निवेदन।


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शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

3872.....कृष्ण कन्हैया

शुक्रवार अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
-------
श्री कृष्ण एक ऐसा चरित्र है जो बाल,युवा,वृद्ध,स्त्री पुरुष सभी के लिए आनंदकारक हैं।
कृष्ण का अवतरण अंतःकरण के ज्ञान चक्षुओं को खोलकर प्रकाश फैलाने के लिए हुआ है।
भगवत गीता में निहित उपदेश ज्ञान,भक्ति,अध्यात्म,सामाजिक,वैज्ञानिक,राजनीति और दर्शन का निचोड़ है जो जीवन में निराशा और नकारात्मकता को दूर कर सद्कर्म और सकारात्मकता की ज्योति जगाता है।

*बिना फल की इच्छा किये कर्म किये जा।
*मानव तन एक वस्त्र मात्र है आत्मा अजर-अमर है।
*क्रोध सही गलत सब भुलाकर बस भ्रम पैदा करता है। हमें क्रोध से बचना चाहिए।
*जीवन में किसी भी प्रकार की अति से बचना चाहिए।
*स्वार्थ शीशे में पड़ी धूल की तरह जिसमें व्यक्ति अपना प्रतिबिंब नहीं देख पाता।
 *आज या कल की चिंता किये बिना परमात्मा पर को सर्वस्व समर्पित कर चिंता मुक्त हो जायें।
 *मृत्यु का भय न करें। 

 और भी ऐसे अनगिनत प्रेरक और सार्थक संदेश हैंं जो भौतिक संसार की वास्तविकता से परिचित कराते हैं।
कर्म के संबंध में श्रीकृष्ण के बेजोड़ विचार अनुकरणीय है। भटकों को राह दिखाता उनका जीवन चरित्र उस दीपक के समान है जिसकी रोशनी से सामाजिक चरित्र की दशा और दिशा में कल्याणकारी परिवर्तन लाया जा सकता है।
कृष्ण को शब्दों में बाँध पाना असंभव है उनके गुणों का आस्वादन कर आत्मविभोर होने का आनंद किसी अमृतपान से कम नहीं।
मेरे विचार से कृष्ण जैसे मात्र कृष्ण ही हैं।





जब विप्र सुदामा आया, मैत्री का मान बढ़ाया,
दो मुट्ठी चावल के बदले में राजकोष दे डारा ! 

द्रौपदी का चीर बढ़ाया, दुर्योधन मान घटाया,
साड़ी का अंत ना आया, तूने क्या जादू कर डारा !

अर्जुन को मित्र बनाया, गीता का ज्ञान सुनाया, 
जब अर्जुन हिम्मत हारा, तू बन गया परम सहारा


जब कोई
छुड़ाकर हाथों से हाथ
बहुत दूर चला जाता है
तो छूट जाते हैं
जाने-अनजाने
अपनों से अपने
अपने ही सपने
कांच की तरह
टूटकर बिखर जाता है जीवन


अधरों पर बंसी रहेमस्तक पंख मयूर,

कान्हा तो चित-चोर हैवासे राहियों दूर.


सजा हुआ है आज फिरकान्हा का दरबार,

अरजी पर शायद मेरीचर्चा हो इस बार.


सहज सरल सी बात है कहे सुदर्शन चक्र,

संयम ही अनुकूल हैसमय दृष्टि जब वक्र.




एक डगर थी सूनी जिस पर
पनघट नजर नहीं आता था,
काँटों में उलझा था दामन
श्यामल रंग से न नाता था !

भर पिचकारी तन पे मारी
सप्त रंगी सी पड़ी फुहार,
 पोर-पोर शीतल हो झूमा
फगुनाई की बहती  बयार !


