कि अब मेरे पास कोई बात नहीं बची है
मेरे पास जो बचा है
वो इतना निजी है कि
उससे कोई बात नहीं बनाई जा सकती है
जीने और कहने के मध्य
मैं अटक गया हूँ एक खास बिन्दु पर
कल का विशेष अंक लेकर
आ रही हैं प्रिय विभा दी।
----
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
कल का विशेष अंक लेकर
आ रही हैं प्रिय विभा दी।
----
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
चित्र साभार:गूगल
जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के समय माइकल ओ ड्वाएर पंजाब का
लेफ़्टिनेंट गवर्नर था जो विरोधी स्वरों को कुचलने के लिए कुख्यात था जिसने अपनी
रिपोर्ट में सिर्फ़ 200
लोगों के मरने का ज़िक्र किया
था। ड्वाएर जनरल डायर के इस कुकृत्य को जाएज़ ठहराता था। पंजाब के युवक सरदार ऊधम सिंह ने
1933
में लंदन पहुँचकर माइकल ओ
ड्वाएर को मारने की योजना बनाई जिसे बख़ूबी उन्होंने 13 मार्च 1940 को अंजाम दिया।
ड्वाएर की हत्या के लिए क्रांतिकारी सरदार ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को फाँसी दी गई। हमारे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का
इतिहास बलिदानों से भरा हुआ है। हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी आज़ादी की रक्षा करें
और देश की एकता व अखंडता के लिए अनवरत समर्पित रहकर कार्य करें।
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
अपने पर ही आधारित रहूँगा
किसी को कुछ ना कहूं
यह कोई नहीं समस्या है |
पाने की हर बात भरम है
जो भी अपना मिला हुआ है,
बनने की हर आस भुलाती
हर उर भीतर खिला हुआ है !
करुणा के भूषण त्याग कर
यह कैसा धर्म प्रचार?
संस्कृतियों के घाट पर
अब होता व्यभिचार!
यह कैसा ढोंग-प्रलाप है
है कैसा यह संताप?
#हैसियतों के हिसाब से यहाँ #कायदा .
।।प्रातःवंदन।।
"आ गया हँसता हुआ यह प्रात,
मिट गई महिमा तुम्हारी रात !
शून्यता की गोद में था मैं पड़ा,
था नहीं कोई सहायक भी खड़ा।
दृष्टि जाती थी जिधर तम था वहां,
फूल के बदले बिछे कांटे यहां।
काट खाती थी भयानक रात,
आ गया हँसता हुआ यह प्रात !"
जनार्दन राय
लिजिए नवदिन की शुरुआत खास लिंकों के साथ,कि...
पुरुष के लिए
सफलता की सीढ़ी
बन जाती है...
वहीं...
प्रेम में पड़ा पुरुष
🔶
लघुकथा कलश का प्रयोगात्मक लघुकथा विशेषांक
2023 में प्रकाशित मेरी दो लघुकथाएं -
साथ ही योगराज प्रभाकर..
🔶
सादर अभिवादन
सादर अभिवादन
जय मां हाटेशवरी.....
आज मैंने CHat GPT को आदेश दिया.....
आकांक्षा पर कविता लिखें.....
क्योंकि आकांक्षा मेरी बेटी का नाम है.....
जो उसने लिखा....
आज की प्रस्तुती का शुभारंभ उसी से.....
जब सपनों के अंधेरे में अँधेरा छाता है,
तब आकांक्षाओं का सहारा लेना ज़रूरी होता है।
जिंदगी के संघर्षों में उतार-चढ़ाव होते हैं,
बच्चों के सपनों की राहें कभी नहीं सुखी होती हैं।
पर जब आकांक्षाओं की उड़ान लग जाती है,
तब जिंदगी के सभी संघर्ष सहज हो जाते हैं।
हर सपने का नया रंग और सौंदर्य होता है,
जब उसे पूरा करने का अवसर मिलता है तो जीत का एहसास होता है।
आकांक्षाएं होती हैं तो समस्याओं के समाधान होते हैं,
अगर जीवन एक कवच की तरह हो तो आकांक्षाएं उसकी ताकत होती हैं।
इसलिए जब सपनों का सहारा लेना ज़रूरी होता है,
तब अपनी आकांक्षाओं से कभी हार नहीं मानना होता है।
आकांक्षाओं के संग जीवन की हर उड़ान सफल होती है,
जिंदगी की हर मुश्किल समझौते के द्वार से हल होती है।
जब आपकी आकांक्षाओं की नौ राहें हों,
तब जीवन के संघर्ष आपके लिए एक मात्र माध्यम हों।
गीत "काँटों की पहरेदारी
हमसे ही अनुराग-प्यार है,
हमसे मधुमास जुड़ा,
हम संवाहक सम्बन्धों के,
सबके मन को भाते हैं।
एहसास दिल का पिरो दी हूँ अल्फ़ाज़ों में
ग़र मुकम्मल मुहब्बत का दो तुम आसरा
तुझे दिल में नज़र में अपने बसा लूँगी मैं
माँगकर तुझको मन्नत में हमदम ख़ुदा से
नाम की तेरे मेंहदी हथेली में रचा लूँगी मैं ।
मिलन
अनंत से मिलन का यही तो परिणाम है
कि वह हर जगह है
हिमालय की गुफाओं में ही नहीं
अंतर गह्वर में भी, क्योंकि
भीतर ही काशी है भीतर ही कैलाश !
