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गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

3227...रिश्तों की आढ़ ले के किसी को न बाँधना...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय दिगंबर नासवा जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।

श्रद्धांजलि!

तमिलनाडु में हुए हेलीकॉप्टर हादसे में देश के प्रथम चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (देश की तीनों सेनाओं के प्रमुख ) जनरल विपिन रावत,उनकी जीवनसंगनी व 11 अन्य सैनिकों का दुःखद निधन हो गया.

हादसे की ख़बर से देश गहरे सदमे में डूब गया!

शहीदों को पाँच लिंकों का आनन्द परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि!

आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

लगता है अपने आप के हम भी नहीं रहे ...

चिंगारियाँ सुलगने लगी हैं दबी-दबी,
कह दो हवा से आज जहाँ है वहीँ रहे.
 
रिश्तों की आढ़ ले के किसी को बाँधना,
दिल में तमाम उम्र रहेवो कहीं रहे.

६२६. प्रकृति और आदमी

सबने बिना मांगे

कुछ--कुछ दिया,

मैंने आदमी से माँगा,

उसने कहा,

मेरे पास इतना कहाँ है

कि तुम्हें कुछ दे सकूं.’

मेरा तो अनुराग धरा से

चीर वक्ष काली रैना का

अरुणोदय प्राची रसरंग

धरनी का श्रृंगार किया

ले इंद्रधनुष के सातों रंग ।।

ये आशा है, जिज्ञासा है

ये उसके जीवन का प्रण।।

पन्ना पलटने से पहले

पर करते-करते अभ्यास

जब-जब जले हाथ,

करना नहीं प्रलाप

अनुभव से सीख लेना

और निरंतर करना प्रयास

पन्ना पलट देना तत्पश्चात

जानना

अब मेरी मुस्कुराहट

हौले से हटा रही है मुखौटे को

और एक निश्वास भरकर

मैं सोच रही हूँ

मैं बहुत कुछ जान सकती हूँ

बहुत कुछ कह सकती हूँ

*****

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले गुरुवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

सोमवार, 29 नवंबर 2021

3227...मसि कागद जब खाद बने शब्द कहाँ से पाए

सादर अभिवादन
मौसम संधिकाल
लगभग सभी की तबियत में
नरमी ला दिया है..वैसे इस मौसम को
हैल्दी सीज़न कहते है,  रुग्ण लोग जल्द
जो स्वस्थ हैं वे
स्वस्थ हो जाते हैं और अधिक
तरोताजा हो जाते हैं...
रचनाएँ...



प्रीति भरके प्रवाहित हुई एक नदी
झूमती दस दिशाऐं बहारों से हैं

तब प्रणय गीत अधरों पे सजने लगे
बन्द पलकें सजल डबडबाने लगीं

लेखनी चल पड़ी तेरे अहसास कर
शब्द दर शब्द भर कंपकंपाने लगी




श्वेत वस्त्र को पहन
मनन मनन मनन गहन
चला चला चले है वो

है राह अब गहे है जो
न यत्र से न तत्र से
लिखेगा ताम्रपत्र से

भुजंग सी लकीर वो
नहीं नहीं फकीर वो




अभावों में ही पली बढ़ी
नहीं थी कुछ भी लिखी पढी
मल्लाह परिवार में हुआ जनम
मुश्किलों से होता भरण पोषण
पति नहीं था ससुराल नहीं थी




चंचल, बेकाबू, मतवाला
भागा करता सपनों के संग,
रुकता ही नहीं पल भर को भी
उड़ता फिरता विहगों के संग !

कैसे रोकूँ दीवाने को
सुनता ही कहाँ ये पागल मन,
हाथों से छूटा जाता है
यह चिर चंचल यायावर मन !




सृजन पीर माधुर्य लिए
आनन्द लुटाती है

क्षणिक चित्र उर माटी में
दृश्य बीज अकुलाए
मसि कागद जब खाद बने
शब्द कहाँ से पाए
सृजनहार कवि फिर जन्मा
वो कलम लुभाती है।।




सुरमई यह शाम है
तुम्हारे ही नाम है,
अधरों पर गीत सजा
दूजा क्या काम है !

बिखरी है चांदनी
गूंजे है रागिनी,
पलकों में बीत रही
अद्भुत यह यामिनी !
.....
इति शुभम
सादर

 

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