पापी को बचाने के लिए  कोई बहाना जिसके आगे नहीं चलता, औचित्य तथा न्याय की रक्षा हेतु  स्वयं अपना वचन तोड़ने पर  उतारू हो जाए .जीवन का सारा रस जन-जन को  बांटकर, निराले रंगों से संसार को रंजित कर के भी जिसकी उज्ज्वल श्यामता जस की तस रही हो ,उस  निर्लिप्त  को महामानव कहें या देवता? मान-अपमान,,यश-अपयश की प्रचलित अवधारणाएँ जिसे तोलने को  अपर्याप्त है  ,वह जब स्वयं अपना ही अतिक्रमण करता है तो परिभाषाएँ   बदल जाती हैं.  भविष्य की अपार संभावनाएँ  जिसके कर्मसंदेश में निहित हों , त्रस्त मानवता के त्राण बन कर भूतल पर उतरों 
,  

--------

आज के लिए इतना ही
कल का विशेष अंक लेकर आ रही हैं
प्रिय विभा दी।

बुधवार, 6 सितंबर 2023

3871..कई खबरें आ रही...

 

।। प्रातः वंदन।।

"उठो सोनेवालो, सबेरा हुआ है,

वतन के फकीरों का फेरा हुआ है।

जगो तो निराशा निशा खो रही है

सुनहरी सुपूरब दिशा हो रही है

चलो मोह की कालिमा धो रही है,

न अब कौम कोई पड़ी सो रही है।

तुम्हें किसलिए मोह घेरे हुआ है?

उठो सोनेवालो, सबेरा हुआ है।"

अज्ञात

आगाज़ कि सबेरा हुआ है, तो फिर उसी चिरपरिचित अंदाज में चलिए आज शुरुआत करते हैं..

राजा मूँछ मरोड़ रहा है

राजा मूँछ मरोड़ रहा है

सिसक रही हिरनी

बड़े-बड़े सींगों वाला मृग

राजा ने मारा

किसकी यहाँ मजाल

कहे राजा को हत्यारा

मुर्दानी छायी जंगल में..

💐

ढल रही है ज़िन्दगी की उमर धीरे-धीरे                                            

अब तलक उस लमहे को रोके खडी हूँ 

जिसे छोड़ा अधूरा था उसने जिस हाल में

कई अरसे गुजर गये आयेगा वो इन्तज़ार में

कशमकश में जीती रही ज़िन्दगी भरी बहार 

में ।

💐

गजल 3

न झूठी अब लिखाई चाहता हूं। 

बदलना रोशनाई चाहता हूं ।। ।1। 

कई खबरें हैं खबरों से परे जो,

मैं उनकी भी छपाई चाहताहूं। ।2। 

💐





 



Dear ज़िन्दगी !

बड़ा होकर भी देख लिया ... 

समझदारी कि चादर ओढ़

बुढ़ापे को भी टटोल लिया ... 

अब नासमझ बचपन कि 


💐

रिश्ता इक अद्भुत बन जाता


शिक्षा, शिक्षण तथा प्रशिक्षक 

मानवता के पावन रक्षक, 

कोरे मन पर लिखें इबारत 

बन जाते हैं वही परीक्षक

💐

।। इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍️

सोमवार, 4 सितंबर 2023

3870 ,,,सभी बातें .. सभी के खोपड़ी में समा भी कहाँ पाती है भला

 सादर अभिवादन

कल मैं नही रहूँगी
किसी ने लगा दिया तो पढ़ लीजिएगा
वरना परसों पम्मी दी को पढ़ेगे ही
सादर




क्रांति के बाद क्रांति को आतुर रहना
विकृति है, संस्कृति नहीं  
संस्कृति - विकृति में
अंतर मिटा देना अपराध है
मौन के बाद भी मौन शेष रहे
वही शांत, तरल, व्याप्त व्यापक
देश  की संस्कृति है.




