निवेदन।


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सोमवार, 7 जुलाई 2025

4442 ...इटली का गार्डन ऑफ लाजियो, राक्षसों के पार्क

 सादर अभिवादन


कृपया तलाशें
इटली का प्रसिद्ध शहर
लाजियो ..
गार्डन ऑफ लाजियो


इटली का गार्डन ऑफ लाजियो, राक्षसों के पार्क भी कहा जाता है. 
यह बागीचा गार्डन जानबूझ कर सुंदर नहीं बनाया है 
इसकी अनोखी कलाकृतियां डरावना या शोक का भाव पैदा करती हैं. 
इसके इस तरह बनने के पीछे अपना इतिहास है. 
लेकिन यह अपनी तरह का दुनिया में इकलौता बागीचा है.
कल दिनाक 6 जुलाई के नवभारत के पेज नम्बर छः पर देखें

कुछ सोचो

और भी है... ब्लॉग पर जाकर पढ़िेएगा



पनीली भोर में
लौह दरवाज़े के
एक खांचे में बैठी
कलछौंही
नन्हीं चिड़िया का स्वर
जब लगे
राग आसावरी-सा






किया समर्पण त्याग,जले बाती जैसे,
करे भाव अँकवार,तुम्हारी आँखों में।।

जीवन की जब धूप,जलाती थी काया
पीड़ा का उपचार,तुम्हारी आँखों में।।




बिजली की दे दो चपलता
और मेघ की गर्जना
सितारों की दे दो चमक
और चांद की शीतलता ,
बूंदों को उपहार की
देकर यह श्रृंखला
करने फिर से धरा तृप्त
कर दो विदा ए आसमां



छन में यह गिर जाएगा .. . . . . . . . . 


डग भरते मग कहिअ एक मिलआ सुबुध सुजान ।
सुनहु राजन मरनि निकट नहि कछु तुमहि भयान ll

जीवन दिवस साति है मम मरनि अजहुँ दूर l
छन भँगुराहि तव जिउना सोच करौ आतूर ॥




उनके साथ प्रैम में छोटे बच्चे को लेकर आई  बारह तेरह साल की एक लड़की भी थी। वेशभूषा से वो बच्चे की सेविका लग रही थी। बच्चा प्रैम में सो रहा था और वो लड़की दूसरी छोटी मेज पर बैठी उन सबको खाते टुकुर-टुकुर देख रही थी। उसके सूखे होंठ, मुरझाया चेहरा और कातर बड़ी-बड़ी आँखें देख कर मन बहुत बेचैन हो उठा। मेरा मन कर रहा था उसे अपनी टेबल पर लाकर पेट भरके खिला- पिला दूँ, परन्तु यह संभव नहीं था।उन सबकी प्लेटें मंहगे, लजीज बुफे के पकवानों से भरी थीं, जिसे वे भर-भर कर लाते और आधा खाते, आधा छोड़ते और फिर दूसरी और  तीसरी प्लेट भर लाते।


आज बस
सादर वंदन

रविवार, 6 जुलाई 2025

4441...यह पृथ्वी तब भी थी जब नहीं थे वृक्ष

 सादर अभिवादन


सुना है सावन आने वाला है
झूले भी लगाने की चेष्टा हो रही है

कैलेंडर के अनुसार आज देव शयनी एकादशी है ..और



ताजियों का महीना मोहर्रम भी है
मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है जिसे शोक और गम के रूप में मनाया जाता है



धर्मनिष्ठ लोगों का चातुर्मास भी आज ही से लागू हो रहा है

और भी है... ब्लॉग पर जाकर पढ़िए

चातुर्मास के नियम

माना जाता है कि चातुर्मास के दौरान थाली की बजाए पलाश के पत्ते पर भोजन करना चाहिए। ऐसा करना बेहद शुभ और फलदायी माना जाता है। अगर आप चार महीनों तक इस नियम का पालन करते हैं तो कई बड़े पापों का नाश हो सकता है और जीवन में सकारात्मकता आने लगती है। माना जाता है कि चातुर्मास में पलाश के बने पत्तल में भोजन करने से स्वर्ण के बर्तन में भोजन करने बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। साथ ही, इस नियम का पालन करने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती है और व्यक्ति को उनकी विशेष कृपा भी प्राप्त हो सकती है। इसके अलावा, इन चार महीनों में मांस, शहद, और दूसरे द्वारा दिए गए अन्न का सेवन भी नहीं करना चाहिए

