निवेदन।


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शनिवार, 7 जनवरी 2017

540 .... गीत




सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष


क्या कोई सही सही बता सकता है

प्रेम की वज़ह







सुबो से शब तक की

कहानी







सब कहते, बोलते नहीं


सच







जीत जाओगे गर गुनगुना सको


गीत








भावना मिश्रा की

कविता








फिर मिलेंगे ..... तब तक के लिए

आखरी सलाम

विभा रानी श्रीवास्तव








शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

539...क्या सारी ग़लती स्कर्ट और जींस की है ?

 सुप्रभात  दोस्तो
     नव वर्ष  की  शुभकामनाये
दोस्तो परीक्षा  होने के  कारण  मै लम्बे समय  से ब्लॉग  पर  नही आ सका । परीक्षा  के  बाद शिक्षा  सम्बल  कार्यक्रम  के  साथ जुड  गया  इसलिए  कुछ  समय  वहा  पर  काम किया  । आप मेरे अनुभव  यहा क्लिक  कर  पढ सकते है  ।
अभी देश मे जो बडे  शहरो मे घटित  हो  रहा  है  वो बहुत  शर्मनाक  है  । जिस देश मे नारी को देवी  का रूप  माना जाता  है उस देश मे ऐसी घटना कलंक के समान  है । बेंगलुरु  ,  दिल्ली और राजस्थान  के  चूरू मे जो हुआ  वो निश्चित  ही  मन को आहत  करने  वाला है  ।  अब नारी  को  आगे आना होगा तभी ऐसी  घटना  थमेगी  ।  
हर दिन सड़को पर मचली जाती हो ।
सिर्फ सिसकियाँ भर रह जाती हो ।।
फिर भी कहती अबला नही, हम है सबला ।
क्यों ओढ रखा है कायरता पर वीरता का चौला ।।
                  read  more  click. .....

आइए अब चलते है  आज की पाँच लिंको  की ओर .....


अपनी माटी गीत सुनाती, गौरव और गुमान की।
दशा सुधारो अब तो लोगों, अपने हिन्दुस्तान की।।

खेतों में उगता है सोना, इधर-उधर क्यों झाँक रहे?
भिक्षुक बनकर हाथ पसारे, अम्बर को क्यों ताँक रहे?


      क्या तस्वीरें बोलती हैं

क्या तस्वीरें बोलती हैं
हाँ तस्वीरें बोलती हैं
मैंने उन्हें बोलते हुए
देखा भी है , और सुना भी है
उनकी असीम गहराई को
बहुत करीब से –
देखा भी है , और
महसूस भी किया है 

    

            कुछ रंग इनके भी


जानी बाबू और युसूफ आजाद काफी बड़े कव्वाली गायक रहे हैं.लेकिन जानी बाबू का एक नज्म जो बहुत चर्चित नहीं हो सका वह मेरे दिल के बहुत करीब है....

खिलौनों की बारात गुड़ियों की शादी
तेरा शहजादा मेरी शहजादी
तुझे याद हो या न हो लेकिन
मुझे याद आते हैं बचपन के वो दिन

मुझे मोहित चौहान तबसे पसंद रहे हैं जबसे 90 के दशक में उनके बैंड सिल्क रूट का एलबम बूँदें निकला था.
इसका एक गीत तो मुझे आज भी बहुत पसंद है.....

डूबा-डूबा रहता हूँ
आँखों में तेरी
दीवाना बन गया हूँ
चाहत में तेरी

    
      

क्या सारी ग़लती स्कर्ट और जींस की है ?

          
नए साल में अच्छा लिखने मन था
पर यहाँ सब कुछ वैसा ही पुराना है।
वही सड़क,वही सोच,वही वहशीयत
बहूदगी छुपाने का भी वही बहाना है।।

ओछापन सोच से परे होता जा रहा
पता नहीं चलता कि ये कैसा दौर है?
इंसानों के बीच ही रहते हैं हम न या
इंसान की शक्ल में ये कोई और हैं?

