सादर नमस्कार
देवी जी को ज़ियादा खुशी बर्दाश्त नही हुई
कहीं से पकड़कर बुखार ले आई
चलिए आया है तो चला ही जाएगा
आना-जाना लगा ही रहता है
रचनाएं देखें ..
हँसे खेत खलिहान सब,इस मौसम बरसात में।
पाकर प्रेम फुहार को,भीगे भाव प्रपात में।।
चूल्हा सीला देखता,कब उसमें भी आग हो
जब निर्धन की झोपड़ी,टप-टप टपके रात में।।
आँसू की क्या दूं परिभाषा
इसकी नहीं है कोई भाषा
गम में, दुःख में, सुख में सब में
आहत होती ये जब तब में
याद आये जो बीते कल की
तो बस झट से आखें छलकी
घाम बर्खा शीत सबके अपने मिजाज,
सदैव न रहता मधुमास सा उपवन है।
सूदों भाताक खाते रहते संपदा को,
यह छूटने वाली केंचुली है उतरन है।
शुरू करूँगी जिस दिन
जिदंगी की किताब मैं
लिख दूँगी पल-पल का
तब इसमें हिसाब मैं |
अब रहोगे बैठे ,
#कौशलमंदों के शामियानों में ,
पा जाओगे एक #मुकाम ,
ज़िंदगी के जहानों में ।
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कल भी देखिए
सादर
कल भी देखिए
सादर