मान्यता है कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से भगवान विष्णु अगले चार महीनों के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। ऐसे में इस अवधि के दौरान बिस्तर को त्यागकर भूमि पर शयन करना अति उत्तम माना जाता है। माना जाता है कि इस विशेष नियम का पालन करने से रोगों से मुक्ति मिल सकती है और जीवन में धन लाभ के योग बनने लगते हैं। साथ ही, जातक के घर में कभी भी अनाज की कमी नहीं होती है और संतान सुख की भी प्राप्ति हो सकती है।




साथ जो
समय के साथ
गहरे होते जाएँ
वही प्रेम है








प्रेम
का अंकुरण
मन की धरती पर होता है।
शरीर
केवल मन की अभिव्यक्ति का एक
मूक पटल है।
शरीर और मन के बीच
कहीं
कोई
भाव जन्मता है और गुलाब की भांति






इंटरनेट कंप्यूटर आए,करने जीवन को आसान।
साइबर अपराधी पनपेंगे,इसका था तब किसको भान।।

करें फिशिंग हैकिंग से शोषण,भेज रहें हैं फर्जी मेल।
झूठे सरकारी कर्मी बन,खेलें कपट घिनौने खेल।।

चुरा जानकारी लोगों की,करते जब ये नित्य गुनाह।
धोखा खाती भोली जनता,उनको करना अब आगाह।।





यह पृथ्वी तब भी थी जब नहीं थे वृक्ष
जब नहीं लगी थी जंगलों में आग  
तब मैं भी नहीं था ।

और जब हिरण  वनों में जल रहे
अपने घर में मैं देख रहा हूँ  सपने।  





बूंदों को भी क्या हासिल
एक पल का जीवन
हजार ख्वाहिशों पर
हर बार कुर्बान।
काश कोई बूंद
जी पाती
एक सदी
ठहर पाती एक पूरी उम्र


आज बस
सादर वंदन

शनिवार, 5 जुलाई 2025

4440..एक अनसुनी चीख..

।।प्रातःवंदन।।

" सखी !

बादल थे नभ में छाये

बदला था रंग समय का

थी प्रकृति भरी करूणा में

कर उपचय मेघ निश्चय का।।

वे विविध रूप धारण कर

नभ–तल में घूम रहे थे

गिरि के ऊँचे शिखरों को

गौरव से चूम रहे थे..!!"

 हरिऔध 

प्रकृति की बदलती तस्वीरे और भीगे भीगे दिन की शनिवारिय  शुभकामना के साथ शामिल रचनाओ का आनन्द ले..

राइटर्स रेजीडेंसी , पटना में यौन अपराध के आरोप के बहाने और मायने

दयानंद पांडेय 


✨️

"भड़ास : एक अनसुनी चीख़"

 कोई नहीं पढ़ता मेरी लिखी कहानियां

बातें भी मेरी लगती उनको बचकानियां

लहू निचोड़ के स्याही पन्नों पे उतार दी.. 

फिर भी मेहनत मेरी उनको लगती क्यूँ नादानियां? 

कल जब सारा शहर होगा मेरे आगे पीछे..... 

