२१ फरवरी २०१८
।।हार्दिक शुभेच्छा।।
साझी अभिव्यक्ति का
माध्यम है ये मंच जो वक्त के
माध्यम है ये मंच जो वक्त के
साथ कदम मिला कर 950 अंक में
प्रवेश कर रही..गिरफ्त है इनमें अब भी
आने वाली कई सरगोशियाँ आज की
लिकों में सामंजस्य कविता की नमी,
हास्य के रंग,विचार पूर्ण विषय के
द्वारा व्यथा की प्रस्तुति से है..
प्रवेश कर रही..गिरफ्त है इनमें अब भी
आने वाली कई सरगोशियाँ आज की
लिकों में सामंजस्य कविता की नमी,
हास्य के रंग,विचार पूर्ण विषय के
द्वारा व्यथा की प्रस्तुति से है..
जहाँ तक सामयिक विषय..
की बात है मानो भ्रष्टाचार
में शिष्टाचार ढूंढने का चलन बन पड़ा..
की बात है मानो भ्रष्टाचार
में शिष्टाचार ढूंढने का चलन बन पड़ा..
अब ज़्यादा समय नहीं लूंगी..✍
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प्रथम लिंक में आनन्द ले..
नदीश जी की भावनाओं का कल्लोल..
जरूरी जिस कदर है सावधानी घर बनाने में
अचानक अश्क़ टपके और बच गई आबरू वरना
कसर छोड़ी न थी उसने मुझे पत्थर बनाने में
मैं सारी उम्र जिनके वास्ते चुन-चुन के लाया गुल
वो ही मसरूफ़ थे मेरे लिए खंज़र बनाने में
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जलाये रखना,
उम्मीद आँधियों में
बनाये रखना।
अब क्या डरना
हालात की तल्ख़ियों से,
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तृतीय लिंक में विचार करें तालियों का पिटना..पर
आपकी किसी बात या रचना पर ताली बजना और
उससे समाज में बदलाव आना दो बिलकुल अलग़-अलग़ बातें हैं। फ़ेसबुक के लाइकस् को भी हम इस श्रेणी में रख सकते हैं हालांकि
वह तालियों जितना तुरंता और तात्कालिक नहीं है। जब तालियां
बजती हैं तो माना जा सकता है कि आपके जीवन में ज़रुर
कुछ बदलाव आता है, लोग आपको जानने लगते हैं,
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उससे समाज में बदलाव आना दो बिलकुल अलग़-अलग़ बातें हैं। फ़ेसबुक के लाइकस् को भी हम इस श्रेणी में रख सकते हैं हालांकि
वह तालियों जितना तुरंता और तात्कालिक नहीं है। जब तालियां
बजती हैं तो माना जा सकता है कि आपके जीवन में ज़रुर
कुछ बदलाव आता है, लोग आपको जानने लगते हैं,
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कार्टून :- आओ ठाकुर
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चतुर्थ लिंक के अंतर्गत सखी मीना शर्मा जी की
भावपूर्ण रचना मैं दीपशिखा - सी जलती हूँ !
मैं मन ही मन में गढ़ती हूँ,
पूजा करने उस मूरत की
मैं दीपाशिखा-सी जलती हूँ !
सपनों की भूलभुलैया में
मैं करती हूँ पीछा जिसका,
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पंचम लिंक में अडिग शब्दों का पहरा से..

रहा जीवन सदियों से कुर्सी की दासी
महल अजीर्ण, बाहर भूखी उबासी
जन घिसता रहा पिसता रहा
पर कुर्सी तुझ पर चूं नहीं हुई।
बुद्धि लिखती रही, बेबसी बकती रही
लाचार मरता रहा ईमानदार खपता रहा
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चलते-चलते देखें शकुंतला जी की
यू नहीं आँधियों से घबराइए
गीत जिंदगी का गुनगुनाते जाइये
देख कर हँसेंगी ये बेरहम दुनिया
आँसू आंख में न हरगिज़ लाइए
गुज़रेंगे लोग और भी इधर से
राह से काँटे हटाते जाइये
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ये कैसी सियासत?
ये कैसी कारगुजारी इनकी
थम सी गई है दिल्ली ..
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चलिए अब बारी है
सभी के लिए
एक खुला मंच
आपका हम-क़दम
सातवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय
............यहाँ देखिए..........
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सभी के लिए
एक खुला मंच
आपका हम-क़दम
सातवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय
............यहाँ देखिए..........
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।।इति शम।।
पम्मी सिंह
धन्यवाद..✍





