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बुधवार, 22 नवंबर 2017

859.. थोड़ा नज़र अंदाज करें और आगे बढ़ जाए..

२२ नवम्बर २०१७
।।उषा स्वस्ति।।

कभी-कभी ऐसी भी बातें होती है..
जब केवल
देखें, समझे, मुस्कराएं थोड़ा नज़र अंदाज करें
और आगे बढ़ जाए..
इसलिए सीधे
आज की रोचक लिंकों की चर्चा में आप सभी सुधीजनों के समक्ष 
ब्लॉग पर बिखरे गए मोतियों को पिरोने की कोशिश..


आप सभी शौक से आनंद ले..




एक दिन बंद दरवाज़ों से निकलेगी ज़िन्दगी  
सुबह की किरणों का आवाभगत करेगी  
रात की चाँदनी में नहाएगी 


चल निगोड़े
मेरी उम्र चालीस के पास पहुंच रही थी उस वक्‍त। आपको ख्‍याल नहीं था। चंदा भाभी को भी ख्‍याल नहीं रहा होगा। मुझे याद नहीं भाभी ने न जाने क्‍या मजाक किया था, आपकी मुस्‍कराहट याद है बस, और याद है वह जवाब जो मैंने उस वक्‍त दिया था। चंदा भाभी नहीं जानती थी कि




निनानवे 

शरीफ 

होते हैं

उनको 


होना ही 

होता है 

होता वही है 


जो वो चाहते हैं 


“साहब, यह काम हो ही नहीं पाएगा।” एक सप्ताह की प्रतीक्षा के बाद 
पधारे ठेकेदार ने कार्यालय में घुसते ही अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।
अरे, आप जैसा होशियार और सक्षम ठेकेदार ऐसी बात कैसे कह सकता है? 
मैंने तो सुना है आप बहुत बड़े-बड़े ठेके लेकर सरकारी काम कराते रहते हैं।
 तमाम सरकारी बिल्डिंग्स और दूसरे निर्माण और साज-सज्जा के काम आपकी 
विशेषज्ञता मानी जाती है।


मैं प्यास हूं, तुम तृप्ति हो 
मैं दीप हूं, तुम दीप्ति हो।
मैं दिवस और भोर तुम 
हो मेरे चित की चोर तुम।


हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर 
अपने अपने घर पहुँचना चाहते 


हम सब ट्रेनें बदलने की 
झंझटों से बचना चाहते 
हम सब चाहते एक चरम यात्रा 



लफ्ज़ों को शक्लों में जरूर ढाले
सफर की मंजिल खुशनुमा होगी..
।।इति शम।।
धन्यवाद
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