      

          अस्तित्व

हर माता - पिता के लिए उसकी संतान अमूल्य वरदान होती है , जिसके जीवन को वह अपने हाथों से सजाते  व पूर्ण जिम्मेदारी के साथ उनका ख्याल रखते हैं। एक पल भी अपने आप से जुड़ा नहीं होने देते हैं। अपने संतान की छोटी से छोटी जरूरत को पूरा करना अपना उत्तरदायित्व समझते हैं। और उनको बड़ी से बड़ी फरमाईश को पूरा करने में जी जान लगा देते हैं। संतान के आँखों में एक आँसू का कतरा भी आये ऐसा उन्हें गवारा नहीं होता।  यहाँ मैं आप सभी से पूछना चाहती हूँ ,


 दोस्तो 
         धन्यवाद  

आपका  विरोध सिंह  सुरावा


गुरुवार, 5 जनवरी 2017

538...कविता बकवास नहीं होती है बकवास को किसलिये कविता कहलवाना चाहता है-

जय मां हाटेशवरी...

हम अपने बच्चों को...
मुगलों का इतिहास रटाते हैं...
सिख गुरुओं को भूलाकर...
अकबर को महान बताते हैं...
बच्चों को अगर पढ़ाया  होता....
इतिहास सिख गुरुओं का...
भारत का हर बच्चा होता...
बंदा सिंह भादुर सा...
सिखों के दसवें और अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह का प्रकाशोत्सव आज 5  जनवरी 2017  को मनाया जा रहा है। इनका जन्म 1666 ई में बिहार के पटना शहर में हुआ था।
पिता गुरु तेग बहादुर की मृत्यु के बाद 11 नवंबर 1675 को वे गुरु बने। उन्होंने 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की।
जब इनके चार पुत्र शहीद हो गये तो...
माता गुजरी उदास थी और गुरु गोविंद सिंह जी ने उनसे दुखी न होने के लिये कहा...
उनसे केवल यही कहा...
सारे भारत की जंता ही हमारी संतान हैं...
  इन पुत्रन के शीश पर वार दिये सुत चार ।।
चार मुए तो क्या हुआ जीवत कई हजार ।।
अब पेश है...आज की चयनित कड़ियां...
कविता बकवास नहीं होती है बकवास को किसलिये कविता कहलवाना चाहता है-
कहीं
ना कहीं
कुछ ना
कुछ ऐसा
 हो जाता है
जो
ध्यान
भटकाता है
और
लिखना
लिखाना
शुरु करने
से पहले ही
कभाड़ हो
जाता है
राजनीति का खेल
कौन तुम्हारा मित्र है, याद किसे उपकार
अब सब उसके साथ हैं, जिसकी है सरकार !
सत्ता का यह रूप भी, है कितना बलवान
उगते सूरज को सभी, करते मिले प्रणाम !
श्रीराम का लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिए प्रयत्न करना
नहीं सुमन्त्र हैं साथ हमारे, रात्रि प्रथम जनपद के बाहर
उत्कंठित किंचित न होना, नगर की सुख-सुविधा न पाकर
तज आलस्य आज से हमको, रात्रि में जागना होगा
योगक्षेम सीता का क्योंकि, हमको ही पालना होगा
तिनकों, पत्तों की शय्या पर, संग्रह किया जिन्हें हमने ही
बिछा के भू पर सो लेंगे हम, फिर लक्ष्मण से यह बात कही
दुःख से सोये होंगे राजा, किन्तु सुखी होगी कैकेयी
महाराज को हत न कर दे, भरत को आया देख कहीं
फूल (हाईकू )
फूलों से सजी
कौमलांगी दुल्हन
सजा मोगरा |
लड़कियों के घर नहीं होते.........शकुंतला सरुपरिया-
बड़ी नाजुक मिजाजी है, बड़ा मासूम दिल इनका
जो थोड़ी खुदगरज होतीं, किसी के डर नहीं होते
कभी का मिलता हक इनको सियासत के चमन में भी
सियासत की तिजारत के जो लीडर सर नहीं होते
लड़कियों की धड़कनों पे निगाहें मां की भी कातिल
कोख में मारी न जातीं जो मां के चश्मेतर होते  

आज बस इतना ही...
कल उमीद है...
काफी समय बाद भाई विराम सिंह जी...
अपनी पसंद पेश करेंगे...
धन्यवाद।

















बुधवार, 4 जनवरी 2017

537...दिल कहता है रोएँ लेकिन हँसना पड़ता है

जय मां हाटेशवरी...

