हर --हर ,महादेव ! जी हाँ , भला सावन का महिना हो और महादेव याद न किये जाएँ ये तो हो नहीं सकता न ........ इस समय जब मैं कल के लिए प्रस्तुति बना रही हूँ तो मुझे शिव ही याद आ रहे हैं ..... सावन का महिना विशेष रूप से भगवान् शिव को समर्पित है .... तो चलिए सबसे पहले उनकी ही अराधना करते हुए जानकारी लेते हैं ज्योतिर्लिंगों की .....
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग
तभी एक खूबसूरत शोड़षी पर नजर पड़ी। सावन के इस सुहाने मौसम में उसकी दुबली पतली काया पर पीत वस्त्र मानों सरसों के खेत में गुलाब का फूल। शायद उस दुकान के सामने की जगह में पचासों लोगों की घूरती निगाहें उसे विचलित कर रही थी। या और कोई विवशता थी, पता नहीं पर वह बार बार इधर उधर देख रही थी और कुछ क्षणोपरांत धीरे-धीरे सरकते – सरकते मेरे बगल में आ गई।
मध्यम किंतु मीठे कोकिल स्वर में बोली, “तुम्हारे पास छाता है।”
आगे की बातचीत जानने के लिए लिंक पर जाएँ ..........भाग्य से छीका फूट कर भी कुछ ना मिले उसे क्या कहते हैं मुझे पता नहीं .......बस ऐसे वक़्त ईश्वर की ही लीला लगती है और खुद के मन को समझाने के लिए ईश्वर ही सबका ठिकाना भी है ..... आस्था रखिये तो ऐसा ही महसूस होगा .....
कहीं धूप खिली कहीं छाया
यहाँ कुछ भी तजने योग्य नहीं
यह जगत उसी की है माया,
वह सूरज सा नभ में दमके
कहीं धूप खिली कहीं छाया !
ये भी ईश्वर की ही माया होगी कि शहर के बीच में और एक शहर बसता है ...... गहन अनुभूति को लिए एक रचना पढ़िए ...
प्रेशियस चाइल्ड की देखभाल --
पुराने जमाने के लोग भी क्या लोग थे? एकदम मस्त! एक तरह से फुरसतिया टाइप के थे। लेकिन मजाल है कि जरूरी काम में देरी हो जाए! शादी की उम्र 21-22 साल है। ये पट्ठे उससे भी पहले कर लेते थे। बच्चे भी समय पर और बच्चों की शादियाँ और उनके बच्चे भी समय पर इसलिए इनके पास फुरसत ही फुरसत होती थी।
लेखक से नम्र निवेदन है कि आपने अपनी बात कह तो दी लेकिन ये बिलकुल ऐसी ही है जैसे नक्कारखाने में तूती की आवाज़ कोई नहीं सुनता ..... आज परिवार को कहाँ सब पैसे को देखते हैं ...... फिर कृषि सूखे तो सूखती रहे ....खैर अभी बारिश का मौसम है ...... और आने वाला है हमारा राष्ट्रिय त्यौहार ...... आज भी बहुत से लोग स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में अंतर नहीं कर पाते ..... वैसे मेरा विषय ये नहीं है ...बस इस बार ७५ वर्ष की आज़ादी का ज़श्न है जिसे अमृत महोत्सव का नाम दिया गया है उस पर एक बहुत सुन्दर गीत लायी हूँ ....
एक देशगान -आज़ादी के अमृत महोत्सव पर
आज़ादी का
वर्ष पचहत्तर
घर -घर उड़े तिरंगा.
इसके सम्मुख
कान्तिहीन है
इंद्रधनुष सतरंगा.
अरे ! ........... ये क्या हुआ ? आज आज़ादी के इस दिन का कितना महत्त्व है ज़रा आप भी जानिये ....और स्वतंत्र भारत के नागरिक होने पर गर्व कीजिये ....
हाय ये क्या हुआ मेरा तो पंद्रह अगस्त मनाने का सारा उत्साह ही ठंडा हो गया
उनका हाल देख कर मन बैठ गया चेहरा लटका हुआ उदास, बातों में भी कोई उत्साह नहीं, मुझसे रहा नहीं गया पड़ोसी धर्म निभाते हुए मैंने पूछ ही लिया क्या हुआ भाई साहब कोई बात हो गई, मेरा पूछना था कि वो शुरु हो गये हाय ये क्या हो गया पूरे साल जिस पन्द्रह अगस्त का इंतजार रहता था उसने इस बार ये क्या किया सारा उत्साह ही ख़त्म हो गया उसे मनाने का,
देख लिया आपने कि हम भारतीय कितने कृतघ्न हैं ...... कभी देश के बारे में नहीं बस अपने बारे में ही सोचते हैं ........ लेकिन नहीं ..... सब ही तो ऐसा नहीं सोचते ..... सारी उंगलियाँ बराबर नहीं होतीं ...... हम में से अधिकांश देश के प्रति सच्चे प्रेम की भावना से प्लावित हैं ..... अपने कार्य और कार्य क्षेत्र मे पूरे मन और तन से लगे हुए हैं ....रेल - विभाग से जुड़े हमारे एक वरिष्ठ ब्लॉगर प्रवीण पाण्डेय जी का एक गीत .......
वयं राष्ट्रे जागृयाम
गति में शक्ति, शक्ति में मति हो,
आवश्यक जो, लब्ध प्रगति हो,
रेल हेतु हो, राष्ट्रोन्नति हो,
नित नित छूने हैं आयाम,
वयं राष्ट्रे जागृयाम।
विडिओ भी ज़रूर सुनियेगा ....... रोम रोम पुलकित हो जायेगा .... ऐसा ही भाव हर क्षेत्र में हो और आँखों में भारत को अग्रणी बनाने का सपना ....... सपनों की बात चली है तो एक खूबसूरत सा ख्वाब ये भी है ....
उनींदी पलकों पर छाई !!
ज़िन्दगी को पोर पोर जीया था
ख़ामोश जुबां दीवारों पे तेरा नाम लिखती
मदहोश से हर्फ़ इश्क़ की आग में तपकर
सीने से दुपट्टा गिरा देते ...
न तुम कुछ कहते न मैं कुछ कहती
हवाएं बदन पर उग आये
मुहब्बत के अक्षरों को
सफ़हा-दर सफ़हा पढने लगतीं ...