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मंगलवार, 29 सितंबर 2026

4879....ना ही आए लौटकर ही

मंगलवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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वर्षा ऋतु और शरद काल के बीच क्वार की छुअन
ऋतुओं के संधिकाल को तरंगित कर देती है।
कास के फूल मन को जाने कैसे इंद्रधनुषी कर देते हैं।
हरी धरती का पवित्र शृंगार श्वेत कास और आसमान में अठखेलियाँ करते झक बादल।
आप भी महसूस करिये दूब की नोंक पर ठहरे ओस की मदिर बूँदों को पीते खूबसूरत हरसिंगार के बिछौने पर 
उड़ते शरारती भँवरों के झुंड। फुदकती चिड़िया हरे खेतों के मेड़ पर कच्चे धान के पकने की प्रतीक्षा में, दिन-भर धमा -चौकड़ी करती गिलहरियाँ नव ऋतु का स्वागत में दिन कुतरती धूप, शीतल होती हवाओं के संग आँख मिचौली 
खेलता मुस्कुराता चाँद क्वार से शरद की यात्रा का
साक्षी बनने को आतुर है।


आप की रचनाऍं मेरे दृष्टिकोण से - 

भाव और वस्तुएँ संचित हैं

पर मन की भूमि 

करुणा और संवेदना के बिना

सूख रही है

मानव-मन इस धरा की सुंदरता 

पर कभी रीझता ही नहीं।

​वही पुराने ढर्रे, वही संकीर्ण रवैये,

वह तो अपनी चेतना पर नैतिकता की 

 लकीरें खींचता नहीं

​अपने अहंकार में 

सच्चा सबक कभी सीखता ही नहीं।

​शब्दों का बाज़ार  लगा है

नज़्म की महफ़िलें सजती हैं यहाँ,

पर खो गई है मानवीय संवेदना,

केवल खोखले शब्द बचे हैं,

अंतर्मन की परतें अनछुई ही रह गयी...।

पारिजात और कनेर मदमाती बूंदों की 

छुअन से मदहोश झूम रहे है

सलेटी आकाश, नशीली हवा, और 

भीगी सड़कों के बीच

प्रकृति का संगीत सुनकर 

दादुर, मोर और कोयल बाहर निकल आए हैं।

​शीतल फुहारों से महक से अनजान

सिर पर बोझ उठाए गुज़रती है एक मज़दूरिन...

उसका पसीना वर्षा की बूँदों में मिलकर

उसके चेहरे को एक अनूठी चमक दे रहा है।

किसी के लिए बरखा

मौसम का उल्लास उल्लास है

किसी के लिए सरदर्दी 

लेकिन जिसने जीवन को उसकी संपूर्णता में 

स्वीकार किया

वही कुदरत का सच्चा साथी बनकर

भीतर से परम सुख और आनंद से भर पाता है।

पर 

 क्या सचमुच आनंद मिल पाता है

किसी पर किया गया अंधा ऐतबार

बेइंतहा रुलाता है,

और बेसबब इंतज़ार ने....

ज़िंदगी को बेचैनी में बदल दिया।

क्यों करते हैं लोग दावा

रूह और जिस्म के एक होने का

जब ज़िंदगी की सारी

ख़्वाब और ख्वाहिशें किसी मोड़ पर

अधूरा छोड़ जाना है 

उन्हें किसी की मासूमियत पर भी 

तरस नहीं आता

बेवफ़ाई चुनना कोई मजबूरी होती है क्या?

जो किसी के सच्चे ऑंसू और बेइंतहा दर्द 

कोई देख नहीं पाता

शायद आगे बढ़ गये जो 

 ना ही आए लौटकर ही

पर उस दिल का क्या 

जो इतने  जख़्म खाने के बाद भी

ऑंखों में उनकी तस्वीर सजाये

चौखट पर चाहतों की पवनघंटियॉं लटकाए

उसकी प्रतीक्षा कर रही है।

​जीवन सीधा दिखता है,

पर भीतर उलझनों के अनगिनत मोड़ हैं।

जन्म और मरण के बीच

सजा है एक

शून्य कैनवास

​चारों तरफ़ मोह का चौखटा,

और ढलती शाम में स्याह होते परिंदे।

मासूम राहगीर अतीत के पानी में

अपनी ही परछाईं छूने को भटकते हैं।

​सामने टंगा है आईना,

पर उम्र भर ख़ुद से मिलने की मोहलत नहीं।

धूप-छाँव का यह खेल,

और जन्म-मृत्यु का यह रहस्यमय कैनवास...

अविराम चलता रहता है।


आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।


1 टिप्पणी:

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