निवेदन।


फ़ॉलोअर

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

4704 ...मैडम, हम आपके "फेसबुक फ्रेंड" हैं

 सादर अभिवादन



तीन चोर अचानक एक घर में घुसे।
उन्होंने महिला से कहा, "हम आपके घर का सामान बिखेरना नहीं चाहते और न ही
आपको नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।
इसलिए हम यहाँ सोफे पर बैठ रहे हैं, जो भी नकदी और गहने आपके पास हैं, चुपचाप लेकर आइए।"

महिला नकदी और गहने लेकर आई। चोरों के सरदार ने कहा, "वो हीरे की अंगूठी कहाँ है
जो आपके पति ने शादी की सालगिरह पर आपको गिफ्ट की थी?" 
महिला चुप रही और अंगूठी लाकर दे दी।

"वो घड़ी भी लाइए जो आपकी बहन ने दुबई से भेजी थी।"
महिला की आँखों में आँसू आ गए और उसने अपनी बहन का दिया हुआ उपहार भी सौंप दिया।

इसके बाद चोरों ने कहा, "अब हम 'नेसकैफे' की इंस्टेंट कॉफी पीएंगे, क्या आप इजाजत देंगी?"
कॉफी पीने के बाद, चोरों के सरदार ने कहा, "अब वो पाइनएप्पल केक लाइए जो कल बचा हुआ था।"

जब चोर सारे सामान लेकर जाने लगे, तो महिला ने झिझकते हुए कहा, "आप लोग बड़े प्रोफेशनल और 
नैतिक चोर लगते हैं लेकिन आपने हमारे घर की इतनी सारी चीजों के बारे में कैसे पता लगाया?"
चोरों के सरदार ने अपने चेहरे पर मास्क ठीक करते हुए कहा- "मैडम, हम आपके "फेसबुक फ्रेंड" हैं 
और #आपकी_पोस्ट और स्टेटस नियमित रूप से पढ़ते रहते हैं।"

रचनाएं देखें



चीख की
कोई भाषा नहीं होती,
उसे सुनने के लिए
किसी अनुवादक की ज़रूरत नहीं—
उसका एकमात्र वाहक
संवेदना है,
और संवेदना की भी
कोई भाषा नहीं होती।

हृदयविदारक होता है
चीख और संवेदना का मिलन,
क्योंकि इस मिलन से
जन्म लेती हैं
पराश्रव्य सुबकियाँ।




सुन के हज़ार क़िस्से 
हमने ये आज माना 
हर बार ही नए हैं 
क़िस्से ये प्यार के

मुझसे ख़फ़ा है आज जो 
बरसो के मीत है 
कहते हैं आप ही क्यूँ 
दुख औरों के काटते




जगाए, यूँ कोई उत्सुकता,
बढ़ाए, सफर में, हर पल कोई, मेरी उत्कंठा,
न प्रारब्ध हो, फिर यहां,
न अंत हो कहीं, इस सफर का!





बच्चों को भी अगर एकदम से बहुत सारी बातें समझाने लगो, तो वो भी ‘उछल’ जाते हैं… मानते नहीं।
लेकिन अगर प्यार से, धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा समझाया जाए… तो वो भी मान जाते हैं।”
निधि मुस्कुरा उठी।
उसे अपने सवाल का जवाब मिल चुका था।





प्रशांत बाबू ने अपनी घड़ी देखते हुए कहा, "कल सुबह जब सूरज निकलेगा, तो गेट पर केवल मज़दूर आत्म-सम्मान के साथ खड़े होंगे. हमें हड़ताल को अहिंसक बनाए रखना है, इसका ध्यान यूनियन के पदाधिकारियों को रखना है. अफवाहों का खंडन करने के लिए समय-समय पर ‘पर्दाफाश’ संदेश और हर आधा घंटे में 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' व्हाट्सएप पर आते रहेंगे. प्रबंधन मजदूरों को उकसाने के लिए गुंडों या बाउंसरों का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन हमें पूरा ध्यान रखना होगा कि हम उत्तेजित न हों. यदि मजदूरों को हिंसा के लिए उकसाने की कोई कार्यवाही हो तो हम उससे तुरन्त निपटेंगे और अपनी ओर से हिंसा न करेंगे. हमारे मजदूरों को हर हाल में हिंसा से बचना है. हमारी शांति ही हमारा सबसे बड़ा हथियार होगी."

प्रिया और उसके साथियों ने महसूस किया कि वे पहली बार किसी 'सिस्टम' को क्रैश होने से बचाने का काम नहीं कर रहे थे, बल्कि एक नए, न्यायपूर्ण सिस्टम को जन्म लेने में मदद कर रहे थे. दफ्तरों और घरों में घंटों कोडिंग के जालों से उलझने के दौरान जिस तरह की बोरियत और ऊब उन्हें सामना करना पड़ता था,वैसी यहाँ नहीं थी. उसके विपरीत उन्हें अपने कोडिंग के ज्ञान की ताकत और उसके उपयोग का एक नया मानवीय चेहरा नज़र आ रहा था.





निभाता क्यों नहीं ‘उलूक’ तू भी किसी
एक इसी तरह के एक आदमी का किरदार
कल जब उसकी आ जायेगी सरकार
तुझे क्या लेना और देना वो वहाँ क्या करता है
तुझे मालूम है तेरा यहाँ रहेगा अपना ही कारोबार 

****
सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 5 अप्रैल 2026

4703...रोते चातक के ऑंसुओं की नमी से जब फूटेंगे कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे हरे-भरे पेड़...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया श्वेता सिन्हा जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

युद्ध और चिड़िया 

बंजर हुई धरती की दुर्दशा पर
रोते चातक के ऑंसुओं की नमी से
जब फूटेंगे 
कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे
 
हरे-भरे पेड़
उनकी डालियों में वो
फुदक-फुदक कर गा सकेगी
फिर से प्रेम और करुणा से भरी

जीवन की पवित्र प्रार्थनाऍं...।

***** 

मैग्मा की रसीद

“चारित्रिक पतन सिर्फ़ स्त्रियों के लिए ही क्यों कहा जाता है? अगर कोई स्त्री वैश्या बनती है, तो क्या पुरुष सहभागी नहीं होता? जो स्त्री को मैला कहकर खुद को साफ़ घोषित कर देते हैं, वे आखिर किस आईने में खुद को देखते हैं?” अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही वह बोल भी पड़ी— भीड़ में हलचल हुई। मंच पर बैठे चेहरे असहज हो उठे।

“गाँव में भीड़ द्वारा स्त्रियाँ प्रताड़ित की जाती हैं, तो उसके चरित्र को मोहरा बनाया जाता है, कार्यालय में किसी स्त्री को पदोन्नति मिल जाए, तो उसकी मेहनत नहीं, उसके चरित्र पर सवाल उठते हैं। और हद तो यह है कि साहित्य—जो समाज को दिशा देने वाला कहलाता है—वहाँ भी इस सोच से अछूते मनुष्य नहीं हैं।” मेधा ने आगे कहा— अब उसकी आवाज़ और गम्भीर हो गई थी—

*****

लोक उक्ति में कविता

लोक उक्ति में कविता’* के मूर्त रूप लेने पर हृदय अगाध कृतज्ञता से भरा है। इस यात्रा में मिले सहयोग को शब्दों में पिरोना कठिन है, किंतु भावों की अभिव्यक्ति अनिवार्य है।​*प्रकाशक एवं मार्गदर्शक*​सर्वप्रथम, मैं *कल्पना पब्लिकेशन, जयपुर* की हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने मेरी अनुभूतियों को मुद्रित अक्षरों का स्वरूप प्रदान किया। विशेष रूप से, श्रद्धेय *डॉ. शास्त्री ‘मयंक’ जी* के प्रति मैं नत-मस्तक हूँ, जिन्होंने अपनी ओजस्वी भूमिका और आशीर्वचनों से इस कृति की गरिमा बढ़ाई है।

*****

पुर्जा नहीं, इंसान

चारों उसी व्यक्ति के साथ कमरे के अंदर के दरवाजे से अंदर गए, वहाँ एक छोटे आंगन से सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं. फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरे में प्रशांत बाबू बैठे मिले, इस कमरे के पास ही एक हॉल था जिसमें कम से कम दो सौ लोग बैठ सकते थे. वहाँ कोई बैठक चल रही थी.

*****

संगठन में शक्ति

किसान ने एक योजना बनाई।

उनसे आठ  लकड़ियाँ मंगाई।

चार को  साथ रस्सी से बंधा।

चार को अलग - अलग रखा।

प्रत्येक पुत्र को पास बुलाया।

बँधी लकड़ियों को तोड़बाया।

पर लकड़ियां उनसे नहीं टूटी।

मिलकर  पाई  थी  मजबूती।

*****

जीवन के पास क्या मरहम है?

सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।

*****

फिर मिलेंगे।

 रवीन्द्र सिंह यादव 

 

 

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

4702 सबमें अपनेपन की माया अपने पन में जीवन आया

 सादर अभिवादन


ये है छत्तीसगढ़ की पावन धरा के महादानी
दीवान बहादुर रायसाहब दाऊ  कल्याण सिंह जी रायपुर 
शहर का प्रतिष्ठित डी. के. हॉस्पिटल इन्ही के नाम पर है
आज आपकी जयन्ती है


सबमें अपनेपन की माया
अपने पन में जीवन आया 
-त्रिलोचन


रचनाएं देखें



हैं रेल-पेल भी फिर ना जाने 
कितनी कथाओं की, 
आरतियों की, व्रतों की,
मन्दिरों की, मूर्तियों की, 
पर सर्वोपरि बन,
सर्वत्र है छाया आज 
"जै जै जै हनुमान गोसाईं"
पर रहे ना हम सब अब भाई-भाई,
क्योंकि ..
हो गया है मानव-मानव में ..




इंस्पेक्टर ने प्रिया को कहा, “आपको कुछ देर के लिए पुलिस स्टेशन आना पड़ेगा. 
हमने आपकी सूचना दर्ज कर ली थी. आपको आकर दस्तखत करने होंगे. 
फिर हम उसे एफआईआर के रूप में दर्ज कर आपको उसकी एक प्रति दे देंगे.

प्रिया अपने ही ऑटो से पुलिस स्टेशन पहुँची, कुछ देर बाद ही राहुल और आदित्य भी पहुँच गए. 
इंस्पेक्टर ने सूचना पर प्रिया के हस्ताक्षर लिए फिर एफआईआर दर्ज कर उसपर और एक प्रति प्रिया को दी. 
फाइल देखकर उसने कहा, “जयपुर का पुराना रिकॉर्ड, मुम्बई में फेक प्रोफाइल का मामला और 
अब स्टॉकिंग का नया मामला... इस बार विक्रांत साहब का बिना सजा काटे जेल से बाहर आना मुश्किल होगा. 
प्रिया, राहुल ओर आदित्य बाहर आए. राहुल ने प्रिया से पूछा, “अब?”

“अब क्या? अब मेवाड़ भोजनालय चलना है, सब वहाँ प्रतीक्षा कर रहे होंगे. आज डिनर वहीं होगा.”




“मैं भी बहुत अजीब हूँ, इतना अजीब हूँ कि बस
खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।”

“इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ,
वरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैंने।”

“बहुत नज़दीक आती जा रही हो,
बिछड़ने का इरादा कर लिया है क्या?”



बाहर बिजलियों की कड़कड़ाहट और बादलों के गरजने के
साथ ही तेज मूसलाधार बारिश का सिलसिला जारी था।
भीतर प्यार की खुमारी और जुनून अपने परवान पर था।
ईशान, सौम्या के साथ अपने बेडरूम में था और सौम्या की गर्म सांसों को करीब से..
बहुत करीब से महसूस कर रहा था।

उनके चेहरे एक दूसरे के इतने करीब थे कि हवा भी उनके बीच से गुजर कर नहीं जा पा रही थी।






विश्व भर में हलचल मची,
डगमग हर एक राह,
मंदी की आहट संग जगी,
स्थिरता की चाह।


सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

4701... पृथ्वी को वीरान होने से बचा लो!