सुबह की पहली किरण - -
न जाने कितने ख़ानों में, बंट चुकी है अम्ल इंसानियत,
सरबराहों के गोशा ए दिल में पोशीदा इक शिकन सी है,
उजाले की चाहत में अंधेरों का है यूँ मुसलसल तआक़ब,
शगुफ़्ता गुलाब का ख़्वाब, सुबह की पहली किरण सी है,
सरमायेदार लगे हुए
एक तीली की लगाई आग शहर जलने लगा,
बेलगाम हुई आग तमाशाई हजार लगे हुए।
कभी शर्म भी शर्माती होगी बेलाग बेशर्मी पर,
बेशर्मी की सलाहियत में सरमायेदार लगे हुए।
दोस्ती की दीवार..
यूँ छुपकर सुवासित करता अंबर, यूँ नेह की डोर में बँधा बोगनवेलिया, यूँ खतों के बटुए, यूँ लेट नाईट चाँदनी की आभा, यूँ उपमाओं के रेले, यूँ नेमत के बंडल्स..कुछ
तो है जो सेलफोन का पासवर्ड हो चला..
शुक्रिया मुझे सुनने का, मेरे ख्यालों को पकने के लिए उर्वरक जमीन देने का..
किस्सों की तरकश टंगी रहे दोस्ती की दीवार!
हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
वो जो मशहूरी मसखरा होगा, आंख सेे कंठ तक भरा होगा।
तुमने दफना दिया उसे लेकिन, वो अभी तक नहीं मरा होगा,
मेरा चेहरा टपक गया है कहीं, आपके पास दूसरा होगा। हास्य कवि प्रदीप चौबे
मसखरा सबकुछ सुगढ़-परिष्कृत ढंग से करता है
और क्रूरता का नया सौन्दर्यशास्त्र रचता है।
सर्कस का मालिक बन बैठा है मसखरा,
जनमत उसके साथ है
ऐसा बताने के गणितीय तर्क हैं उसके पास।
फिर भी व्यग्र-उद्विग्न है मसखरा।
गम को खुशी बना दो तो कोई बात बने, तम को उजाला दे दो तो कोई बात बने,
बातें तो बहुत करते हो स्वर्ग की तुम, जमीं को जन्नत बना दो तो कोई बात बने- डॉ. रमेश धुंआधार
दुर्ग-नगर सरीखे इस विशाल बन्द सर्कस पण्डाल के बाहर
अभी निचाट सन्नाटा है, चिलकती धूप है
और यहाँ-वहाँ उठते कुछ धूल के बगूले हैं।
ऐसा भी होता है एक दिन
जब हम देखते हैं
मसखरों के हाथ में अमरूद की तरह अपनी दुनिया
मसखरे
दिखाते हैं अमरूद का करतब
हमें हँसाने के लिए
और हम डरना शुरू करते हैं
तरह तरह के खेल दिखाकर
उल्टा सीधा मुंह बना कर
कानों में चप्पल लटकाकर
छोटी सी एक पूंछ लगाकर
बच्चों का टट्टू बन जाऊं
जी करता जोकर बन जाऊं।
पर हंसी लाने की करनी है कल्पना।
ऐसे भावों की बनाना है तस्वीर,
खुशियों का मिल जाए खजाना।
कूची को दिए बिना विराम नित,
अपने आप ही करनी है साधना।
फ़िज़ाओं में जो ये खुशबू सी है आ बसी,
क्या गुजरा था मेरा महबूब कहीं इधर से होकर
आज आसमाँ से गायब हुआ है जो क़मर,
शायद रात छत पर मुस्कराया था वो आकर