निवेदन।


फ़ॉलोअर

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

3728...मेरे पास जो बचा है...

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन
-------
*जो झुक सकता है वो झुका भी सकता है।
जीवन लंबा होने की बजाए महान होना चाहिए। 
* कानून और व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े तो दवा जरूर दी जानी चाहिए।
 * एक महान आदमी एक प्रतिष्ठित आदमी से इस तरह से अलग होता है कि वह समाज का नौकर बनने को तैयार रहता है।
 * धर्म मनुष्य के लिए बना है न कि मनुष्य धर्म के लिए।

*देश के विकास से पहले हमें अपनी बुद्धि के विकास की आवश्यकता है।
आज
स्वतंत्र भारत के महान संविधान के रचयिता 
बाबा भीमराव अंबेडकर जी की जयंती पर 
पूरा भारत उन्हें याद कर रहा है।

किसान और फसल भारतीय संस्कृति में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। फसल के हर मौसम को देश के 
विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नामों से उत्सव की तरह
मनाया जाने की परंपरा अनेकता में एकता का बेजोड़ उदाहरण है। इसी समृद्ध कड़ी में हर वर्ष 14-15 अप्रैल को 
विशेष रूप किस रूप में मनाते है आइये जानते हैं-
 पंजाब और हरियाणा में बैसाखी, असम में बोहाग बिहू,बंगाली समुदाय का पोइला बोइशाख, केरल में
 विशु कानी,तमिल में पुथंडु, बिहार,मिथिलांचल में सतुआनी... मुझे इतनी ही जानकारी थी अगर आपको 
 इस संबंध में कुछ और पता है तो कृपया जरूर साझा करें।
क्षमा चाहेंगे
 आज भूमिका काफी लंबी हो गयी है।

------
आइये आज की रचनाओं की दुनिया में चलते हैं-

व्यथाओं के इतिहास में प्रकृति की पीड़ा 
मानव जाति और जीवन के भविष्य के लिए अत्यंत गंभीर प्रश्न करती है जिसे अनसुना नहीं किया जाना चाहिए...।

भरी दोपहरी में कभी 
शीतल छाया से मेरी  
पथिक कोई थका हारा र
घड़ी दो घड़ी कर विश्राम 
पा कर सकून 
निकल पड़ता राह अपनी 
झूम उठती थी तब हरी भरी  
फूलों फलो से लदी डालियाँ मेरी 

मन की परतों में अनवरत चलते विचारों 
में जब भावनाओं का स्पर्श हो तो ऐसी कविताओं 
का अंकुरण होता है।

मैं कह सकता हूँ एक बात
कि अब मेरे पास कोई बात नहीं बची है

मेरे पास जो बचा है
वो इतना निजी है कि
उससे कोई बात नहीं बनाई जा सकती है

जीने और कहने के मध्य
मैं अटक गया हूँ एक खास बिन्दु पर


स्मृतियों को बाँधकर रखा जा सकता है या
नहीं पता नहीं पर हम चाहे न चाहे कुछ स्मृतियाँ
अवश मन के ईर्द-गिर्द बंध जाती हैं
..शायद कुछ स्मृतियाँ जीवन के
बेरंग पलों को अपनी सुगंध से भर देती हैं
और कुछ जीवन को बंजर कर देती हैं।
अक्सर, आ घेरे वो लम्हा,
पूछे मुझसे, वो था क्यूं इतना तन्हा!
सिमट गए, क्यूं, बलखाते पल!
बारिश की, भींगी रातों से!

बांध गया कोई, अपनी ही यादों से!



लेखनी जो भी कहे ऐसा कहे जिसे पढ़कर
मुस्कान और विवेक के पंख दोनों खुल जाएँ..
अपने झूठ को सच करने के लिए कागज दिखाओ तो कागज का सच भी सामने आ जाता है- करेले पर नीम चढ़ जाता है. उससे बेहतर तो कई बार लगता है कि करेले को करेला ही रहने दो, लोग जानते तो हैं ही – क्या झूठ को सच साबित करना.


किसी भी परंपरा को आँख मूँद कर तथ्य हीन और तर्कहीन होकर निभाना कितना सही है एक बार विचार अवश्य करें-
इंसान किसी अनहोनी, असंभाव्य या अनजान डर से, यह जानते हुए भी कि ऐसा कुछ नहीं होगा फिर भी इतना भयभीत रहता है कि कुछ ना कुछ तर्कहीन कार्य-कलापों का सहारा ले ही लेता है ! ऐसे में ही यदि कुछ अच्छा घट जाता है तो हमारा विश्वास उन चीजों पर और भी बढ़ जाता है ! देखा जाए तो यदि मष्तिष्क को सकून मिलता है, डर थोड़ा तिरोहित होता है, किसी का कोई नुक्सान नहीं होता तो दिल को समझाने के लिए ऐसी चीज का उपयोग बुरा भी नहीं है , पर वही सही है ऐसा दिलो-दिमाग पर छा जाना भी उचित नहीं है ! वैसे यह भी एक तरह का फोबिया ही है !



