निवेदन।


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गुरुवार, 17 जुलाई 2025

4452...बरसात कर देती है मुरझा रहे प्रेम को तरबतर...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय  ज्योति खरे जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए आज की पसंदीदा रचनाएँ-

नहीं रख पाते

बरसात

कर देती है

मुरझा रहे प्रेम को

तरबतर

 लेकिन हम

सहेजकर रख लेते हैं छतरी

नहीं रख पाते

सहेजकर

बरसात---

*****

ढाई आखर सभी पढ़ रहे

हुए एक से दो थे जो तब

एक पुन: वे  होना चाहते,

दूरी नहीं सुहाती पल भर

प्रिय से कौन न मिलन माँगते!

*****

अदृश्य दहन - -

कांच के शोकेस में सज्जित पुस्तकों में नहीं

मिलेगी आत्म सुख की परिभाषा,

कुछ एहसास निर्जीव से पड़े
रहते हैं अंधकार पृष्ठों के
अंदर शापित
जीवाश्म
की तरह,

*****

दिल में इक अलख

लम्बी दूरी है तय करनी

सफ़र में कुछ छाँव जोड़ के रखती हूँ

 छूते ही बिखर न जाऊँ कहीं

ख़ुद को ही झिंझोड़ के रखती हूँ

*****

उस भोलेनाथ का पाठ जाप करो जो काशीपति विश्वनाथ कहलाते हैं

जो चन्द्र प्रकाशित किरीट धरे हैं
भाल नेत्र कंदर्प दग्ध करे हैं
जिनके कर्ण सर्प कुंडल दमक रहे हैं
जो सदा रूप ह्रास वृद्धिरहित है
उस भोलेनाथ का पाठ जाप करो

जो काशीपति विश्वनाथ कहलाते हैं

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


बुधवार, 16 जुलाई 2025

4451..सभी घरों की यही कहानी ..

 ।।प्रातःवंदन।।

वह बैठी भरी जवानी में वर्षा-श्री तरु की डाली में,

कैसी सुन्दर लगती लाली खपरैलों की, हरियाली में!

वह दूर दीखता खेत धान का, काँप रहे छवि के अंकुर,

बक शुक्लपंख ज्यों श्वेत शंख, शोभित मरकत की थाली में!

 पं. नरेंद्र शर्मा 

चलिए आज शुरुआत करते हैं ..

मधुमालती ...

 


पड़ोस में थोड़ी दूर पर एक छप्पर वाला घर था और सामने की तरफ़ मधुमालती की लतर फैली थी।शाम को उसकी भीनी खुशबू फैलती तो बड़ा ख़ुशनुमा एहसास होता। 

✨️

मगह (मगध) में हमलोग नागपंचमी को नगपांचे बुलाते है

मगह (मगध) में हमलोग नागपंचमी को नगपांचे बुलाते है। पूरे देश में सावन में पिछला पक्ष में नाग पंचमी होता है। हमारे यहां पहला पक्ष में। जो आज है। इस दिन आम..

✨️

किसलिए

 हो आधा-आधा किसलिए

जरूरत से ज्यादा किसलिए

आपकी जागीर कब तलक

यह शान लबादा किसलिए

✨️

खुशी या गम के मिलेंगे आँसू

नजर झुकाना या फिर उठाना, नजर मिलाना लगा हुआ है

मिली मुहब्बत में जो निशानी, वहीं निशाना लगा हुआ है

भले हो मेरा या घर तुम्हारा, सभी घरों की यही कहानी 

कसक मुहब्बत की जो है बाकी, उसे सुनाना लगा हुआ है 

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️




मंगलवार, 15 जुलाई 2025

4450...चिराग़ तले अंधेरा

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
-------
रद्दी में बिकते पुस्तकों के ढेर
पायदान होते बुद्धिजीवी
विचारों के अवमूल्यन के
इस दौर में 
सोचती हूँ
पात्र हूँ या दर्शक 
मैं किस भूमिका में हूँ।

आज की रचनाएँ-


तन बदन दिन
घास मिट्टी
होंठ पर मुरली,
दो अपरिचित
कर रहे हैं
धूप की चुगली,
याद आए
अल्पनाओं से सजे कोहबर.



