।। भोर वंदन।।
त्योहारों, वारों के बाद अब समय जग की रीति- नीति के साथ..
"हँसा ज़ोर से जब तब दुनिया बोली इसका पेट भरा है
और फूट कर रोया जब तब बोली नाटक है नख़रा है
दोस्त कठिन है यहाँ किसी को भी अपनी पीड़ा बतलाना
दर्द उठे तो सूने पथ पर पाँव बढ़ाना चलते जाना..!!"
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
अब नज़र डालें आज की
लिंकों में शामिल रचनाओं पर..✍
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मूल मन्त्र इस श्रृष्टि का ये जाना है
खो कर ही इस जीवन में कुछ पाना है
नव कोंपल उस पल पेड़ों पर आते हैं
पात पुरातन जड़ से जब झड़ जाते हैं
जैविक घटकों में हैं ऐसे जीवाणू
मिट कर खुद जो दो बन कर मुस्काते हैं
दंश नहीं मानो, खोना अवसर समझो
यही शाश्वत सत्य चिरंतन माना है
खो कर ही इस जीवन में ..
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यूं सत्य की असत्य पर विजय सदा बनी रहे।
दशहरा का दिन सभी से आज बस यही कहे।
बुराइयों का अंत हो, स्वच्छ सारा तंत्र हो
एक व्यक्ति भी यहां दमन कतई नहीं सहे।..
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मन का रावण
आज भी खड़ा है
सर तान कर
अंगद के पाँव जैसा,
सदियां बीत गई
रावण जलाते..
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हँसी आ गई
देख कर
बिजली के तार पर
नट की तरह
सूरज दादा को
संतुलन बनाते हुए !
इंसान की
क्या बिसात !
बड़े-बड़ों को
झंझटों में फंस कर
झूलते तारों में..
आ. पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा जी यथार्थपरक रचना...रावण दहन
मारो एक, तो दस पैदा होते हैं रावण!
अगणित रावण, दहन किए आजीवन,
मनाई विजयादशमी, जब हुआ लंका दहन,
उल्लास हुआ, हर्षोल्लास हुआ,
मरा नहीं, फिर भी रावण!
मारो एक, तो दस पैदा होते हैं रावण!
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍



