।। भोर वंदन ।।
रोज़मर्रा वही इक ख़बर देखिए
अब तो पत्थर हुआ काँचघर देखिए।
सड़कें चलने लगीं आदमी रुक गया
हो गया यों अपाहिज सफ़र देखिए।
ज़िन्दगी में हैं कई लोग आग हों जैसे
हर अँधेरे में सुलगते हैं जुगनुओं जैसे
सोच लेता हूँ कई बार बादलों जैसे
भीग लेने दूं किसी छत को बारिशों जैसे
लगभग साल डेढ़ साल पहले की बात है, मैंने इंस्टा पर एक नया अकाउंट बनाया था । आत्मविश्वासी महिलाओं , क्रियेटिव ज्वैलरी और हैंडलूम साड़ीयों को यहाँ मैं फॉलो किया करती थी। रोज कुछ नया तलाशती रहती थी
गूंज उठी जब जब अंतस से
लेखन ने अनुबंध किये।
कितने कोरे पन्नों ने फिर
चित्र लिखित से गीत दिये।
🌈🌈
बाढ़ है
सुखार है
रोग है
सब आम आदमी के लिए है
बेकारी है
बेरोज़गारी है
वेतन में कटौती है
🌈🌈
अंदाज़े गाफ़िल
तू तो अब ख़्वाबों के भी पार हुआ जाता है
बोल क्या ऐसे भी लाचार हुआ जाता है
सोचा है जबसे के अब कुछ तो हो शिक़्वा तुझसे
।। इति शम ।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ‘तृप्ति’..✍


