प्रातःवंदन
"जीवन बड़ा अजीब होता है। ...कई बार उसकी परतों में से हम जिस रंग को खोजते हैं, वह नहीं निकलता। पर कोई ऐसा रंग निकल आता है जो उससे भी अधिक ख़ूबसूरत होता है।"
अमृता प्रीतम
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण को आगे बढाते हुए..
सच कहूं तू जहां तक मुझे दिखता है ।
वहां तक मुझे कुछ भी नहीं दिखता है ।
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किसी वृक्ष का नाम नहीं लिखना,
न किसी ऋतु का।
कुछ टूटनें
पहले से ही आकाश में लिखी होती हैं।
✨️
मैं शब्दों के बीच की वह चुप्पी हूँ, जिसे तुमने अक्सर शांति समझ लिया। मैं वह दीवार हूँ, जिसे तुमने खुद अपने चारों ओर इतना ऊँचा उठा लिया कि अब तुम्हें बाहर का उजाला भी दिखाई नहीं देता।
आज मैं, लेखिका की कलम से यहाँ सिर्फ कागज पर उतरने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे भीतर सोए हुए उस साहस को जगाने आई हूँ जो अब 'मिट्टी' की तरह दबते-
✨️
लोग बताते हैं कि
मरने से ठीक पहले तक
वह ज़िंदा था—
क्योंकि
उसकी साँसें चल रही थीं,
वह चल रहा था।
पर सच तो यह है कि।
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जिंदगीभर पकते रहे यह सुनते-सुनते
कि नेगेटिव नहीं हमेशा पौजेटिव सोचो,
काश कि जमाने को अस्पताल का ..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
सुंदर
जवाब देंहटाएंआभार
वंदन