सादर अभिवादन।
बसंत गुज़र गया
पतझड़ आ गया
कोमल किसलय की छायी छाया
देख प्रकृति के रंग मन हरियाया।
-रवीन्द्र
आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

"तुम जब चाहे मधु बरसाओ,
जिस पर चाहे मधु बरसाओ,
जब तक चाहो तरसाओ,
जिसको चाहो तरसाओ."
कानून हैं कागज के टुकड़े,
सब फाईलों में दब जाती हैं
लाचार, नहीं कुछ कर पाओगी.
मसली सी खुद को पाओगी

उतर ही जाता है उम्र का उबाल एक दिन,
जमीन बुला लेती है अंततः
बैठाती है गोद,
थपकियों में आती है मौत की नींद,
छूट जाते हैं चंद निशान
धागों की शक्ल में.....
बरगद हरियाता है,
हर पतझड़ दे बाद,
जीवन भी......
कुछ सोच-विचारकर वह गाँव के हर घर के विषय में सोचता हुआ और उसके समझ में जो लोग वास्तव में बुद्धिजीवी हैं उन्हें इकट्ठा करता है और कहता है,"अपने गाँव के युवकों की स्थिति को देख रहे हो?"
"हमलोग क्या कर सकते हैं?"
"आप ही लोग तो कर सकते हैं... , अब समय आ गया है कि बुद्धिजीवियों को पुनः राजनीति में आना चाहिए। *मतदान करने की प्रतिशत ज्यादा से ज्यादा हो।"*

सड़कों पर निकला है आज बड़ा हुजूम जवानों का पर
हौसला उन नन्हों में है जो अपने पिता को सलाम कर रहे थे
हाँ तो मै घर तक जब पहुंची तब दरवाज़ा खोलने में दिक्कत आई , चाभी तो वही थी ... सही थी तो क्या ताला बदल गया है ? मेरी नेम प्लेट कहाँ है ... ये एड्रेस पहले वाला ही है क्या ? वो मेरे सब पड़ोसी क्या हुए ? और स्टाफ़ ? बगीचा वही है अलबत्ता फूल कुछ कम से लग रहे हैं .
हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए
यहाँ देखिए
आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार।
रवीन्द्र सिंह यादव