मिली थी जो कल फिर उसी चौराहे
बरगद छाँव तले l
परछाई की उस रूमानी रूह में
कोई रूहानी साँझ थी ll

आकार निराकार था उस
प्रतिबिंब के दर्पण नजर में l
फिर भी हर अल्फाजों में
उसकी ही बात सगर थी ll




समर कितना शेष मेरा
तुम को तो है सब पता
कौन से दिन किस घड़ी में
होगी पूरी साधना
तुम से निर्मित विचित्र सृष्टि का
अति सूक्ष्म अनुभाग हूँ




समय जरूर बताएगा
समय सबको सब कुछ सही सही बता जाता है
गलतफहमी बनी रहनी भी जरूरी है
भाग्य से ही सही
बन्दर हनुमान जैसा नजर आता है
‘उलूक’ अपनी आँखों से देखना बहुत अच्छा है




वहाँ अन्य बैठे रसिकवा के ग्राहक लोग चाय के साथ-साथ मुहल्ले के दोनों प्रतिष्ठित व्यक्तियों - 'प्रोफेसर' साहब और 'स्टोरकीपर' साहब की वार्तालाप का भी आनन्द मुफ़्त में ले रहे हैं। पर आधी उनकी खोपड़ी में समा रही है और .. आधी ऊपर से निकल जा रही है। वैसे भी दुनिया की सभी बातें .. सभी के खोपड़ी में समा भी कहाँ पाती है भला ? .. बस यूँ ही


आज बस इतना ही
सादर

रविवार, 3 सितंबर 2023

3869 ..वैश्या वृत्ति से जुड़े हिंदी उपन्यास ... जाने माने ख्याति प्राप्त लेखक

सादर अभिवादन
आज हिमाचल मे पानी बरस रहा है


लोग खरबों रुपए खर्च कर चांद और सूरज को जाते हैं-
धरती के नीचे क्यों नहीं देखते

लीजिए पढ़िए आज का अनूठा अंक



उत्तराखंड के गांवों में पहुंची घोड़ा लाइब्रेरी
किताबों से लदी ऊंट की पीठ पर चलती-फिरती लाइब्रेरी से शुरू हुआ बुक लवर्स और पढ़ने के शौकीनों का सफर आज गूगल की ऑनलाइन लाइब्रेरी तक जा पहुंचा है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि किताबें ऊंट न सही टट्टू की पीठ पर लादकर आज भी उत्तराखंड के दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में पहुंच रही हैं।
जहां न सड़कें हैं न पर्याप्त बिजली, लेकिन वहां के बच्चों को पढ़ने का शौक है और टट्टू पर लदी किताबें उनके चेहरे पर मुस्कुराहट ला देती हैं।




आया सितम्बर
लाया वर्षा की बौछार
बस कुछ कदम दूर है
जन्माष्टमी  त्योहार !
वही, अपने कन्हैया का जन्मदिन
जिसे मनाते हैं आधी रात  
सोचें जरा,  था आधुनिक


दरिया न इधर का मेरा दरिया न उधर का
अंजाम मग़र अच्छा था कश्ती में सफऱ का

मैं चाँद को मुट्ठी में लिए बैठा हूँ कब से
नाकामी कहाँ रोक सकी रस्ता हुनर का



1.सलाम आखिरी - मधु कांकरिया
2.शेष कादंबरी -अलका सरावगी
3.मुर्दाघर - जगदम्बा प्रसाद दीक्षित
4.आज बाज़ार बंद है  - मोहनदास नैमिशराय
5. सुहाग के नूपुर - अमृतलाल नाग
6. मुर्दों का टीला - रांग्ये राघव
7. कुंभी पाक - नागार्जुन
8. वैशाली की नगरवधू - आचार्य चतुर्सेन शास्त्री
9. सेवासदन - प्रेमचंद


सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन राकेश ने राधिका को बताया कि वह यू.पी., पी.सी. एस. की परीक्षा फ़िर से देना चाह रहा है । फ़ूड सप्लाई इंस्पेक्टर की पोस्ट क्लॉस वन की नहीं थी, और अब राकेश क्लास वन की नौकरी चाहता था । उसके कई दोस्त क्लास वन के अधिकारी थे, उनसे मिलने पर राकेश हीनता के भाव से भर जाता था । यह हीनता उसे अंदर ही अंदर कचोटती, अतः उसने निर्णय लिया कि वह एक बार फिर मेहनत करेगा और अपनी क़िस्मत आजमायेगा । राधिका को भला इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी लेकिन थोड़ी आशंका के साथ उसने पूछा –

“सुबह से शाम तक तो आप फील्ड में रहते हैं, पढ़ाई कब करेंगे ? सिर्फ पाँच महीनें हैं हाँथ में। नौकरी और पढ़ाई दोनों कैसे मैनेज करेंगे?”