वहां का आसमान
अब भी है साफ
वहां के जंगल
अब भी हैं घने


कई बार बहुत कुछ 

समझने के बाद भी 

बहुत कुछ 

छूट जाता है समझ के लिए


चिराग़ तले अँधेरा है 

यह बात भला..,

चिराग़ को भी कहाँ पता होती है 





न दिशाओं का 

न गुणों का 

भावातीत, कालातीत व देशातीत  

वह बस अपने आप में स्थित है 

वह एक ही आधार है 

पर वह सदा अबदल है 




कोटि सूर्य सम प्रकाशमान
अजन्मे परमेश्वर प्रचंड अखंड
तुम हो प्रलय करने वाले
सबको आनंद भी देने वाले

सदा त्रिशूल रखते हो हाथ
हम भजते तुमको भोलेनाथ
रखना माथे सदा अपना हाथ



--------------
आज के लिए इतना ही 
मिलते हैं अगले अंक में।

सोमवार, 14 जुलाई 2025

4449 ... लिखीं हर कवि ने प्रेम पगी कविताएं अपने प्रारंभिक दौर में

 सादर अभिवादन

श्रावण मास का प्रथम सोमवार



लिखीं हर कवि ने
प्रेम पगी कविताएं
अपने प्रारंभिक दौर में
और बनाये सेतु
उतरने के लिए
महाकाव्य के पार !

शब्दों में बंधे भाव
और भावों में गुंथे
प्रेम में
कचियाए अनुभव
उतर आए
पतवार बनकर !


रविवार, 13 जुलाई 2025

4448 ....रत्ती भर मतलब जरा सा


सादर अभिवादन

रत्ती भर के

वात्सल्य
ट्रेन का खचाखच भरा डिब्बा बेतहाशा गर्मी,सामने वाली बर्थ पर एक माँ अपने बच्चे को 
चुप कराने में लगी। बच्चा रोता रहा, माँ की डांट भी उसे चुप नहीं करा सकी, इस 
तरफ की बर्थ पर एक माँ अपने लाडले को दूध की बोतल मुंह में दिए थी, 
रोता बच्चा चुप होकर सो गया।
माँ ने सामने वाले माँ और जिद करते बच्चे को देखा, भूख से वह भी रो रहा था, 
कोई डांट-फटकार उसे चुप नहीं करा पा रही थी, भूखा है बच्चा तुम्हारा। कब से देख रही हूं, ... 
बुरा न मानो तो ये बचा दूध उसे पिला दो, दूसरी मां ने बिना ना-नुकुर किए बच्चे के 
मुख में बोतल दे दी। बच्चे की क्या जात?
कम्पार्टमेन्ट में कुछ आवाजें. किसी ने कहा-और मां की भी कोई जाति होती है ? 
पूरा डिब्बा वात्सल्य रस से सराबोर था। दोनों माताएं अपने लाडले को 
देख आश्वस्त हुई जा रही थी।
-पुस्तक माँ से साभार  

और भी है... वो भी आएगा पर शैनेः शैनेः

‘को’ नहीं ‘की’


परमात्मा ही जगत के रूप में
नये-नये रूप धर रहा है
उसकी मानें तो हम उसी के रूप हैं
उसी के गुण हमें धारने हैं
स्वयं को संवरते हुए, देखना है
प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों में
उसकी ही छवि को
धरा पर पुष्प और
गगन पर रवि को
तब वही हमारे द्वारा कर्म करता है



रत्ती: आश्चर्य में डालता है


प्राचीन काल में जब मापने का कोई सही पैमाना नहीं था तब सोना, जेवरात का 
वजन मापने के लिए इसी रत्ती के दाने का इस्तेमाल किया जाता था।

 सबसे हैरानी की बात तो यह है कि इस फली की आयु कितनी भी क्यों न हो, लेकिन इसके अंदर स्थापित बीजों का वजन एक समान ही 121.5 मिलीग्राम (एक ग्राम का लगभग 8वां भाग) होता है।
तात्पर्य यह कि वजन में जरा सा एवं एक समान होने के विशिष्ट गुण की वजह से, कुछ मापने के लिए जैसे रत्ती प्रयोग में लाते हैं। उसी तरह किसी के जरा सा गुण, स्वभाव, कर्म मापने का एक स्थापित पैमाना बन गया यह "रत्ती" शब्द।

