की मंजिल
खूबसूरत होती है


रचनाएं ....



तुम्हारे हर उस जुर्म का
मैं ही हूँ कारक 
तुम्हारे हर उस पुण्य का
अहं ब्रह्मास्मी 
अहं कृष्णास्मी
अहं त्वमस्मी





प्रिया की टीम ने तुरंत 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' पर एक नया संदेश प्रसारित किया: 
"दूरी बढ़ी है, हौसला नहीं. हम गेट से दूर हुए हैं, लक्ष्य से नहीं."

शाम को रामजी काका ने प्रशांत बाबू से कहा, "बाबू, 100 मीटर दूर होने से क्या होता है? हमारी निगाहें 
तो अभी भी गेट पर ही हैं. हम गेट पर ही 'सामूहिक रसोई' शुरू करेंगे. हड़ताल करने वाले मजदूर 
यहीं सड़क के किनारे बैठकर खाना खाएंगे."

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए प्रिया को फोन किया, "प्रिया, अब असली परीक्षा शुरू हुई है. 
कल शुक्रवार है, और मुझे लग रहा है कि मालिक कोई बड़ा धमाका करने वाला है. तैयार रहना."




मगर मैं भी तो इंतज़ार करती हूँ 
अपने समय का, अपने पल का।
शाम होती है, पाँच बजे…
मुझे भी लीश डाल कर ले जाते हैं
घूमने, हवा में सांस लेने।





बचपन बीता, जवानी आई, बढ़ती रही ये लगन,
हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा उसे दिल में बसा लिया है।

आज वो आधा सा क्यों नज़र आता है मुझे,
लगता है उसका आधा दिल मैंने ही ले लिया है।





फिर—
उसकी उसी मुस्कुराती तस्वीर को
हर चौराहे पर
होर्डिंग बनाकर टाँग दी गई,

और नीचे लिखा था—
“यह है
राज्य की खुशहाली का प्रमाण।”




सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

4706..इंसान खुद को भगवान बना बैठा है

 ।।प्रातःवंदन।।

जंग… आखिर देती ही क्या है?

जंग जीतने वाले शायद जश्न पर हार तो इंसानियत की होती है..बचे  मासूम चेहरों को न राजनीति समझ आती, न ही सरहदें…उन्हें बस विवशता  भरी नजर और भूख लगती है और थोड़ा सा सुकून की आस।बहुत दुखद है यह देखना..

यह गुंजार कहाँ से आयी

चौंक पड़ा, मैं बोल उठा,

कँपने लगा हृदय, हरि जाने

मैं भय-विह्वल डोल उठा !

माखनलाल चतुर्वेदी

इन्हीं  कशमकश के बीच बुधवारिय प्रस्तुतिकरण लिए आज फिर हाजिर हूं..

माना अभी दूर जाना है


कितनी पूनम जागेंगे हम

कितने सूरज और देखने, 

 छुपा गर्भ में यह भावी के

किंतु सजा सकते हैं सपने !

✨️

नई पीढ़ी !

                   अस्पताल के बाहर कार और बाइक के स्टैंड अलग अलग बने थे और दोनों तरफ वाहन खड़े थे कि इतने में हड़बड़ी में एक साइकिल वाला आया और जल्दी से साइकिल खड़ी करके अंदर की तरफ भागा। 

जल्दी में साइकिल डगमगा गयी, 

✨️

आज इंसान खुद को भगवान बना बैठा है

अब AI (आर्टिफिशियल इन्टेलिजेंस) का जमाना है। बनाने वाले ने तो न जाने क्या सोच कर बनाया होगा मगर इस्तेमाल करने वालों के तो क्या कहने।

बनाया तो भगवान ने भी ..

✨️

चार दिशाओं में
मिलने के लिए आना चाहती थी
मायके की छत के नीचे
ताकि बांट सके अपने संताप को
और सुख के संदूक को 

पर आ न सकी कभी इकट्ठी..

✨️

तुम भुला दो मुझे बचपन की तरह

मिलेंगे अब तो सिर्फ़ दुश्मन की तरह

तुम भुला दो मुझे बचपन की तरह


।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

4705...अमित,तुम्हें कैंसर है...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
--------
जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है।
नून-रोटी के जुगाड के ज़द्दोज़हद में अनगिनत पल ऐसे आते हैं जब निराशा एक अंधेरी गुफा की तरह
मन पर छा जाती है।
कोई राह नहीं सूझता,अंधेरे में अनजान मुसीबतों,
 ठोकरों और शत्रुओं के प्रति आशंकित मन फिर भी
घुप्प अंधेरी गुफा का छोर ढूँढ़ना नहीं छोड़ता है
और तब तक टटोलता रहता है जब तक कोई
 उजाले की किरण उस कालिमा को मिटा न दे।
उजाला जीवन की सकारात्मकता,आशा,खुशियाँ और प्रगति का प्रतीक होता है।


आज की रचनाऍं- 


यह पोस्ट लिखना इस लिए जरूरी लगा कि अब तक सबसे फ़ोन पर और इनबॉक्स में झूठ बोल बोल कर थक गया था। अधिकतर लोग शक कर रहे थे कि जिम की पिक नही आ रही, मुम्बई में इतने दिन क्यों, नए जॉब का क्या हुआ etc.

Life_is_so_unpredictable , क्या क्या नही सोच लिया इस बीच मगर यह समझ मे आया कि अंदर की मजबूती ही फाइट करने का सहारा बनती है बाकी दुनिया फिर बेमानी लगती है।




जघन्यता और पाशविकता
चीखों की जनक हैं—
इनका जन्म
अक्सर
आदिम हवस
और धार्मिक कट्टरता की
अंधी सुरंगों में होता है।

 




बस… यहीं से हर किसी की आँखें नम हो गईं… 😢
क्योंकि ये सिर्फ़ कार्ड नहीं था, ये इंसानियत का पैग़ाम था।  
आज जब दुनिया धर्म के नाम पर बंट रही है, तब ये कहानी हमें याद दिलाती है:
👉 मोहब्बत का कोई मज़हब नहीं होता
👉 रिश्ते खून से नहीं… दिल से बनते हैं




सेना की भर्ती खुली है
बीच युद्ध के दौरान
और इसमें भर्ती होने से मना करना 
राष्ट्र के लिए कर्तव्य की अवहेलना है
जबकि रोजगार के अवसर भेंट चढ़ गए हैं
युद्ध के उन्माद के ! 



सुनो, सीता,

मैं राम हूँ, मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ, 

तुम्हारा अपहरण नहीं होता, 

तो मैं युद्ध नहीं करता,

पर मेरी जगह कोई और होता,

तो चढ़ाई कर देता बिना कारण,

उठवा लेता लंका का सारा सोना।




----------------
आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
-----------

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...