शायद तब मेरी शोहरत देगी उनको परेशानियां

मैं उनको फिर भी नहीं बताऊँगा उनकी हकीकत

मैं भूल नहीं सकता खुदा ने जो की है मेहरबानि

✨️

आलिंगन

विभोर स्पर्श पलकों बंद आँखों स्पन्दन राज का l

विरह ओस बूँदों सी अधखुले नयनों साँझ का ll

विशृंखल कोमल अंकुरन सांझी हृदय राह का l

व्यग्र उच्छृंखल मन ढूंढ रहा साथ माहताब का ll

✨️

ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा


गहराई में जाकर देखें 

एक धरा से उपजे हैं सब, 

ऊँचाई पर बैठ निहारें 

सूक्ष्म हुए से खो जाते तब !

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️


शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

4439...दरारों में बसती ज़िंदगी

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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क्यों चीजों का यथावत स्वीकार करना जरूरी है?
व्यवस्थाओं के प्रति असंतोष और प्रश्न सुरूरी है?
कुछ बदलाव के बीज माटी में छिड़ककर तो देखो
उगेंगी नयी परिभाषाएँ काटेंगी बंधन मानो छुरी हैंं 
प्रथाओं के मिथक टूटेगें और तय होगा एक दिन
धरती की वसीयत में किसके लिए क्या जरूरी है।
#श्वेता
आज की रचनाएँ-

कोई बीज 
जीवन की जददोजहद के बीच
कुलबुलाहट में जी रहा होता है।
बारिश, हवा, धूप 
के बावजूद
दरारों में बसती जिंदगी
खुले आकाश में जीना चाहती है।



शुक्र है आँखों कि भाषा सीख कर हम आये थे,
वरना मुश्किल था पकड़ना बेईमानी आपकी.

फैंकना हर चीज़ को आसान होता है सनम,
दिल से पर तस्वीर पहले है मिटानी आपकी.

जोश में कह तो दिया पर जा कहाँ सकते थे हम,
गाँव, घर, बस्ती, शहर है राजधानी आपकी
.



भूलना उसको तिरे बस में नहीं ।
ढूँढ ऐसा भी हुनर होता है क्या ।।

अश्क भी तो ज़हर है, बहता हुआ।
देखिए इसका असर होता है क्या।।

लब जले, साँसें जलीं, दिल भी जला ।
खाक होने से मगर होता है क्या ।।





माताजी की उठावनी में जाना है ना ! वहाँ शादी ब्याह में पहनने वाली तड़क भड़क की साड़ी पहन कर थोड़े ही जाउँगी ! कितने बड़े-बड़े लोग आएँगे उनके यहाँ ! सुना है दिल्ली से भी पार्टी के उच्चाधिकारी आने वाले हैं 



तिहाई का शिखर छू कर बनना तो था

शतकवीर ..,

मगर  वक़्त का भरोसा कहाँ था ?

कठिन रहा यह सफ़र …,

“निन्यानवें के फेर में आकर चूक जाने की”

बातें बहुत सुनी थीं ।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 3 जुलाई 2025

4438...‘बच्चों को चालू-बदमाश बनाने के लिए ये फ़िल्म दिखाने की क्या ज़रुरत है?

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय प्रोफ़ेसर गोपेश मोहन जैसवाल जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए ब्लॉगर डॉट कॉम पर प्रकाशित रचनाएँ-

प्रेम कविता | इतराता है प्रेम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

उस पल

इतराता है प्रेम

खुद पर,

जब गुज़रता है

एक भिखारी के

हृदय से हो कर

और

पाता है

मधुर संकेत

एक भिखारिन से

*****

813. चढ़ूँगा, तभी तो पहुंचूंगा

चढ़ रहे हैं यात्री

अपनी-अपनी ट्रेनों में

पहुँच ही जाएंगे गंतव्य तक,

पुराने यात्रियों की जगह

आ गए हैं अब नए यात्री,

पर मैं वहीं खड़ा हूँ, जहां था।

 *****

प्रेम

किताब के पन्नों में

महानता का दर्जा पाकर

लेटी है

शब्दों को सिराहने लगाए

सदियों से

प्रेम के इंतजार में।

*****

अन्तर्कथा

तो आगे भी सैदव अँधेरे में रहने के लिए तैयार रहो- जाल में फँसी हजारों गौरैया-मैना की आजादी का फ़रमान जारी हो सकता था…! तुम उदाहरण बन सकती थी। लेकिन तुमने ही स्वतंत्रता और स्वच्छंदता की बारीक अन्तर को नहीं समझा।

*****

16 एम० एम० का रुपहला पर्दा

चलती का नाम गाड़ीफ़िल्म का तो नाम सुन कर ही पिताजी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया था.