आज के लिए इतना ही

कल का विशेष अंक लेकर

आ रही हैं प्रिय विभा दी।

----

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

3727...आज के दिन 104 वर्ष पूर्व अमृतसर पंजाब के जलियांवाला बाग़ में...

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।

चित्र साभार:गूगल 
     आज के दिन 104 वर्ष पूर्व अमृतसर पंजाब के जलियांवाला बाग़ में बैसाखी उत्सव के दिन (13 अप्रैल 1919) रॉलेक्ट ऐक्ट का विरोध करने 25-30 हज़ार लोगों की शांतिपूर्ण सभा चल रही थी तभी निहत्थे बच्चों,महिलाओं व पुरुषों पर बिग्रेडियर जनरल रेगीनाल्ड डायर ने बाग़ के निकास द्वार को बंद करवाकर गोलियाँ चलाने का आदेश दिया जिसमें एक हज़ार से अधिक लोग शहीद हुए और हज़ारों घायल हुए। इस हत्याकांड के बाद देश में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध आक्रोश बढ़ गया। परिणामस्वरूप हंटर कमीशन नियुक्त हुआ जिसने जनरल डायर को दोषी माना और उससे इस्तीफ़ा लिया गया तथा उस क्रूर हत्यारे का लंदन पहुँचने पर भव्य स्वागत हुआ जिसकी मृत्यु 1927 में ब्रेन हेमरेज के कारण हुई।

    जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के समय माइकल ओ ड्वाएर पंजाब का लेफ़्टिनेंट गवर्नर था जो विरोधी स्वरों को कुचलने के लिए कुख्यात था जिसने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ़ 200 लोगों के मरने का ज़िक्र किया था। ड्वाएर जनरल डायर के इस कुकृत्य को जाएज़ ठहराता था। पंजाब के युवक सरदार ऊधम सिंह ने 1933 में लंदन पहुँचकर माइकल ओ ड्वाएर को मारने की योजना बनाई जिसे बख़ूबी उन्होंने 13 मार्च 1940 को अंजाम दिया।

ड्वाएर की हत्या के लिए क्रांतिकारी सरदार ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को फाँसी दी गई। हमारे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास बलिदानों से भरा हुआ है। हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी आज़ादी की रक्षा करें और देश की एकता व अखंडता के लिए अनवरत समर्पित रहकर कार्य करें।

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

मुझे अटल विश्वास है खुद पर

मुझे नही  किसी की  आवश्यकता

अपने पर ही आधारित रहूँगा

किसी को कुछ ना  कहूं

यह कोई नहीं समस्या  है |

एक प्यास जो अंतहीन है

पाने की हर बात भरम  है

जो भी अपना मिला हुआ है,

बनने की हर आस भुलाती

हर उर भीतर खिला हुआ है !

अनाहूत वृष्टि--

है प्राण वायु शिथिल निःश्वास में, अदृश्य
माधुर्य छुपा रहता है असमय की
सींच में, चंद्रबिंदु की तरह पड़े
रहते हैं सजल भावनाएं
पलकों के बीच में |

बदले पृष्ठ इतिहास के

करुणा के भूषण त्याग कर

यह कैसा धर्म प्रचार?

संस्कृतियों के घाट पर

अब होता व्यभिचार!

यह कैसा ढोंग-प्रलाप है

है कैसा यह संताप?

#हैसियतों के हिसाब से यहाँ #कायदा .

सड़ता है जैल में वह तबका,

खर्चा कानून का जो न दे सका,

रसूख वालों के लिये तो,

आधी रात भी दरवाजा  है खुला।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

बुधवार, 12 अप्रैल 2023

3726..ख़ुश्बू सा बिखर जा..

 ।।प्रातःवंदन।।

"आ गया हँसता हुआ यह प्रात,

मिट गई महिमा तुम्हारी रात !

शून्यता की गोद में था मैं पड़ा,

था नहीं कोई सहायक भी खड़ा।

दृष्टि जाती थी जिधर तम था वहां,

फूल के बदले बिछे कांटे यहां।

काट खाती थी भयानक रात,

आ गया हँसता हुआ यह प्रात !"

जनार्दन राय

लिजिए नवदिन की शुरुआत खास लिंकों के साथ,कि...



