तेरह मई
शुक्र है..कि
भारत के इतिहास में
आज कुछ भी उल्लेखनीय
नही हुआ...
सादर अभिवादन..
चलिए चलें आज पढ़े
हमारे सहयोगी चर्चाकार

भाई रवीन्द्र सिंह के ब्लॉग की
कुछ नई-पुरानी रचनाएँ....
ईश्वर का साक्षात रूप है माँ ....

माँ तो केवल माँ होती
ईश्वर का साक्षात रूप है माँ
जो हर हाल में साथ होती है
माँ की मुस्कुराहट क्या होती है
कोविड-19-काल का कलेवर कैसा है?

फूलों को स्पर्श करतीं हैं अल्हड़ हवाएँ
तुम्हारे सिवाय
सब रसरंग में आप्लावित हैं
अच्छा लगा जब तुमने
टहनी पर खिला
मासूम प्रफुल्लित फूल
नहीं तोड़ा बेदर्दी से
बस वहीं से
समर्पित कर दिया है
ईष्ट के चरणों में
इस रचनात्मकता से
प्रकृति, फूल, ईष्ट और मन
संतोष की ठंडी आह नहीं भरते
भविष्य की तस्वीर के विचार पर
ललाट पर बल नहीं उभरते
सुनो प्रिये !

सुनो प्रिये !
मैं बहुत नाराज़ हूँ आपसे
आपने आज फिर भेज दिये
चार लाल गुलाब के सुंदर फूल
प्यारे कोमल सुप्रभात संदेश के साथ
माना कि ये वर्चुअल हैं / नक़ली हैं
लेकिन इनमें समाया
प्यार का एहसास / महक तो असली है
वो शाम अब तक याद है.....

वो शाम अब तक याद है
दर-ओ-दीवार पर
गुनगुनी सिंदूरी धूप खिल रही थी
नीम के उस पेड़ पर
सुनहरी हरी पत्तियों पर
एक चिड़िया इत्मीनान से
अपने प्यारे चिरौटा से मिल रही थी
ख़्यालों में अब अजब
हलचल-सी हो रही थी
एक नाज़ुक-सा फूल गुलाब का ...

हूँ मैं एक नाज़ुक-सा फूल,
घेरे रहते हैं मुझे नुकीले शूल।
कोई तोड़ता पुष्पासन से,
कोई तोड़ता बस पंखुड़ी;
पुष्पवृंत से तोड़ता कोई,
कोई मारता बेरहम छड़ी।
.....
अब बस..
कल मिलिए भाई रवीन्द्र जी से
सादर...
शुक्र है..कि
भारत के इतिहास में
आज कुछ भी उल्लेखनीय
नही हुआ...
सादर अभिवादन..
चलिए चलें आज पढ़े
हमारे सहयोगी चर्चाकार

भाई रवीन्द्र सिंह के ब्लॉग की
कुछ नई-पुरानी रचनाएँ....
ईश्वर का साक्षात रूप है माँ ....

माँ तो केवल माँ होती
ईश्वर का साक्षात रूप है माँ
जो हर हाल में साथ होती है
माँ की मुस्कुराहट क्या होती है
कोविड-19-काल का कलेवर कैसा है?

फूलों को स्पर्श करतीं हैं अल्हड़ हवाएँ
तुम्हारे सिवाय
सब रसरंग में आप्लावित हैं
अच्छा लगा जब तुमने
टहनी पर खिला
मासूम प्रफुल्लित फूल
नहीं तोड़ा बेदर्दी से
बस वहीं से
समर्पित कर दिया है
ईष्ट के चरणों में
इस रचनात्मकता से
प्रकृति, फूल, ईष्ट और मन
संतोष की ठंडी आह नहीं भरते
भविष्य की तस्वीर के विचार पर
ललाट पर बल नहीं उभरते
सुनो प्रिये !

सुनो प्रिये !
मैं बहुत नाराज़ हूँ आपसे
आपने आज फिर भेज दिये
चार लाल गुलाब के सुंदर फूल
प्यारे कोमल सुप्रभात संदेश के साथ
माना कि ये वर्चुअल हैं / नक़ली हैं
लेकिन इनमें समाया
प्यार का एहसास / महक तो असली है
वो शाम अब तक याद है.....

वो शाम अब तक याद है
दर-ओ-दीवार पर
गुनगुनी सिंदूरी धूप खिल रही थी
नीम के उस पेड़ पर
सुनहरी हरी पत्तियों पर
एक चिड़िया इत्मीनान से
अपने प्यारे चिरौटा से मिल रही थी
ख़्यालों में अब अजब
हलचल-सी हो रही थी
एक नाज़ुक-सा फूल गुलाब का ...

हूँ मैं एक नाज़ुक-सा फूल,
घेरे रहते हैं मुझे नुकीले शूल।
कोई तोड़ता पुष्पासन से,
कोई तोड़ता बस पंखुड़ी;
पुष्पवृंत से तोड़ता कोई,
कोई मारता बेरहम छड़ी।
.....
हम-क़दम का नया विषय
कल मिलिए भाई रवीन्द्र जी से
सादर...