रत्ती भर मतलब जरा सा ।



ऋषि मुनि और उनका आध्यात्म


महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं।

 एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली के अनुसार सप्तर्षि - कश्यप, वशिष्ठ, मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु हैं।

इस प्रकार भारतवर्ष में ऋषि मुनि अध्यात्म के प्रणेता माने जाते हैं।ऋषि वशिष्ठ हर मन्वंतर में निर्विवाद रूप से सप्तऋषियों में एक माने गए हैं। जनमानस के मानसिक विकास एवं शांति में अध्यात्म का बहुत महत्व है।



देखा था जब तुम्हें पहली बार
तो न जाने क्यों दिल दिमाग को
झकझोर रही थी महुआ की
मदिर गंध बारम्बार !
उठती गिरती बरौनियों की
चिलमन में छिपी तुम्हारी
नशीली सी आँखें,
जैसे दे रहीं थीं आमंत्रण मुझे
कि ‘चलो उड़ चलें दूर गगन में
खोल कर अपनी पाँखें’ !


निराकार विकराल महाकाल बनो हमारे ढाल


तुम मोह को हरने वाले
मन को मथ डालने वाले
सबके दुःख दर्द हरने वाले
पार्वती जी के दिल में रहने वाले

वो मेरे कैलाशपति भोलेनाथ
हम भजते तुमको भोलेनाथ
रखना माथे सदा अपना हाथ




आज बस
सादर वंदन

शनिवार, 12 जुलाई 2025

4447 ...तन्हा तन्हा फिरते हैं ऐ दोस्त हम..

 सादर अभिवादन

शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

4446...सफ़र जीवन का दूभर अब

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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टप-टपाती मादक बूँदों की
रुनझुनी खनक,
मेंहदी की 
खुशबू से भींगा दिन,
पीपल की बाहों में
झूमते हिंडोले,
पेड़ों के पत्तों,
छत के किनारी से
टूटती
मोतियों की पारदर्शी लड़ियाँ
आसमान के
माथे पर बिखरी
शिव की घनघोर जटाओं से
निसृत
गंगा-सी पवित्र
दूधिया धाराएँ
उतरती हैं
नभ से धरा पर,
हरकर सारा विष ताप का
 अमृत बरसाकर
प्रकृति के पोर-पोर में
भरती है
प्राणदायिनी रस
सावन में...।
#श्वेता


आज की रचनाएँ-


स्मृति लोक हुए  धुंधले,
ना भटकती बीते लम्हों में !
जो आज है वो सबसे बेहतर
ये सोच के खुश हो जाती माँ !  

 
साथ ना देती जर्ज़र काया 
हुआ सफर जीवन का दूभर अब
पर चलती जाती अपनी धुन में
तनिक भी ना घबराती माँ!




नींद, डर, ख्व़ाब, आते-जाते हैं,
मौत आ कर कभी नहीं जाती.

आँख से हाँ लबों से ना, ना, ना,
ये अदा हुस्न की नहीं जाती.

राज़ की बात ऐसी होती है,
हर किसी से जो की नहीं जाती.


ख़्वाबों का फेरीवाला बेच
जाता है रंगीन बुलबुले,
शून्य हथेलियों में
रह जाता है
मृत आदिम
सितारा ।




तुम्हारी विरह व्यथा को 
मैं हर पल भोग रहा हूँ, 
ओझल होती प्रतीक्षा में 
अश्रु धारा बहा रहा हूँ। 

भूले - भटके ख़ुशी कोई 
जब जीवन राग छेड़ती है,
तभी तुम्हारी यादें आकर 
आँखों से ढुलक जाती है। 




छतरियों छातों का उपयोग इंसानों द्वारा कबसे किया जा रहा है ये बात इतनी पुरानी है कि ठीक ठीक कोई साक्ष्य ही नहीं है , और ये दुनिया भर की सभ्यताओं में पत्ते और बांस की पत्तियों के बने छातों से लेकर हीरे जवाहरात जड़े छत्रों तक अलग अलग साज स्वरूप में उपस्थित रहे । 



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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