नदी
और
हमारे रिश्ते में
अब भी
उम्मीद की नमी है
चाहें तो
बो लें कुछ अपनापन
रिश्ता
और बहुत सी नदी।


आज बस इतना ही
एक निवेदन कोई यदि 5 सितंबर का अंक लगा सके तो ..
एक आग्रह

शनिवार, 2 सितंबर 2023

3868... हिन्दी की महत्ता

एक राष्ट्र में हो एक राष्ट्रभाषा

हिन्दी है हिंदुस्तान की परिभाषा

बस हिन्दी पर बड़ी-बड़ी बातें हैं

पता कर लो सभी की औकातें हैं

  हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...   

शुरू है हिन्दी माह अकबर के दरबार के नौं रत्नों में एक थे रहीम, अवधी और बृज दोनों भाषा में लिखते थे। उनकी रचनाओं में कई रस मिलते हैं। उनके लिखे दोहे, सोरठे और छंद बेहद मशहूर हैं। रहीम मुसलमान थे और कृष्ण भक्त भी। रहीम ने बाबर की आत्मकथा का फ़ारसी में अनुवाद भी किया था।

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य

सुना? रूस में हो गई है हिन्दी अनिवार्य

है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-

बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा

दोहरे मापदंड अपनाके

हिन्दी में चलचित्र बनाके

राजनीति में देशी भाषा

निजता में इंग्लिश बतियाके

छद्म भेष धर यूँ ना डोलो

कई भाषाओ को आश्रय देकर , 

कुनबा अपना बढ़ा रही ।

बोलने, पढ़ने, लिखने में जचती ,

ऐसी मधुर आवाज है हिन्दी ।।

हिन्दी  भाषा नहीं भावों की अभिव्यक्ति है,

यह मातृभूमि पर मर मिटने की भक्ति है।

सम्मानित हमारी राष्ट्रभाषा,

हम सबकी है यही अभिलाषा।

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पुनः भेंट होगी...
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शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

3867....मौसम शहर का...

 शुक्रवार अंक में

आप सभी का स्नेहिल संस्थान।
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दुष्यंत कुमार का हिन्दी-साहित्य के समकालीन कवियों में महत्वपूर्ण स्थान हैं। उनकी कविता जन-जन की कविता है। कवि ने अपनी रचनाओं में सहज विश्वास के साथ मध्यवर्गीय व्यक्ति के आत्म-संघर्ष और उसकी छटपटाहट को अभिव्यक्ति प्रदान की है। अतः यह कहना कि दुष्यंत कुमार जी समकालीन हिन्दी कविता के समर्थ हस्ताक्षर हैं, सार्थक प्रतीत होता है। इस तथ्य की पुष्टि उनके काव्य-वैशिष्ट्य से सहज ही हो जाती है।

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए
यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है
एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो—
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है
मस्लहत—आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है
इस क़दर पाबन्दी—ए—मज़हब कि सदक़े आपके
जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है
मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है
आइये अब आज की रचनाओं का आनंद लें

दस्तावेज़ के दस्तावेज़ में
मिठाई की भाषाएँ
तुलसी तक रही दवाखाना को
माली एक स्कूल है

की परिचय परिभाषा सीमित
अप्रूवल का सीज़न..
      
     

  भाई बहन का पर्व है राखी, क्यों अब इसे भुलाया ?
 रक्षा सूत्र को ऐसे खुद से खुद को क्यों पहनाया ?