सर्वप्रथम मैं नमन करता हूं...
लुई ब्रेल जी को...उन के   पावन जन्म दिवस पर...
जिन्होंने अनगिनत  दृष्टिहीनों के जीवन में...
ब्रेल के प्रकाश से...
ज्ञान के दीपक जलाए...
  कभी कभी इतनी धुंधली हो जाती है तस्वीरें
पता नहीं चलता कदमों में कितनी हैं ज़ंजीरें
पाँव बंधे होते हैं लेकिन चलना पड़ता है
दिल कहता है रोएँ लेकिन हँसना पड़ता है
आज एक बार फिर मैं ही...
कुछ चुनी रचनाएं लेकर उपस्थित हूं...


नया साल आया है
आँचल में अधिकार मिले
अटल रहे अहिवात
कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-33
अपनी तलाश पर निकलूं,
भी तो क्या फायदा...
तुम बदल गये हो...
खो गये होते तो...
कुछ और बात होती...
 नायब सूबेदार बाना सिंह की ६८ वीं वर्षगांठ-
हमेशा की तरह अतिक्रमण और उकसाने वाली कार्यवाही पाकिस्तान द्वारा ही यहाँ भी की गई। पहले तो उसने सीमा तय होते समय 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जो भारत का होता
उसे चीन की सीमा में खिसका दिया। इसके अलावा वह उस क्षेत्र में विदेशी पर्वतारोहियों को और वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए बाहर के लोगों को भी बुलवाता रहता है,
जब कि वह उसका क्षेत्र नहीं हैं। इसके अतिरिक्त भी उसकी ओर से अनेक ऐसी योजनाओं की खबर आती रहती है जो अतिक्रमण तथा आपत्तिजनक कही जा सकती है। यहाँ हम जिस प्रसंग
का जिक्र विशेष रूप से कर रहे हैं, वह वर्ष 1987 का है। इसमें पाकिस्तान ने सियाचिन ग्लेशियर पर, भारतीय सीमा के अन्दर अपनी एक चौकी बनाने का आदेश अपनी सेनाओं
को दे दिया। वह जगह मौसम को देखते हुए, भारत की ओर से भी आरक्षित थी। वहाँ पर पाकिस्तान सैनिकों ने अपनी चौकी खड़ी की और 'कायद चौकी' का नाम दिया। यह नाम पाकिस्तान
के जनक कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना के नाम पर रखा गया था।
फल -महिमा -दोहे-
पपीता बहुत काम का, कच्चा खाने योग्य |
पक्का खाओ प्रति दिवस, है यह पाचक भोज्य ||
खट्टा मीठा रस भरा, अच्छा है अंगूर |
खाओ संभल के इसे, अम्ल कारी प्रचूर ||
मीठा होता सन्तरा, ज्यों अंगूर-शराब |
रस इसका खुल पीजिये, पाचन अगर ख़राब ||
नए साल से दो बातें
प्यार-भरे दिल
तोड़े
उनको भी समझाना ।
फूल खिलाते
रहे जो भी
सपनों में भी
उनको
हरदम गले लगाना।
जीवन को साकार करें...
सीमित को अपना कर
जीवन के लय में बह कर
जीवन का सत्कार करें
जीवन को साकार करें!
दशमेश पिता तेरी दुनियाँ में-
तेरे त्याग दया करुणा बल की
नित ज्योति जले इस दुनियाँ में-
आपे ही गुरु, आपे ही चेला
नव -रीत बनाई दुनियाँ में-
चहुं ओर दिगंत  मही जैकारे
क्या सरदार बनाई दुनियाँ में -


आज बस इतना ही...
कल फिर मिलुंगा...
धन्यवाद।


 










मंगलवार, 3 जनवरी 2017

536....आओ, नूतन वर्ष मनाएं ...आओ, नूतन वर्ष मनाएं ...

जय मां हाटेशवरी...