पिरो दी हूँ एहसास दिल का अल्फ़ाज़ों में

हजारों ख़्वाहिशें भी ठुकरा दूँगी तेरे लिए

तूं ख़ुश्बू सा बिखर जा साँसों में मेरे लिए ।

ग़र मुकम्मल मुहब्बत का दो तुम आसरा

तुझे दिल में नज़र में अपने बसा लूँगी मैं

🔶

 प्रेम में पड़ी स्त्री

पुरुष के लिए

सफलता की सीढ़ी

 बन जाती है... 

वहीं...

प्रेम में पड़ा पुरुष

🔶

प्रयोगात्मक लघुकथाएं

 लघुकथा कलश का  प्रयोगात्मक लघुकथा विशेषांक

2023  में प्रकाशित मेरी दो लघुकथाएं -

साथ ही योगराज प्रभाकर..

🔶

गांव नहीं बेचते

जितने भी ठौर हो हम अपना ठाँव नहीं बेचते
कोयल की कुक कागा की कांव कांव नहीं बेचते

दरख्तों की खुद्दारी तो देखो
धूप कितनी भी अमीर हो..
🔶

हुआ काल पर घात 
राजा निर्भय कर रहा 
मनमानी-सी बात 
जनता को पुचकार के ..
🔶
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍️

मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

3725 ..यह कि ..यह कि..यह कि....

 सादर अभिवादन



दुनिया का सबसे जहरीला गार्डन जहां अकेले जाना है मना, सांस लेने पर हो जाते हैं बेहोश
इस गार्डन को डचेस ऑफ नॉर्थंबरलैंड द्वारा बनाया गया था। इसने जड़ी-बूटियों के बगीचे के बजाय एक पॉइजन गार्डन बनाने का फैसला किया था। इस बगीचे में यू ट्री अपने जहर के लिए जाना जाता है, जिसे टैक्सिन भी कहा जाता है। ये किसी को भी 20 मिनट के अंदर मारने की क्षमता रखता है, लेकिन ज्यादातर लोग इसके बारे में नहीं जानते हैं। दरअसल, ये पेड़ टैक्सोल पैदा करता है, जो स्तन कैंसर के इलाज के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। इस बगीचे में तरह-तरह के पेड़-पौधे देखने को मिलते हैं, जो लोगों को हैरान करता है।
 इसे रिकिन का घर भी कहा जाता है, जो आमतौर पर कैस्टर बीन प्लांट के नाम से जाना जाता है। रिकिन गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार दुनिया का सबसे जहरीला पौधा है।


अब रचनाएं ....



बात हवा से करता जाता,
सबसे आगे वो हो जाता।

पापा को पोलो खिलवाता,
और मुझे  भी  सैर कराता।

मस्त कलर है इसका काला,
दादा जी  ने  इसको  पाला।




यह कि मैँ हिन्दु मुसलमानों के बीच दरार डालूंगा ताकि मैं लगातार चुनाव जीतता रहूँ. इस पर तो कुछ भी क्या कहना? कौवा कान ले गया कहना ही काफी है और तुम बिना कान चैक किए कौवे की पीछे भागने लगते हो तो मैं भी क्या करूँ? छू लगाने का शौक तो मुझे बचपन से रहा है.

-यह कि ..यह कि..यह कि....

क्या क्या बताऊँ, लोग तो सभी ज्ञानी हैं, सब समझते हैं. मेरी मजबूरी भी समझ ही गये होंगे.
फिर मैं ही क्यूँ अपराध बोध पालूँ?


अकविता


धूप के संसार में
लोग
मोम जैसे बन गये हैं,
चेहरे,
सुबह को कुछ और है,
परन्तु
शाम तक,
पिघल जाते हैं




माँ शब्द आते ही
जेहन में सबसे
पहला इमोशन आता है
सिर्फ प्यार ही प्यार,
दुनिया जहान का प्यार

एक ऐसी अदालत जहां
आपकी हर बात की,
हर गलती की माफी होती है।
एक ऐसा स्कूल
जहां जीवन भर
आपको सीख मिलती है
और सबसे अच्छे
प्यारे विद्यार्थी का मेडल भी।


पिछले अंक मे भी अनुत्तरित
एक प्रश्न ....
मैडम का हिन्दी अर्थ बताइए...

