शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन।
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मुझे डर नहीं लगता
कफ़न लेकर
चल रही हवाओं के
दस्तक से खड़खड़ाते
साँकल के
भयावह पैगाम से।
कफ़न लेकर
चल रही हवाओं के
दस्तक से खड़खड़ाते
साँकल के
भयावह पैगाम से।
मुझे डर नहीं लगता
क्योंकि
अंर्तमन को
अनसुना करना,
बात-बात पर चुप्पी साधना,
मज़लूमों को परे धकियाना,
जीने के लिए तटस्थ होना
सीख लिया है।
पर जाने क्यों
बहुत डर लग रहा है...
नफ़रत और उन्माद
का रस पीकर मतायी
लाल नरभक्षी चींटियों
के द्वारा
मानव बस्तियों की
घेराबंदी से।
क्योंकि
अंर्तमन को
अनसुना करना,
बात-बात पर चुप्पी साधना,
मज़लूमों को परे धकियाना,
जीने के लिए तटस्थ होना
सीख लिया है।
पर जाने क्यों
बहुत डर लग रहा है...
नफ़रत और उन्माद
का रस पीकर मतायी
लाल नरभक्षी चींटियों
के द्वारा
मानव बस्तियों की
घेराबंदी से।
#श्वेता
★★☆★★
आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
भंते कहते ही फूट पड़े आँसू अंगुलिमाल के
घृणा-हिंसा को जयी किया बुद्ध ने
प्रेम-करुणा से
इस धरती की सारी हवा पानी आग
हिरण कछुए जंगल का पत्ता-पत्ता
उनके प्रेम में थे
तथागत की आँखें उनके गुरुत्व में
अर्धोन्मीलित हो गयी
घृणा-हिंसा को जयी किया बुद्ध ने
प्रेम-करुणा से
इस धरती की सारी हवा पानी आग
हिरण कछुए जंगल का पत्ता-पत्ता
उनके प्रेम में थे
तथागत की आँखें उनके गुरुत्व में
अर्धोन्मीलित हो गयी
सुख की खोज में दर-दर भटका,
द्वार खुला नहीं, फिर भी घट का !
फूलों की चाहत थी किंतु
माया ने काँटों में पटका !
जब बेड़ा भवसागर अटका
तूने पार लगाया कान्हा !!!
है कुछ भी तो, नहीं यहाँ!
हाँ, कभी इक धड़कन सी, रहती थी यहाँ,
पर, अब है, बस इक प्रतिध्वनि,
किसी के, धड़कन की,
शायद, वो ही, सुन पाओगे!
पाओगे क्या?
लकीरों में हर पल थे ढूँढा किये हम,
अभी दिल से जिनको उतारा नहीं था ।
सफर तो दिलों का था मुश्किल नहीं पर,
अना में किसी ने पुकारा नहीं था ।
उठी इतनी नफ़रत अचानक दिलों में,
जुदाई बिना अब गुज़ारा नहीं था ।
यानी एक सामान्य मनुष्य अपने पूरे जीवनकाल में चार -पाँच से अधिक भाषाएं नहीं सीख सकता ,लेकिन भारत भूमि पर अनेक ऐसी महान विभूतियों ने जन्म लिया है ,जिन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा से एक साथ इससे भी ज़्यादा भाषाओं का ज्ञान अर्जित कर समाज को आश्चर्यचकित कर दिया । इनमें आज़ाद हिन्द फौज के संस्थापक नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय पी.व्ही.नरसिंहराव जैसी हस्तियां शामिल हैं। लेकिन इन्हीं दिग्गज प्रतिभाओं में से एक भूली -बिसरी विभूति हैं स्वर्गीय हरिनाथ डे । वह कवि,लेखक और चिन्तक होने के
साथ -साथ एक महान भाषाविज्ञानी थे।
स्व- स्वतंत्र: एक दृष्टिकोण
–विद्यालय में नामांकन के समय विद्यालय के आसपास के मुहल्लों के घरों में जा-जा कर अभिभावकों के आगे बच्चों के नामांकन के लिए गिड़गिड़ाना।
–शिक्षक को अपने ही वेतन के लिए चार-चार ,पाँच-पाँच महीने इंतजार करना।
इस भयावह कोरोना काल में सभी को घर में रहने के लिए लॉकडाउन में रखने के लिए सभी तरह से प्रयास किये गए और शिक्षकों को कोरोनटाइन सेंटर में कार्य पर लगाया गया। प्रवासियों के आने पर डॉक्टर से पहले स्टेशन पर शिक्षकों के द्वारा स्क्रिनिग करवाना। जनवितरण के दुकान में बैठकर करोनाकाल में भीड़ वाली जगह में अनाज वितरण करवाना.. उफ्फ्फ..
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आशा.है आज का अंक
आपको अच्छा लगा होगा।
हमक़दम के लिए
यहाँ देखिए
कल का अंक पढ़ना न भूले
कल आ रही हैं विभा दी
विशेष विशेषांक लेकर।
#श्वेता
साथ -साथ एक महान भाषाविज्ञानी थे।
स्व- स्वतंत्र: एक दृष्टिकोण
–विद्यालय में नामांकन के समय विद्यालय के आसपास के मुहल्लों के घरों में जा-जा कर अभिभावकों के आगे बच्चों के नामांकन के लिए गिड़गिड़ाना।
–शिक्षक को अपने ही वेतन के लिए चार-चार ,पाँच-पाँच महीने इंतजार करना।
इस भयावह कोरोना काल में सभी को घर में रहने के लिए लॉकडाउन में रखने के लिए सभी तरह से प्रयास किये गए और शिक्षकों को कोरोनटाइन सेंटर में कार्य पर लगाया गया। प्रवासियों के आने पर डॉक्टर से पहले स्टेशन पर शिक्षकों के द्वारा स्क्रिनिग करवाना। जनवितरण के दुकान में बैठकर करोनाकाल में भीड़ वाली जगह में अनाज वितरण करवाना.. उफ्फ्फ..
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आशा.है आज का अंक
आपको अच्छा लगा होगा।
हमक़दम के लिए
यहाँ देखिए
कल का अंक पढ़ना न भूले
कल आ रही हैं विभा दी
विशेष विशेषांक लेकर।
#श्वेता