आज 3 जनवरी है...
नया वर्ष भी अब पुराना हो चला है...
...सोचा था कुछ नया होगा...
...इस नये साल में...
कहाँ तितलियाँ हैं, हुए गुम परिंदे
फिज़ाओं में किसने ज़हर घोल दी है
उधर कोई बस्ती जलायी गई है
धुँआ उठ रहा है, ख़बर सनसनी है
चला छोड़ हमको ये बूढ़ा दिसम्बर
किसी अजनबी सा खड़ा जनवरी है
अब पेश है...पिछले कल की रचनाएं...


आओ, नूतन वर्ष मनाएं ...
अपने तो सदा अपने हैं
गैरों को भी मीत बनाएं
आओ, नूतन वर्ष मनाएं  
नए-नए रंग हों नई उमंगें
नयनों में उल्लास जगाएं
आओ, नूतन वर्ष मनाएं
कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री ‘लोक कवि रामचरन गुप्त’ के चर्चित ‘देशभक्ति के गीत’-
चलायें डट कर गोली, खून से खेलें होली।
पीछे कदम न होगा जब तक सांस हमारी
दे दें जान वतन की खातिर भारत भू है प्यारी
अपना नारा हिन्द हमारा सुनें सभी श्रीमान
चलायें डटकर गोली, खून से खेलें होली।
एक-एक कतरा खूं का है बारूदी गोला
अरि के निशां मिटा देंगे हम पहन बसंती चोला
अति बलशाली वीरमयी है अपना हिन्दुस्तान
चलायें डटकर गोली, खून से खेलें होली।
नववर्ष का दिनमान
खिड़कियों से झाँकती, नव
भोर की पहली किरण है
और अलसाये नयन में
स्वप्न में चंचल हिरण है।
गंध पत्रों से मिलाने
दिन, नया जजमान आया।
सोचता हूँ...................-
तुम्हें भर दूँ ;
अपने मन की भावों के संग
फिर मैं हो जाऊँगा
पूर्ण
विजय
गत्यावरोध-
दीपक रीता हो चला है
 पर रात अभी बहुत बाक़ी है
महक हरश्रंगार की बता रही है
श्वेत चादर बिछाना बाक़ी है |
धन्यवाद।














सोमवार, 2 जनवरी 2017

535.....थोड़े समय में देख भी ले बेवकूफ कौन क्या से क्या हो जा रहा है

सादर अभिवादन
नूतनवर्षाभिनन्दन
नव वर्ष शुभ हो
सहन किया वर्ष सोलह को
इसे भी कर लेंगे
सहनशील होते हैं...हम भारतीय..
काफी से अधिक....सहते रहते हैं...

आज की चुनिन्दा रचनाओं के अंश....

तन-मन में रहे सदा, माटी की सौंधी गंध
कर्मों में गूंजे सदा, भारतीयता के छंद
जन-जन से हो उल्लास, प्रेम के अनुबंध
नववर्ष में महक उठे, घर-घर ये मकरंद

बेईमानी से उसे कोख में पहचाना गया 
फिर किसी जख़्म की मानिंद कुरेदा भी गया 
अनगढ़े हाथों को, पैरों को कुचल काटा गया 
नैनों को, होंठो को, गालों को नोंचा भी गया 

हम काले रंग को कुरुपता का प्रतीक मानते है। इसकी असली वजह 
अलग-अलग रंगों से जुड़ी हमारी भ्रांतियां है। इसी सोच की बदौलत 
“धूप में निकला न करो रुप की रानी...”, “गोरी है कलाइयां...” जैसे गानों की भरमार हैं और “मोहे श्याम रंग दई दे...” 
जैसी कविताएं इक्का-दुक्का ही नजर आती है।

ये जो तेरे दिल में उनकी मोहब्बत है
ये तेरे मेहबूब की इक अमानत  है 
जिसकी हर एक सांस है तेरे खातिर 
ये भी खुदा की इक बड़ी इबादात है 


आज का शीर्षक..
उसकी अपनी खुद 
की बनाई हुई सब 
नजर आती हैं 
किसी ने कभी उसे 
क्यों नहीं टोका कि 
इतने सारे अवतार 
क्यों अपने वो बनाये
जा रहा है 
हर दूसरे को छोड़ 
तीसरा अपने आप को 
उसका ही आदमी 
एक बता रहा है 

आज्ञा दें यशोदा को
सादर





  




रविवार, 1 जनवरी 2017

534...स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष! तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।

जय मां हाटेशवरी...