आज के लिए बस
सादर

सोमवार, 10 अप्रैल 2023

3724 ...कोई उंगली ऐसी है, जो सही रास्ते पर ले चलेगी तुम्हें

 सादर अभिवादन

आज होमियोपैथी के जनक डॉ. हेनिमेन का जन्म हुआ था
आज भी उनते सिद्धान्त व दवाएं कारगर है


एक बार जब अंगरेज डॉक्‍टर कलेन की लिखी “कलेन्‍स मेटेरिया मेडिका” मे वर्णित कुनैन नाम की जडी के बारे मे अंगरेजी भाषा का अनुवाद जर्मन भाषा में कर रहे थे तब डॉ॰ हैनिमेन का ध्‍यान डॉ॰ कलेन के उस वर्णन की ओर गया, जहां कुनैन के बारे में कहा गया कि ‘’ यद्यपि कुनैन मलेरिया रोग को आरोग्‍य करती है, लेकिन यह स्‍वस्‍थ शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा करती है। ....विकी पीडिया से.

रचनाएँ ....


सोच रही हो तो अमल करो
प्रतीक्षा किस बात की•••!
कहीं भी उतरवा लेने से हरिद्वार वाले हरि नाराज होते हैं
तो वहीं वाले हरि से पैरवी लगवा लेना
आखिर माँ हो मातृ शक्ति को कब आजमाओगी••!"




 जाने किस हाल में होगा वो ,
जाने क्या होगा उसका आगे ,
वो खुद भी नहीं आया मर्ज़ी से,
जब लाया तो क्यों ख्याल न रखा ,
वो आज लाचार है बेबस भी ,




इक अदृश्य ऋण सा है, अनुरागी अनुबंध,
पृथ्वी गगन, दिगंत रेखा बांधे नाभि नाल,

लौकिक अलौकिक सभी शून्य में प्लावित,
सिर्फ़ तुम ही तुम हो अंतरतम में बहरहाल,




कोई उंगली ऐसी है,
जो सही रास्ते पर ले चलेगी तुम्हें,
पहुंचा देगी तुम्हें तुम्हारी मंज़िल तक,
कोई ऐसी भी है,
जो छोड़ देगी तुम्हें
घने जंगल या गहरे समंदर में.




अपनी सुबह तो रोज ही खूबसूरत होती है, आज तो बहुत खूबसूरत हो गई। रोज 2 कि.मी. साइकिल चलाकर सारनाथ पार्क में जाते हैं, आज संडे है तो सोचा कुछ हिम्मत का काम किया जाय। लगभग 10 कि.मी. साइकिल चलाकर, गांव-गांव घूमते हुए सारनाथ से नमो घाट पार्किंग में साइकिल खड़ी कर, ताला लगाकर, यू ट्यूब बंद कर, मोबाइल में घड़ी देखा तो सुबह के 6 बज रहे थे और पहुंचने में 50 मिनट लग चुके थे। यू ट्यूब में डाउन लोड किए, कबीर और गोरखनाथ के सभी भजन खतम हो चुके थे।

और अंत मे एक प्रश्न ....
मैडम का हिन्दी अर्थ बताइए...

आज के लिए बस
सादर

रविवार, 9 अप्रैल 2023

3723......तब जिंदगी के सभी संघर्ष सहज हो जाते हैं।

जय मां हाटेशवरी..... आज मैंने CHat GPT को आदेश दिया.....
आकांक्षा पर कविता लिखें.....
क्योंकि आकांक्षा मेरी बेटी का नाम है.....
जो उसने लिखा....
आज की प्रस्तुती का शुभारंभ उसी से.....

जब सपनों के अंधेरे में अँधेरा छाता है,
तब आकांक्षाओं का सहारा लेना ज़रूरी होता है।
जिंदगी के संघर्षों में उतार-चढ़ाव होते हैं,
बच्चों के सपनों की राहें कभी नहीं सुखी होती हैं।
पर जब आकांक्षाओं की उड़ान लग जाती है,
तब जिंदगी के सभी संघर्ष सहज हो जाते हैं।
हर सपने का नया रंग और सौंदर्य होता है,
जब उसे पूरा करने का अवसर मिलता है तो जीत का एहसास होता है।
आकांक्षाएं होती हैं तो समस्याओं के समाधान होते हैं,
अगर जीवन एक कवच की तरह हो तो आकांक्षाएं उसकी ताकत होती हैं।
इसलिए जब सपनों का सहारा लेना ज़रूरी होता है,
तब अपनी आकांक्षाओं से कभी हार नहीं मानना होता है।
आकांक्षाओं के संग जीवन की हर उड़ान सफल होती है,
जिंदगी की हर मुश्किल समझौते के द्वार से हल होती है।
जब आपकी आकांक्षाओं की नौ राहें हों,
तब जीवन के संघर्ष आपके लिए एक मात्र माध्यम हों।

