सादर अभिवादन
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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फ़ॉलोअर
सोमवार, 7 जुलाई 2025
4442 ...इटली का गार्डन ऑफ लाजियो, राक्षसों के पार्क
रविवार, 6 जुलाई 2025
4441...यह पृथ्वी तब भी थी जब नहीं थे वृक्ष
सादर अभिवादन
शनिवार, 5 जुलाई 2025
4440..एक अनसुनी चीख..
।।प्रातःवंदन।।
" सखी !
बादल थे नभ में छाये
बदला था रंग समय का
थी प्रकृति भरी करूणा में
कर उपचय मेघ निश्चय का।।
वे विविध रूप धारण कर
नभ–तल में घूम रहे थे
गिरि के ऊँचे शिखरों को
गौरव से चूम रहे थे..!!"
हरिऔध
प्रकृति की बदलती तस्वीरे और भीगे भीगे दिन की शनिवारिय शुभकामना के साथ शामिल रचनाओ का आनन्द ले..
राइटर्स रेजीडेंसी , पटना में यौन अपराध के आरोप के बहाने और मायने
दयानंद पांडेय
✨️
कोई नहीं पढ़ता मेरी लिखी कहानियां
बातें भी मेरी लगती उनको बचकानियां
लहू निचोड़ के स्याही पन्नों पे उतार दी..
फिर भी मेहनत मेरी उनको लगती क्यूँ नादानियां?
कल जब सारा शहर होगा मेरे आगे पीछे.....
शायद तब मेरी शोहरत देगी उनको परेशानियां
मैं उनको फिर भी नहीं बताऊँगा उनकी हकीकत
मैं भूल नहीं सकता खुदा ने जो की है मेहरबानि
✨️
विभोर स्पर्श पलकों बंद आँखों स्पन्दन राज का l
विरह ओस बूँदों सी अधखुले नयनों साँझ का ll
विशृंखल कोमल अंकुरन सांझी हृदय राह का l
व्यग्र उच्छृंखल मन ढूंढ रहा साथ माहताब का ll
✨️
गहराई में जाकर देखें
एक धरा से उपजे हैं सब,
ऊँचाई पर बैठ निहारें
सूक्ष्म हुए से खो जाते तब !
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️
शुक्रवार, 4 जुलाई 2025
4439...दरारों में बसती ज़िंदगी
व्यवस्थाओं के प्रति असंतोष और प्रश्न सुरूरी है?
कुछ बदलाव के बीज माटी में छिड़ककर तो देखो
उगेंगी नयी परिभाषाएँ काटेंगी बंधन मानो छुरी हैंं
प्रथाओं के मिथक टूटेगें और तय होगा एक दिन
धरती की वसीयत में किसके लिए क्या जरूरी है।
जीवन की जददोजहद के बीच
कुलबुलाहट में जी रहा होता है।
बारिश, हवा, धूप
के बावजूद
दरारों में बसती जिंदगी
खुले आकाश में जीना चाहती है।
वरना मुश्किल था पकड़ना बेईमानी आपकी.
फैंकना हर चीज़ को आसान होता है सनम,
दिल से पर तस्वीर पहले है मिटानी आपकी.
जोश में कह तो दिया पर जा कहाँ सकते थे हम,
गाँव, घर, बस्ती, शहर है राजधानी आपकी.
तिहाई का शिखर छू कर बनना तो था
शतकवीर ..,
मगर वक़्त का भरोसा कहाँ था ?
कठिन रहा यह सफ़र …,
“निन्यानवें के फेर में आकर चूक जाने की”
बातें बहुत सुनी थीं ।
गुरुवार, 3 जुलाई 2025
4438...‘बच्चों को चालू-बदमाश बनाने के लिए ये फ़िल्म दिखाने की क्या ज़रुरत है?
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय प्रोफ़ेसर गोपेश मोहन जैसवाल जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए ब्लॉगर डॉट कॉम पर प्रकाशित रचनाएँ-
प्रेम कविता | इतराता है प्रेम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
उस पल
इतराता है प्रेम
खुद पर,
जब गुज़रता है
एक भिखारी के
हृदय से हो कर
और
पाता है
मधुर संकेत
एक भिखारिन से
*****
*****
“तो आगे भी सैदव अँधेरे में रहने के लिए तैयार रहो- जाल में फँसी हजारों गौरैया-मैना की आजादी का फ़रमान जारी हो सकता था…! तुम उदाहरण बन सकती थी। लेकिन तुमने ही स्वतंत्रता और स्वच्छंदता की बारीक अन्तर को नहीं समझा।”
‘चलती का नाम गाड़ी’फ़िल्म का तो
नाम सुन कर ही पिताजी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया था.
इस फ़िल्म को बच्चों को दिखाए जाने से
साफ़ इंकार करते हुए हमारे न्यायाधीश पिताजी ने माँ से कहा था –
‘बच्चों को चालू-बदमाश बनाने के लिए ये फ़िल्म दिखाने की क्या
ज़रुरत है?
बुधवार, 2 जुलाई 2025
4437...भागती प्रस्तुति....
सादर अभिवादन
मंगलवार, 1 जुलाई 2025
4436...कवि तुम कहाँ लिख सकोगे?
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
लड़-भिड़कर, पक्ष-विपक्ष गाकर सोशल मीडिया में
मर्यादा का पाठ पढ़ाया जा रहा सोशल मीडिया में
गुटों में बँटे क़लमकार सही-गलत रटाया जा रहा
परिदृश्य में बने रहने का सबक सिखाया जा रहा
संवेदनाओं के मृत होते ही भावनाएँ भड़क उठती है
नेपथ्य में चीखकर जाने क्या जौहर दिखाया जा रहा?
पिंजरे में बन्द मैना युगों सेगाती सबसे रसीला गान कवि! उन्मुक्त उड़ान की चाह को उसकीकोई कब पाया जान कवि! समाएगी कैसे अस्फुट स्वरों में पीर स्वर्णिम कैद की! गीत में ना ढल सका जोउस निःशब्द हाहाकार की! कवि! तुम कहाँ लिख सकोगे कहानी नारी के अधिकार की!
अंतर का आकाश न देखा,
दिल को रोका चट्टानों से
खिंच गयी जिन पर दुख रेखा !
एक ऊर्जा हैं अनाम सभी
क्योंकर इतना मोह नाम से,
नाम-रूप बस छायायें हैं
बिछड़ गयीं जो परम धाम से !
भले-बुरे के भेद को,पल में लें पहचान।।
पल में लें पहचान, बात सब उनकी मानो।
कड़वी लगती सीख,भले ही झूठी जानो।
कहती अभि निज बात,सीख से मिलता वैभव।
आए विपत्ति काल,काम आए तब अनुभव।।
मिलते हैं अगले अंक में।












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