।।भोर वंदन।।
पकी जामुन के रँग की पाग
बाँधता आया लो आषाढ़ !
उड़ गयी सहसा सिर से पाग
छा गये नभ में घन घनघोर!
छुट गई सहसा कर से पाग-
बढा आँधी पानी का जोर!
लिपट लो गई मुझी से पाग,
झूमता डगमग पग आषाढ़!
पंडित नरेंद्र शर्मा
सुबह सवेरे की छंद युक्त रचनाओं के साथ आज की लिंकों में शामिल रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें..✍
डॉ जफर जी,
अनुराधा चौहान जी,
कुसुम कोठारी जी,
डॉ. जेन्नी शबनम,
अनुपमा पाठक जी
🎼
चूड़ी काज़ल कंगन और ऑंसू,
बारिश कोहरा बादल और आँसू
पीपल पतझड़ जेठ दुपहरी,
झूले साथी सावन और आँसू,
मेरी पीड़ा मेरा दुखड़ा बोझ भयंकर,
मिश्री बातें तेरी जियरा सदल और आँसू
🎼
आई रजनी सुन सजनी क्या सोचे चुप होक
मेघा छाए घिर-घिर आए
तड़ित चमके शोर मचाए
पुरवा झूमे चले लहराए
मदहोश बड़ा यह सुंदर शमा ..
🎼
सावन अब कैसा सावन
वारिध ने अपनी चाल ही बदल़ दी
ना वो लयबद्ध झड़ी बादलों की
ना वो बहारें,
ना वो मिट्टी की
भीनी सौंधी खुशबू
1.
तपती धरा
तन भी तप उठा
बदरा छाए
घूम-घूम गरजे
मन का भौंरा नाचे।
2.
कूकी कोयल
नाचे है पपीहरा
देख बदरा
चहके है बगिया
नाचे घर अँगना।..
🎼
अभी शोक में हूँ।
हर रिश्ते की एक उम्र होती है
उसके बाद उसका मरना तय है
मैंने ऐसे कई मरे हुए रिश्तों का श्राद्ध किया है
🎼
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह'तृप्ति'..✍



