जो चन्द्र प्रकाशित किरीट धरे हैं भाल नेत्र कंदर्प दग्ध करे हैं जिनके कर्ण सर्प कुंडल दमक रहे हैं जो सदा रूप ह्रास वृद्धिरहित है उस भोलेनाथ का पाठ जाप करो
मगह (मगध) में हमलोग नागपंचमी को नगपांचे बुलाते है। पूरे देश में सावन में पिछला पक्ष में नाग पंचमी होता है। हमारे यहां पहला पक्ष में। जो आज है। इस दिन आम..
परमात्मा ही जगत के रूप में नये-नये रूप धर रहा है उसकी मानें तो हम उसी के रूप हैं उसी के गुण हमें धारने हैं स्वयं को संवरते हुए, देखना है प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों में उसकी ही छवि को धरा पर पुष्प और गगन पर रवि को तब वही हमारे द्वारा कर्म करता है
प्राचीन काल में जब मापने का कोई सही पैमाना नहीं था तब सोना, जेवरात का
वजन मापने के लिए इसी रत्ती के दाने का इस्तेमाल किया जाता था।
सबसे हैरानी की बात तो यह है कि इस फली की आयु कितनी भी क्यों न हो, लेकिन इसके अंदर स्थापित बीजों का वजन एक समान ही 121.5 मिलीग्राम (एक ग्राम का लगभग 8वां भाग) होता है। तात्पर्य यह कि वजन में जरा सा एवं एक समान होने के विशिष्ट गुण की वजह से, कुछ मापने के लिए जैसे रत्ती प्रयोग में लाते हैं। उसी तरह किसी के जरा सा गुण, स्वभाव, कर्म मापने का एक स्थापित पैमाना बन गया यह "रत्ती" शब्द।
महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं।
एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली के अनुसार सप्तर्षि - कश्यप, वशिष्ठ, मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु हैं।
इस प्रकार भारतवर्ष में ऋषि मुनि अध्यात्म के प्रणेता माने जाते हैं।ऋषि वशिष्ठ हर मन्वंतर में निर्विवाद रूप से सप्तऋषियों में एक माने गए हैं। जनमानस के मानसिक विकास एवं शांति में अध्यात्म का बहुत महत्व है।
देखा था जब तुम्हें पहली बार तो न जाने क्यों दिल दिमाग को झकझोर रही थी महुआ की मदिर गंध बारम्बार ! उठती गिरती बरौनियों की चिलमन में छिपी तुम्हारी नशीली सी आँखें, जैसे दे रहीं थीं आमंत्रण मुझे कि ‘चलो उड़ चलें दूर गगन में खोल कर अपनी पाँखें’ !
टप-टपाती मादक बूँदों की रुनझुनी खनक, मेंहदी की खुशबू से भींगा दिन, पीपल की बाहों में झूमते हिंडोले, पेड़ों के पत्तों, छत के किनारी से टूटती मोतियों की पारदर्शी लड़ियाँ आसमान के माथे पर बिखरी शिव की घनघोर जटाओं से निसृत गंगा-सी पवित्र दूधिया धाराएँ उतरती हैं नभ से धरा पर, हरकर सारा विष ताप का अमृत बरसाकर प्रकृति के पोर-पोर में भरती है प्राणदायिनी रस सावन में...। #श्वेता
छतरियों छातों का उपयोग इंसानों द्वारा कबसे किया जा रहा है ये बात इतनी पुरानी है कि ठीक ठीक कोई साक्ष्य ही नहीं है , और ये दुनिया भर की सभ्यताओं में पत्ते और बांस की पत्तियों के बने छातों से लेकर हीरे जवाहरात जड़े छत्रों तक अलग अलग साज स्वरूप में उपस्थित रहे ।