आप सभी को नूतन वर्ष 2017 की शुभकामनाएं...
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिये,
इस महा जागरण के युग में
जाग्रत जीवन अभिमान लिये;
दीनों दुखियों का त्राण लिये
मानवता का कल्याण लिये,
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।
संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
की ज्वालाओं के गान लिये,
मेरे भारत के लिये नई
प्रेरणा नया उत्थान लिये;
मुर्दा शरीर में नये प्राण
प्राणों में नव अरमान लिये,
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!
युग-युग तक पिसते आये
कृषकों को जीवन-दान लिये,
कंकाल-मात्र रह गये शेष
मजदूरों का नव त्राण लिये;
श्रमिकों का नव संगठन लिये,
पददलितों का उत्थान लिये;
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!
सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
मद का चिर-अवसान लिये,
दुर्बल को अभयदान,
भूखे को रोटी का सामान लिये;
जीवन में नूतन क्रान्ति
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये,
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!
सोहनलाल द्विवेदी

अब पेश है...चयनित कड़ियां...


वह साल गया, यह साल चला.....हरिवंशराय बच्चन
मित्रों ने हर्ष-बधाई दी
मित्रों को हर्ष-बधाई दी
उत्तर भेजा, उत्तर आया
'नूतन प्रकाश', 'नूतन प्रभात'
इत्यादि शब्द कुछ दिन गूंजे
फिर मंद पडे, फिर लुप्त हुए
फिर अपनी गति से काल चला;
वह साल गया, यह साल चला।


मुदित मन से आ रहा नव वर्ष है-
दर्द दुःख की कालिमा से मुक्त हो
उदित हो सूरज क्षितिज के भाल पे
उल्लसित हो थिरकने वसुधा लगे
मुग्ध हो संसृति प्रकृति की चाल पे !
बह चले गंगा पराई पीर से
पिघलता हो मन किसी बदहाल पे
जंग और आतंक की बातें न हों
शुभाशंसा हो लिखी हर भाल पे !

आनेवाली मुस्कराहटों ...-
बस जरा सा..
हँसते हुए ख्वाबों ने कान के पास आकर हौले से बोला..
क्या जाने कल क्या हो?
कोमल मन के ख्याल अच्छी हि होनी चाहिए..।

आओ खेलें झूठ सच खेलना भी कोई खेलना है-
किसी
एक झूठे
के
बड़े झूठ
ने ही
जीतना है

झूठों में
सबसे
बड़े झूठे
को
मिलना
है ईनाम
किसी
नामी
बेनामी
झूठे
ने ही
खुश
हो कर
अन्त में
उछलना है

भुला नहीं देना जी भुला नहीं देना-
वैसे काफी पहले से ही मोबाईल,लैपटॉप,डेस्कटॉप आदि ने संगीत उपकरणों की जगह लेनी शुरू कर दी थी,रही सही कसर इंटरनेट पर मौजूद गीतों,गजलों का भरपूर संग्रह भी
इसका एक कारण हो सकता है.आने वाले समय में तकनीक का और विस्तार हो सकता है लेकिन संगीत प्रेमियों के लिए संगीत का खजाना तब भी बदस्तूर जारी रहेगा.
इन कैसेटों पर नजर जाती है तो लगता है ये कह रही हों.........
भुला नहीं देना जी भुला नहीं देना
जमाना ख़राब है दगा नहीं देना

         नववर्ष ( गीत ).....नीलेन्द्र शुक्ल
         नवजीवन हो नये वर्ष में
         भरे सदा उजियारा ।
        रहे सदा उत्तुड़्ग श्रृड़्ग
        पर भारतवर्ष हमारा ।।

आकांक्षा...संध्या शर्मा-
और मैं
पलकें बंद करके
डूबी रहूँ
प्रीत की गहराईयों में ....

धन्यवाद।






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