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
--------------
सोच रही हूॅं ----
इंसान 
सभ्य और असभ्य की 
परिभाषा भूल चुका है।
अंहकार का पोषण
सर्वोपरि है,
क्या मनुष्यता, इंसानियत 
धीरे-धीरे इतिहास के
पृष्ठों में सुंदर कहानियॉं 
बनकर जायेंगी?
क्या सचमुच 
"जीओ और जीने दो"
 का सिद्धांत 
मानना बहुत कठिन है?
---------
आज की रचनाऍं- 



सामूहिक मृत्यु को सहज बनाते 
विवेकहीन नेताओं के आदेश
भरा है जिनमें तकनीकी आवेश  
अपने लिये सुखद मृत्यु की कल्पना में डूबे हैं 
धिक्कार है ऐसे संवेदनाविहीन दिमाग़ों पर!
जागो शांति के मसीहाओ!
वक़्त रहते पृथ्वी को वीरान होने से बचा लो!




चश्मदीदों ने
दबी ज़ुबान में बताया—
जब आसमान में
कुछ गिद्ध मंडरा रहे थे,
तब तक
वह ज़िंदा थी।


युद्ध जारी है


युद्ध जारी है
हर तरफ़ दहशत, ख़ून-ख़राबे
चिथड़े-चिथड़े जिस्म की पहचान नहीं
किसी का अपना शहीद हुआ
न जाने कितनी जानें क़ुर्बान हुईं
इस ख़ौफ़नाक मंज़र पर
कोई जश्न मना रहा
तो कोई छाती पीट रहा।


मेरी यादों का आकाश


बिक रहा है ज़मीर यहाँ

बस बची है अंगारों के नीचे

दबी हुई कुछ राख़ मेरे

ज़िन्दा जज़्बों की

जो धाँय धाँय उड़कर

काला स्याह कर रही है

मेरे यादों के आकाश को





उसकी बाते सुनते सुनते और गाड़ी के तेज़ झटकों से कब ऋतु की आँख लग गई उसे पता ही नही चला ,आँख खुली तो मथुरा स्टेशन के प्लेटफार्म पर गाड़ी रूकी हुई थी ,घड़ी में समय देखा तो ठीक चार बज रहे थे ,उसने प्लेटफार्म पर नज़र दौड़ाई तो देखा वह औरत बेंच की एक सीट पर गोद में बच्चा लिए बैठी हुई थी और उसकी बगल में दो बड़े बड़े अटैची रखे हुए थे ,लेकिन उसकी बेचैन निगाहें अपने पति को खोज रही थी ,पांच मिनट तक ऋतु उसकी भटकती निगाहों को ही देखती रही ,तभी गाड़ी चल पड़ी और वह औरत धीरे धीरे उसकी नज़रों से ओझल हो गई l 
----------
आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
------------

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

4700 ..रात को जब खिड़की से आये देख उसे दिल घबरा जाए

 सादर अभिवादन

प्राचीन कथा


दरअसल रावण की बेटी और हनुमान जी की ये कथा थाईलैंड के रामकियेन नामक रामायण में मिलती है जिसके अनुसार रावण की एक बेटी थी। जिसका नाम सुवर्णमछा था। वो देखने में बहुत ही सुंदर थी। उसे सोने की जलपरी कहा गया है। राम सेतु निर्माण के समय हनुमान जी और वानर सेना समुद्र में पत्थर फेंक कर जमाते थे, लेकिन कुछ समय बाद वे गायब हो जाते थे। जब हनुमान जी को इस घटना का पता चला तो वे समुद्र में उतर कर देखने लगे कि आखिरी चट्टान कहां गायब हो रही है। उन्होंने देखा कि पानी के अंदर रहने वाले लोग उन्हें कहीं ले जा रहे हैं। तब उन लोगों के पीछे हनुमान जी गए और देखते हैं कि एक मत्स्यकन्या उन सबकी नेता है तो उसे चुनौती देते हैं, परंतु वो कन्या हनुमान जी को देखकर ही उनके प्रेम में पड़ जाती है। हनुमान जी ये समझ जाते हैं और तब वापस समुद्र के तल पर ले आते हैं और उससे पूछते हैं। तुम कौन हो वह बताती है कि मैं रावण की बेटी हूं, फिर हनुमान जी कन्या को समझाते हैं कि रावण ने कितने बुरे कार्य किए हैं और क्यों हम यह पुल बना रहे हैं तब वह कन्या समझ जाती है और सभी चट्टान लौटा देती है।