गीत "काँटों की पहरेदारी
हमसे ही अनुराग-प्यार है,
हमसे मधुमास जुड़ा,
हम संवाहक सम्बन्धों के,
सबके मन को भाते हैं।

एहसास दिल का पिरो दी हूँ अल्फ़ाज़ों में
ग़र मुकम्मल मुहब्बत का दो तुम आसरा
तुझे दिल में नज़र में अपने बसा लूँगी मैं
माँगकर तुझको मन्नत में हमदम ख़ुदा से
नाम की तेरे मेंहदी हथेली में रचा लूँगी मैं ।

मिलन
अनंत से मिलन का यही तो परिणाम है 
कि वह हर जगह है 
हिमालय की गुफाओं में ही नहीं 
अंतर गह्वर में भी, क्योंकि 
भीतर ही काशी है भीतर ही कैलाश !

सुबह की पहली किरण - -
न जाने कितने ख़ानों में, बंट चुकी है अम्ल इंसानियत,
सरबराहों के गोशा ए दिल में पोशीदा इक शिकन सी है,
उजाले की चाहत में अंधेरों का है यूँ मुसलसल तआक़ब,
शगुफ़्ता गुलाब का ख़्वाब, सुबह की पहली किरण सी है,

सरमायेदार लगे हुए
एक तीली की लगाई आग शहर जलने लगा,
बेलगाम हुई आग  तमाशाई हजार  लगे  हुए।
कभी शर्म भी शर्माती होगी बेलाग बेशर्मी पर,
बेशर्मी की सलाहियत में सरमायेदार लगे हुए।

दोस्ती की दीवार..
यूँ छुपकर सुवासित करता अंबर, यूँ नेह की डोर में बँधा बोगनवेलिया, यूँ खतों के बटुए, यूँ लेट नाईट चाँदनी की आभा, यूँ उपमाओं के रेले, यूँ नेमत के बंडल्स..कुछ
तो है जो सेलफोन का पासवर्ड हो चला..
शुक्रिया मुझे सुनने का, मेरे ख्यालों को पकने के लिए उर्वरक जमीन देने का..
किस्सों की तरकश टंगी रहे दोस्ती की दीवार!

  धन्यवाद।

शनिवार, 8 अप्रैल 2023

3722... मसखरा

  हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

  वो जो मशहूरी मसखरा होगा, आंख सेे कंठ तक भरा होगा।

तुमने दफना दिया उसे लेकिन, वो अभी तक नहीं मरा होगा, 

मेरा चेहरा टपक गया है कहीं, आपके पास दूसरा होगा। हास्य कवि प्रदीप चौबे

मसखरा  सबकुछ सुगढ़-परिष्कृत ढंग से करता है

और क्रूरता का नया सौन्दर्यशास्त्र रचता है।

सर्कस का मालिक बन बैठा है मसखरा,

जनमत उसके साथ है

ऐसा बताने के गणितीय तर्क हैं उसके पास।

फिर भी व्यग्र-उद्विग्न है मसखरा

गम को खुशी बना दो तो कोई बात बने, तम को उजाला दे दो तो कोई बात बने,

बातें तो बहुत करते हो स्वर्ग की तुम, जमीं को जन्नत बना दो तो कोई बात बने- डॉ. रमेश धुंआधार

दुर्ग-नगर सरीखे इस विशाल बन्द सर्कस पण्डाल के बाहर

अभी निचाट सन्नाटा है, चिलकती धूप है

और यहाँ-वहाँ उठते कुछ धूल के बगूले हैं।

ऐसा भी होता है एक दिन

जब हम देखते हैं

मसखरों के हाथ में अमरूद की तरह अपनी दुनिया

मसखरे

दिखाते हैं अमरूद का करतब

हमें हँसाने के लिए

और हम डरना शुरू करते हैं

तरह तरह के खेल दिखाकर

उल्टा सीधा मुंह बना कर

कानों में चप्पल लटकाकर

छोटी सी एक पूंछ लगाकर

बच्चों का टट्टू बन जाऊं

जी करता जोकर बन जाऊं।

  जोकर का दर्द 

पर हंसी लाने की करनी है कल्पना।

ऐसे भावों की बनाना है तस्वीर,

खुशियों का मिल जाए खजाना।

कूची को दिए बिना विराम नित,

अपने आप ही करनी है साधना। 

जोकर

फ़िज़ाओं में जो ये खुशबू सी है आ बसी,

क्या गुजरा था मेरा महबूब कहीं इधर से होकर

आज आसमाँ से गायब हुआ है जो क़मर,

शायद रात छत पर मुस्कराया था वो आकर

>>>>>><<<<<<
पुनः भेंट होगी...
>>>>>><<<<<<
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...