शीर्षक पंक्ति: आदरणीया नूपुरमं जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं गुरुवारीय अंक की पाँच रचनाएँ-
सिद्ध होगी तब सच्ची स्वतंत्रता
जब हिंदुस्तान का हर एक बच्चा
सङकों पर बेचता ना भटकेगा
गर्व से स्कूल में फहराएगा तिरंगा!
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ईश्वर,
अपने विवेक का इस्तेमाल करना,
अपनी स्तुति पर मत रीझना,
प्रार्थना से मत पिघलना,
ज़रूरत से थोड़ा कम देना,
बस उतना ही
कि मैं छीन न सकूँ
किसी और का हक़,
बना रहूँ मनुष्य।
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हरियाली से भरे झुरमुट
और पंछियों के कलरव में
एक सुंदर कविता से आगाज़ हुआ
हर दिल में सुकून जागा
और कुदरत के साथ
होने का अहसास हुआ!
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वन सघनों की हरियाली,
जितना मन बहलाती है,
गाड़ गदनों की कल-कल छल-छल,
जितना मन को भाती हैं,
मर्म इनके जानने हैं तो
उकाळ उंदार नापना होता।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