इस फ़िल्म को बच्चों को दिखाए जाने से साफ़ इंकार करते हुए हमारे न्यायाधीश पिताजी ने माँ से कहा था

बच्चों को चालू-बदमाश बनाने के लिए ये फ़िल्म दिखाने की क्या ज़रुरत है?

मैं उनको सीधे-सीधे पॉकेटमारी की ट्रेनिंग दिलवा देता हूँ. आए दिन मेरे कोर्ट में पॉकेटमार तो पकड़ कर लाए ही जाते हैं.

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


बुधवार, 2 जुलाई 2025

4437...भागती प्रस्तुति....

 सादर अभिवादन

मंगलवार, 1 जुलाई 2025

4436...कवि तुम कहाँ लिख सकोगे?

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
-------

लड़-भिड़कर, पक्ष-विपक्ष गाकर सोशल मीडिया में

मर्यादा का पाठ  पढ़ाया जा रहा सोशल मीडिया में

गुटों में बँटे क़लमकार सही-गलत रटाया जा रहा

परिदृश्य में बने रहने का सबक  सिखाया जा रहा

संवेदनाओं के मृत होते ही भावनाएँ भड़क उठती है

नेपथ्य में चीखकर जाने क्या जौहर दिखाया जा रहा?

आज की रचनाएँ


पिंजरे में बन्द मैना युगों से
गाती सबसे रसीला गान कवि! 
उन्मुक्त उड़ान की चाह को उसकी
कोई कब  पाया जान कवि! 
समाएगी कैसे अस्फुट स्वरों में 
पीर स्वर्णिम  कैद की! 
गीत में ना ढल सका जो
उस निःशब्द हाहाकार की! 
 कवि! तुम कहाँ लिख सकोगे
 कहानी नारी के अधिकार की!  







फिर 
कोई सांझ बोझिल नहीं होती। 
सुबह, दोपहर और सांझ
यही तो
जीवन है


नीलगगन सा जो असीम है 
अंतर का आकाश न देखा, 
दिल को रोका चट्टानों से 
खिंच गयी जिन पर दुख रेखा ! 

एक ऊर्जा हैं अनाम सभी
क्योंकर इतना मोह नाम से, 
नाम-रूप बस छायायें हैं 
बिछड़ गयीं जो परम धाम से !



अनुभव जिनके पास हो,वो जन गुरू समान।
भले-बुरे के भेद को,पल में लें पहचान।।
पल में लें पहचान, बात सब उनकी मानो।
कड़वी लगती सीख,भले ही झूठी जानो।
कहती अभि निज बात,सीख से मिलता वैभव।
आए विपत्ति काल,काम आए तब अनुभव।।



उस झोपड़ी में एक बुजुर्ग महिला रहती थी। उस समय वह खिचड़ी बना रही थी। शिवाजी ने उससे भोजन देने को कहा, तो उसने एक पत्तल पर खिचड़ी परोस दी। शिवाजी बहुत भूखे तो थे ही, उन्होंने पत्तल में रखी गई खिचड़ी के बीचोबीच अपनी अंगुली से खिचड़ी उठानी चाही, तो अंगुलियां जल उठीं। वह मुंह से अंगुलियों पर फूंक मारने लगे। उस महिला ने उनसे कहा कि तुम्हारी शकल तो शिवाजी से मिलती है, अक्ल भी उसकी तरह नासमझों वाली है। शिवाजी ने कहा कि मां, आप ऐसा क्यों कहती हैं। 


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आज के लिए इतना ही 
मिलते हैं अगले अंक में।

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