रचनाएं देखें




थोड़ा रुक जाओ, अपने दिल की बात सुनो।
जल्दी मत करो, अभी समय है समझने का।

जैसे कच्चे आम को धीरे-धीरे चखते हैं,
वैसे ही जीवन को आराम से महसूस करो।




रात को जब खिड़की से आये
देख उसे दिल घबरा जाए
मन चाहे कर दूँ मैं शोर
को सखी साजन ? ना सखी चोर !
**
जैसे ही वो घर में आये
मेरी साँस गले घुट जाए
रौब दाब है उसका जबरा
को सखी साजन ? ना सखी ससुरा !





शाम के आठ बजे प्रिया ऑफिस से सीधे 'मेवाड़ भोजनालय' पहुँची. रामजी काउंटर पर थे,
प्रशांत बाबू अभी नहीं आए थे.

"काका, आज चमत्कार हो गया. टीम ने वह कर दिखाया जो नामुमकिन लग रहा था,
" प्रिया ने उत्साह से कहा.

रामजी ने मुस्कुराकर उसे पानी दिया. "प्रशांत बाबू कहते हैं कि जब इंसान खुद को
छोटा समझना बंद कर देता है, तो पहाड़ भी हिला सकता है.
आज उनकी एसोसिएशन की मीटिंग है,
वे देर से आएंगे."

प्रिया ने बाहर सड़क की ओर देखा. भीड़ भाग रही थी. अब उसे कोई डर नहीं था.
उसने महसूस किया कि उसका अक्स अब आईने से बाहर आकर खुशबू हो रहा था.



अबके फागुन 
टेसू नहीं खिले
बेरंग, उदास जंगलों 
में पत्तों के बिछावन
संगीनों की नोंक से रक्तरंजित 
मासूमों के दर्द सहला रहे हैं...।





यह सभ्यता जन्मी नहीं -
अपलोड हुई है।
जिसमें मनुष्य नहीं रहते,
प्रोफ़ाइल्स बसती हैं।
आँखें अब देखने के लिए नहीं?
सिर्फ़
दिखाने के लिए खुलती हैं।
जितना दिल नहीं धड़कता
उससे ज्यादा तो
नोटिफिकेशन बजते हैं।





आना सुख था, जाना भी है 
किया पसार, समेट रही अब, 
जग इक अनुभव, कब यह दुख है?
बिखरे सूत्र लपेट रही अब ! 

निर्मल दृष्टि से सृष्टि सुंदर
देव सहायक, हैं सुखदायक 

सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

4699..कोई सवाल नहीं करता

 ।।प्रातःवंदन।।

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर

रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है

खेत अपने जलें या औरों के

ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है।

इसलिए ऐ शरीफ इंसानो

जंग टलती रहे तो बेहतर है

आप और हम सभी के आँगन में

शमा जलती रहे तो बेहतर है।

साहिर लुधियानवी

बडी पशोपेश में आजकल दुनिया ..पर बुधवारिय प्रस्तुति कुछ इस तरह जहा चंद पल बिताइए ✍️

 

वो खामोश है बेपरवाह नहीं....

सबको लगता है कि वो अब ख्याल नहीं करता है,
पैसे तो भेजता है मगर देखभाल नहीं करता है।
कोई जा के बता दो परदेश में बैठे बेटे का हाल,
वो क्यूँ किसी से कोई सवाल नहीं करता है।
✨️


बाबा,
अब तुम सुकून से सो जाया करो।
रात को आँगन में चाँद जब उतर आए,
तो उसकी चुप्पी को ओढ़ लिया करो।..
✨️
 शीर्षक: “राख से उठती हुई साँस” 

नवंबर की ठिठुरन से लेकर

आज की धूप तक,

कितनी ही आंधियाँ आईं—

कुछ बाहर चलीं,

कुछ भीतर घर बना गईं।
✨️

समाप्ति की क़गार पर खड़े

बोझिल संबंधों के कदम,

छटपटाते बेचैन हो,

दहलीज पार करने को,..
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद 
पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...