निवेदन।


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गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

951....ब्लॉग पर लोकप्रिय रचनाऐं

सादर 
अभिवादन 
आज लीक से हटकर 
आपको नये अनुभव की 
ओर ले चलते हैं। ब्लॉग जगत् की 
पाँच लोकप्रिय रचनाओं को आज के अंक में 
प्रस्तुत किया जा रहा है। इस प्रक्रिया को ज़ारी रखा 
जायेगा। इस अंक का अर्थ यह कदापि न निकाला जाय कि 
प्रस्तुत रचनाएँ ही अधिक लोकप्रियता हासिल करने में 
कामयाब रही हैं।  सुधि पाठक हमारी पहुँच से दूर 
श्रेष्ठ एवं लोकप्रिय रचनाओं की ओर हमारा 
ध्यान आकृष्ट करा सकते हैं। उम्मीद है 
आप अतीत में लौटकर 
चिंतन अवश्य करेंगे 
कि उन वर्षों में 
क्या लिखा जा 
रहा था।कुछ 
रचनाओं के 
विषय 
सर्वथा प्रासंगिक बने रहते हैं।
आजकल 
जीवन मूल्यों के 
विस्थापित और स्थापित 
होने की प्रक्रिया तीव्र हो गयी है। 
     


लेकिन जिन औरतों को , इसमें  जबरदस्ती शामिल किया जाता है उन
पर ,क्या बीतती होगी.... ? हम-आप कल्पना भी नहीं कर सकते..
जो ओरतें ,अपनाशरीर अपने मर्जी या मजबूरी में बेचने का धंधा करती 
है ,उसे हमारा समाज बुरा - भला बोल,उसका बहिष्कार करती है.... 
इन कलयुगी राम का हम-आप क्या करें...... ?
पहले तो एक दो किस्से सुनने-देखने को मिलते थे 
अब तो आम बात होती जारही है..... | 



भ्रम /1.... डॉ.प्रतिभा स्वाति


हम  सबके भीतर ,
एक हरिण जिन्दा है !
जानता है यथार्थ ,
खुदसे / शर्मिंदा है !



आंसू पोंछते हुए कमली बोली-“मेम साहब यहाँ से घर जाने 
 पर मेरा भी मन नहीं लगा। बार-बार आपका रोता हुआ चेहरा 
और टी-पाट आँखों के आगे नाचता रहा। फिर मैं उठ 
 गयी मन में सोचते हुए कि ये अच्छा नहीं हुआ।मैंने कुछ पैसे 
 इकट्ठे किये थे।उन्हें लेकर  बाजार गयी और फिर जो अच्छा लगा 
पैकेट में बंधवा लिया। कहते हुए वह थोडा रुकी।
 तब तक उज्ज्वला बोल पड़ी—“अरे हाँ ये तुमने मुझे काहे का 
 पैकेट दिया है और किस  लिए दियाजबकि तो आज 
मेरा या उनका जन्मदिन है।न ही कोई और कारण  
तू बता तो इसमें है क्या?”

काठमांडू की वादियों में.....कविता रावत 


''सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ,
जिंदगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहाँ"

ये पंक्तियां मुझे भी कुछ सुकूं भरे पल तलाशने के लिए 
उकसाती रहती है।  ऐसी ही एक कोशिश मेरी पिछले माह 
काठमांडू की यात्रा की रही। जिंदगी फिर उसी ढर्रे पर लौट 
आई है। इस यात्रा को याद कर ढर्रे से थोड़ा दूर जाना चाहती हूँ। 

मौत नें जाल उस पर कसा इस कदर.......राजेश कुमार राय

सब फ़रिश्ते सफर में भटकते रहे
और सियासत में ज़ालिम सँवारा गया।

एक बेटी तरसती रही उम्र भर
प्यार, बेटे के हिस्से में सारा गया।

चलिए अब बारी है 
सभी के लिए 
एक खुला मंच
आपका हम-क़दम 
सातवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
...........यहाँ देखिए...........