दो मत दो रूपों में मैं थी अपने पर ही भारी !
मतभेदों की झड़ी लगी मुझ पे ही बारी-बारी।


       

नेह में मोती पिरोकर

दीप में किरणें प्रभा की।

आरती वन्दन करूँ मैं

नेह की थाली सजा ली॥

प्रेम के उपहार मेरा से

दिल ही भर गया॥






थकी हुई पलकें हैं धुंधली आंखें, फ़क़त ये उलझन है बेबसी की,
हुए जो इतने निशब्द लब अब, कहीं ये गंदे दिल को ख़ल न जाए। ज़रा तो दिल में उतर के देखो, लिटरेचर किस्से बदल गए हैं, बड़ा ही दुश्मन है ये ज़माना, परस्पर जुड़ें उनकी स्वायत्तता ना जाए



                            


 

हाथ कर भागेगा
हंसते-हंसते
रो जाएगा
सो जाएगा
जागेगा तो उछलेगा
पानी है तो फूटेगा।
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 आज के लिए इतना ही

कल का विशेष अंक लेकर

आ रही हैं प्रिय विभा दी।












गुरुवार, 31 अगस्त 2023

3865...आधुनिकता के दौड़ में भूल गए जिन्दगी...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया आशालता सक्सेना जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

आवश्यक सूचना!

दिल्ली इस समय भयंकर रूप से डेंगू बुख़ार की चपेट में हैअफ़सोस कि मीडिया में कोई चर्चा नहीं है। सुबह-शाम पार्क आदि में  घूमना निषेध करें और शरीर को पूरी तरह ढकने वाले कपड़े पहनें। ग्लोय, तुलसी,लोंग का सेवन डेंगू में लाभकारी साबित हुआ है। प्रशिक्षित डॉक्टर से परामर्श लें, बुख़ार के दौरान ख़ूब पानी पिएँ।

आज भाई-बहन के पवित्र प्यार का त्योहार रक्षा बंधन है। पाँच लिंकों का आनन्द परिवार की ओर से रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ।  

गुरुवारीय प्रस्तुति में आज पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

खीर में नमक

"मठ चाहीं सभन के एही देश में ••• लेकिन वफादारी निभाई लोग परदेश में••• चाकरी के कवनों हद नईखे! गलीयन में पटटवा भी लटकावला के काम बा।"

"लघुकथा को अंग्रेजी में भी लघुकथा ही कहा जाता है"

भाई बहिन का साथ बनाया है 

जन्म जन्मान्तर तक इसे निभाना है 

रक्षा बंधन का त्यौहार है 

बहुत प्यार से इसे मनाने  में 

जो खुशी मिलाती है 

किसी और त्यौहार में नहीं |

रक्षाबंधन

कभी हो जाए जो फिर भाई से कोई प्रतिस्पर्धा,

बिना सोचे कदम अपने वो पीछे मोड़ लेती है.

बड़ी होगी बहन तो खींच लेगी कान भाई के,

मगर माँ बाप  जाएँ तो चुप्पी ओढ़ लेती है.

एक ग़ज़ल -सच का भी किरदार हो


साज, साजिन्दे, सियासत की तरह दिन में अलग

शाम को बैठेंगे सब ठुमरी सुनाने के लिए

आपसी रंजिश में पेड़ों से दहकते ये धुंए

आग का क्या काम है जंगल जलाने के लिए

गुमनाम गाँगुली बनाम वादन की गायकी

पश्चिमी देशों, ख़ासकर अमेरिका, में किसी कालखण्ड के दरम्यान "जींस और गिटार" युवा विद्रोह, स्वयं की आध्यात्मिक तलाश, व्यक्तिगत जीवन शैली, रोमांच और जीवन को पूर्णता से जीने का प्रतीक बना हुआ था और आज भी कमोबेश है ही .. वो भी .. अपने वैश्विक प्रसार-विस्तार के साथ .. शायद ...युद्ध और निर्वासनअभी विश्वरंग पत्रिका का कथेतर गद्य अंक आया है। उसमें यह प्रस्तुति भी प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए। मैं युद्ध और निर्वासन पर अपनी बात कुछ कवियों, उनकी कविताओं और एक कहानी के हवाले से रखने की कोशिश करूंगा। कवि अलग-अलग काल और अलग-अलग जगहों के हैं। युद्ध पर कवियों ने लिखा है। सैनिकों ने भी लिखा है - कवि जो सेना में गए और सैनिक जो कविता लिखने को विवश हुए। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एक कविता संग्रह छपा (Poems of This warराखी के धागे....

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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