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बुधवार, 1 नवंबर 2017

838..संभावना की आपार झलक में खोना..

।। उषा स्वस्ति।।

आज नवम्बर महीने का पहला दिन और हफ्ते का तीसरा  दिन
 यानि बुधवार है
आप सभी पाठकगन यही सोच रहे होगें इसमें 
नई बात क्या है?
दिनांकः को उल्लेख करने का तात्पर्य यह कि
'' समय और साहित्य ''
किसी का इंतजार  नहीं करते कभी- कभी अल्पकालिक
 अर्द्ध - विराम प्रतीत
 होता पर विराम नहीं।

"बड़ी मिलती जुलती सी बातें है 
दोनों में
इन्हें पलटकर देखना
संभावना की आपार झलक में खोना
बड़ा अच्छा लगता है.."

आज तम्हीद  की जरूरत ही नहीं हो रही..✍

रूबरू होते हैं  लिंकों के माध्यम से 
आज के रचनाकारों के नाम
 इस प्रकार से...

 आदरणीया रश्मि प्रभा जी,
शालिनी कौशिक जी, आदरणीय अंशु माली रस्तोगी जी,
आदरणीय डा प्रवीण चोपड़ा जी और 
अपर्णा बाजपेयी जी 

🔗यदि तुम चाहो !!!




बैठो

कुछ खामोशियाँ मैं तुम्हें देना चाहती हूँ

वो खामोशियाँ

जो मेरे भीतर के शोर में

जीवन का आह्वान करती रहीं

ताकि

तुम मेरे शोर को पहचान सको

अपने भीतर के शोर को


http://shalinikaushik2.blogspot.in/2017/10/blog-post_28.html?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed:+blogspot/TxmJU+(kaushal)&m=1


पड़ोस में आंटी की सुबह सुबह चीखने की आवाज़ सुनाई दी ....
''अजी उठो ,क्या हो गया आपको ,अरे कोई तो सुनो ,देखियो क्या हो गया इन्हें ...'' हालाँकि हमारा घर उनसे कुछ दूर है किन्तु सुबह के समय कोलाहल के कम होने के कारण उनकी आवाज़ 

ऑफलाइन ही नहीं लगा करती, सोशल मीडिया पर भी लगती है। 
सोशल मीडिया पर लगी फेस्टिव सेल तरह-तरह के शुभकामना संदेशों से 
भरी पड़ी रहती है। पांच-सात तरह के शुभकामना संदेश एक-दूसरे को खूब 
व्हाट्सएप्प किए जाते रहते हैं।

🔗मां की रसोई मां की तरह एक ही होती है!

आज   कल  पब्लिक को इमोशनल ब्लेकमेल किया जाता है ... 
शहर में कितने ही होटल-स्टरां जिन का नाम ..मां की रसोई ... 
कईं जगहों पर मैंने ढाबे देखे ...जिन का नाम था .. हांडी... 
पता नहीं पंजाब में किसी ने कुन्नी के बारेे में सोचा कि नहीं..

भूख से नहीं मर रहे बच्चे, रिक्शा चालाक और मजदूर,
तब सड़क पर खड़े एक भिखमंगे ने 
फेंक दिया था खोलकर 
अपने शरीर पर बचा 
एक मात्र अधोवस्त्र,
खड़ा हो गया था नंगा 
शासन के ख़िलाफ़!

  शब्दों द्वारा संवाद  बनाए रखे 


।।इति शम।।
पम्मी सिंह
धन्यवाद..✍
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