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शनिवार, 30 अगस्त 2025

4496...आइना पूछता है मुस्कुराहटों के पीछे का रहस्य...

शीर्षक पंक्ति:आदरणीय शांतनु सान्याल जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

शनिवारीय अंक में पढ़िए ब्लॉगर डॉट कॉम पर प्रकाशित रचनाएँ-

आरती श्री गणपति की मैं गाऊँ

सब जग का जिसे कारण पाऊं

आरती श्री गणपति की मैं गाऊँ।
स्वनंदेश परब्रह्म कहाए
दर पे जिसके सब शीश नवाए,
सब के हृदय में जिसको पाऊं
आरती उस गणपति की मैं गाऊँ   
*****
वर्ण पिरेमिड - पधारो जी महाराज

मैं

आई

शरण

विनायक

रखना लाज

ओ पालनहारे

निर्गुण और न्यारे 

तुम्हीं हो विघ्न हर्ता

जगत के स्वामी

हो अन्तर्यामी

सारी पीड़ा

भक्तों की

हर

लो

***** 

शर्तहीन - -

*****“बरसात की खामोशी”

कहीं छतों की टप-टप,

तो कहीं गलियों का सन्नाटा।

भीगी हुई मिट्टी की खुशबू में,

कुछ कहानियाँ दबी हुई हैं।

*****

पुस्तक परिचय/समीक्षा- 'बीत गया है जैसे युग' (ग़ज़ल-संग्रह)

साहित्यकार के सृजन के पीछे कोई न कोई प्रेरणा अवश्य रही होती है। वह प्रेरणा प्रेमी/प्रेमिका, घर- परिवार,समाज या देश की स्थिति, कहीं से भी प्राप्त हो सकती है। इस प्रेरणा को आधार बनाकर अपने गहन चिंतन की उड़ान से लेखक /कवि बड़े-बड़े गद्य और काव्य ग्रंथों की रचना कर देते हैं। आज हम ऐसे ही एक वरिष्ठ कवि के रचनाकर्म से आपको रूबरू कराना चाहते हैं जिन्होंने अपनी धर्मपत्नी के असामयिक निधन से उपजी पीड़ा को आधार बनाकर विरह भावनाओं पर 'बीत गया है जैसे युग' शीर्षक से एक बहुत मार्मिक ग़ज़ल संग्रह का सृजन किया है। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूं रुड़की ,उत्तराखंड निवासी वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेंद्र कुमार सैनी साहब की। *****फिर मिलेंगे। रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 22 मई 2025

4496...इच्छाएँ सस्ती थी, ज़रूरते महंगी...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया विभा ठाकुर जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

कविता | कुछ लोग | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कुछ लोग नहीं जानते

कि क्या खो रहे हैं वे!

*****

सत्य दम तोड़ रहा है

मैंने देखा है

सत्य को न केवल

पराजित होते

बल्कि

दम तोड़ते

हुए भी

*****

1464-तुम मिल गए

हुई धक-धक
आज भी
सोच के सहन में लगे
देह के पेड़ की टहनी पर
बहुत देर से बैठा
यादों का पंछी
उड़ गया
काँप गई
रोम- रोम की पत्ती

*****

प्रतिक्रिया

वक्त कम था अरमान बड़े थे

इच्छाएँ सस्ती थी, ज़रूरते महंगी

एक को चुना तो दूसरी हाथ से फिसल जाती

दूसरे को पकड़ना चाहा तो

पहली आँख से ओझल हो गयी

*****

अभिनय करते हैं मेरे शब्द

उनके आकर्षण से

शब्द बादल बन बरसते हैं

मन की घाटी से तब

शब्दों के धार निकलते हैं

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


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