सादर अभिवादन।
कल देश ने धूमधाम से मनाया 72 वाँ स्वाधीनता दिवस। हमें सदैव स्मरण रहनी चाहिए अपने स्वतंत्रता संग्राम की शौर्य और क़ुर्बानी से भरी अनमोल गाथा। नयी पीढ़ी में स्वतंत्रता के मूल्य स्थापित करना हमारा दायित्य है।
"स्वतंत्रता का अर्थ वह क्या जाने
जो स्वतंत्र वातावरण में खेला है,
स्वतंत्रता का अर्थ उस पीढ़ी से पूछो
जिसने पराधीनता का दर्द झेला है।"
(मेरे काव्य संग्रह "प्रिज्म से निकले रंग" से )
आइये स्वतंत्रता दिवस पर विभिन्न ब्लॉग्स पर रचनाकारों के सारगर्भित भावपूर्ण उद्गारों में निहित संदेशों से आपको अवगत कराते हैं-

स्वतंत्रता का अर्थ खुली छूट नहीं होती है
अत्यधिक स्वतंत्रता सबकुछ चौपट करती है
लोहा हो या रेशम दोनों बंधन एक जैसे होते हैं
फायदे अक्सर आदमी को गुलाम बना देते हैं

इसकी उज्ज्वला धवला छवि
जन-जन के हृदय समायी है
स्वर्ण मुकुट सम शोभित हिमगिरि
केसरिया गौरव बरसायी है।
श्वेत धवल गंगा सम नदियों से
गौरव गान देता सुनाई है
सदा सम्मान हमारा बढ़ा रही
तो क्यों न हम अभिमान करें
यह मातृभूमि गौरव अपना
फिर क्यों न इसका मान करें

माना हमने कभी लड़ी नहीं,
देशहित में एक लड़ाई।
पर हमको जब-जब मौका मिला,
हम ने भी, जान लगाई।

वही वतन है आज
हम वतन के वाशिंदे
बना कर धर्म जाति की
दीवारें और वोट के फन्दे
लडें आपस में और पहुंचाए
वतन की संपत्ति को नुकसान
आरक्षण बन गया है ढाल
चुनावी वादों में
बने मंदिर और मस्जिद भी

साल बहत्तर उमर हो रही,अभी भी चलना सीख रहा,
दृष्टिभ्रम विकास नाम का,छल जन-मन को दीख रहा।
जाति,धर्म का राग अलाप,भीड़ नियोजित बर्बरता,
नहीं बेटियाँ कहीं सुरक्षित,बस नारों में गूँजित समता।
चलते-चलते ब्लॉग "मेरी धरोहर" से एक नायाब प्रस्तुति-

बुझा है दिल भरी महफ़िल में रौशनी देकर,
मरूँगा भी तो हज़ारों को ज़िन्दगी देकर
क़दम-क़दम पे रहे अपनी आबरू का ख़याल,
गई तो हाथ न आएगी जान भी देकर
हम-क़दम के बत्तीसवें क़दम
का विषय...
यहाँ देखिए...........
का विषय...
यहाँ देखिए...........
आज बस यहीं तक।
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार।
रवीन्द्र सिंह यादव