सादर अभिवादन
अब सिर्फ कहानी ही नहीं अब कविताएं भी
सादर आमंत्रित है
अगला अंक 16 अगस्त 26 को
इसके लिए रचना प्रेषण तिथि 14 अगस्त 26 तक
नया विषय है
आजादी, स्वतंत्रता, उड़ान
पिछला अंक देखिए
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मैंने उसे बहुत तलाशा। जैसे पति-पत्नी के बीच की तीसरी औरत। उसके होने का पूरा अंदेशा है, लेकिन…लेकिन वो मिलती ही नहीं। हर बार उसकी तलाश में जाती हूँ और उसकी जगह ख़ुद को वहाँ पाती हूँ। क्या मैं ही वो औरत हूँ जिसके साथ मेरे पति का विवाहेतर संबंध है? वो मुझे घर पर छोड़ कर, मुझसे ही मिलने घर से बाहर जाता है।
उन्होंने कहा, दिन है
तुम दिन कहो
ये मत कहो कि सूरज नहीं निकला
सूरज तो बादल में भी नहीं दिखता
क्या उसे रात कह देते हो?
खारिज हो गयी न दलील?
उसने
एक लिफाफा
थमाया था मुझे।
कहा—
"इसमें
मेरे दिल की वसीयत है,
जो तुम्हारे नाम है।"
क्योंकि आधा प्रेम
ख़ुदा तक नहीं पहुँचता,
वो बस दिल को
थका देता है।
डालियों पर फूल अटके
शूल भी आँखों को खटके
नर्म कोमल सी हथेली
टहनियो को यहा चुभोई
बिन रूह जिस्म को भा गयी तंग गलियाँ इसके आँगन को l
दागों अनगिनत पैबंद कढ़ी इसके एकांकी एकांत साये को ll
किनारा कर आसमाँ आँचल बाँध दिया रोती बारिश यादों तन्हाई को l
टकरा काँच दीवारों से थम गया शोर इसका उफनते बारिश पानी को ll
झूठ की दुनिया जीते हम
लोग होता है जब साबका यथार्थ से
सारे पर्दे हट जाते हैं
सारी धुंध छंट जाती है
हर नकाब उतर जाता है
अपनेपन और परायेपन का
दोस्तियों का
दुश्मनी का
आज रचनाएंं अधिक है
झेल लीजिएगा
आज रचनाएंं अधिक है
झेल लीजिएगा
सादर समर्पित
सादर वंदन