आज के लिए बस इतना ही। मिलते हैं फिर अगले गुरूवार। 
कल   रही हैं श्वेता जी अपनी  प्रस्तुति के साथ। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

950..ये कैसी सियासत ? .....


२१ फरवरी २०१८
।।हार्दिक शुभेच्छा।।
साझी अभिव्यक्ति का 
माध्यम है ये मंच जो वक्त के 
साथ कदम मिला कर 950 अंक में  
प्रवेश कर रही..गिरफ्त है इनमें अब भी 
आने वाली कई सरगोशियाँ आज की 
लिकों में सामंजस्य कविता की नमी, 
हास्य के रंग,विचार पूर्ण विषय के 
द्वारा व्यथा की प्रस्तुति से है..
जहाँ तक सामयिक विषय.. 
की बात है मानो भ्रष्टाचार 
में शिष्टाचार ढूंढने का चलन बन पड़ा..
अब ज़्यादा समय नहीं लूंगी..✍

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प्रथम लिंक में आनन्द ले..
नदीश  जी की भावनाओं का कल्लोल..

जरूरी जिस कदर है सावधानी घर बनाने में
अचानक अश्क़ टपके और बच गई आबरू वरना
कसर छोड़ी न थी उसने मुझे पत्थर बनाने में
मैं सारी उम्र जिनके वास्ते चुन-चुन के लाया गुल
वो ही मसरूफ़ थे मेरे लिए खंज़र बनाने में

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द्वितीय है..जीवन के  सत्य को आइना दिखाती 
आदरणीय रवीन्द्र जी  की रचना..



जलाये रखना, 

उम्मीद आँधियों  में  

बनाये रखना। 

अब  क्या  डरना 

हालात की तल्ख़ियों से,



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तृतीय लिंक में विचार करें तालियों का पिटना..पर


आपकी किसी बात या रचना पर ताली बजना और 
उससे समाज में बदलाव आना दो बिलकुल अलग़-अलग़ बातें हैं। फ़ेसबुक के लाइकस् को भी हम इस श्रेणी में रख सकते हैं हालांकि 
वह तालियों जितना तुरंता और तात्कालिक नहीं है। जब तालियां 
बजती हैं तो माना जा सकता है कि आपके जीवन में ज़रुर 
कुछ बदलाव आता है, लोग आपको जानने लगते हैं, 

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कार्टून :- आओ ठाकुर




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चतुर्थ लिंक के अंतर्गत सखी मीना शर्मा जी की 
भावपूर्ण रचना मैं दीपशिखा - सी जलती हूँ !

मैं मन ही मन में गढ़ती हूँ,

पूजा करने उस मूरत की

मैं दीपाशिखा-सी जलती हूँ !

सपनों की भूलभुलैया में

मैं करती हूँ पीछा जिसका,

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पंचम लिंक में अडिग शब्दों का पहरा से..



रहा जीवन सदियों से कुर्सी की दासी

महल अजीर्ण, बाहर भूखी उबासी 

जन घिसता रहा पिसता रहा

पर कुर्सी तुझ पर चूं नहीं हुई।

बुद्धि लिखती रही, बेबसी बकती रही 

लाचार मरता रहा ईमानदार खपता रहा


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चलते-चलते देखें शकुंतला जी की
 खूबसूरत कृति..




यू नहीं आँधियों से घबराइए

गीत जिंदगी का गुनगुनाते जाइये

देख कर हँसेंगी ये बेरहम दुनिया

आँसू आंख में न हरगिज़ लाइए

गुज़रेंगे लोग और भी इधर से

राह से काँटे हटाते जाइये



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ये कैसी सियासत? 

ये कैसी कारगुजारी इनकी 

थम सी गई है दिल्ली ..

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चलिए अब बारी है 
सभी के लिए 
एक खुला मंच
आपका हम-क़दम 
सातवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय
............यहाँ देखिए..........
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।।इति शम।।
पम्मी सिंह

धन्यवाद..✍


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